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एनजीटी: दस साल पुराने डीजल वाहनों को हटना होगा सड़कों से, क्या इससे समस्या सुलझ जाएगी?

निहार गोखले | Updated on: 19 July 2016, 12:30 IST
(गेट्टी इमेज)

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने राजधानी दिल्ली में दस साल पुरानी डीजल गाडिय़ों पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाने के आदेश दिए हैं. इससे राष्ट्रीय राजधानी में सबसे ज्यादा नुकसानदेह वायु प्रदूषण पर नियंत्रण रखने में मदद मिलेगी. एनजीटी पहले ही दिल्ली में डीजल गाडिय़ों पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दे चुका है. हालांकि यह फैसला टल गया था और ऐसी गाडिय़ां अभी भी काम में लाई जा रही हैं. ऐसी वाहनों को अगर जब्त भी किया जाता था तो मजिस्ट्रेट मोटर वाहन अधिनियम के तहत उन्हें छोड़ देता था.

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एनजीटी के सोमवार के आदेश में, अब दस साल से पुरानी डीजल गाडिय़ों का रजिस्ट्रेशन भी तुरन्त प्रभाव से खत्म करने का भी आदेश है. एनजीटी ने यह भी आदेश दिया है कि आरटीओ जिन वाहनों का रजिस्ट्रेशन खत्म करेगा, उनकी लिस्ट ट्रैफिक पुलिस को सौंपी जाए. विशेषज्ञों ने एनजीटी के इस निर्णय का स्वागत किया है पर यह भी कहा है कि शहर की हवा को स्वच्छ करने के लिए दृढ़तापूर्वक और बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है.

वायु में पीएम लेबल बढ़ाने में डीजल सबसे ज्यादा जिम्मेदार

डीजल कारों से निकलने वाले धुंए के छोटे-छोटे कण दिल्ली को प्रदूषित शहर बनाने वाले सबसे ज्यादा जिम्मेदार तत्वों में से एक हैं. इससे कैंसर रोग, सांस की बीमारी, गुर्दा रोग की बीमारियों का जोखिम तो बढ़ता ही है. सर्दियों में तो इसका पार्टिकुलेट मैटर्स (पीएम) लेबल खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है.

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विभिन्न अध्ययनों के अनुसार दिल्ली की आबो हवा में पीएम लेबल बढ़ाने में वाहन सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं. निर्माण कार्यों से उडऩे वाली धूल, खुले में जलाया जा रहा औद्योगिक कचरा और खर-पतवार भी दिल्ली में वायु प्रदूषण की एक वजह है. डीजल वाहनों पर इसलिए रोक लगाई गई है क्योंकि इससे निकलने वाला धुंआ सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है.

डीजल तम्बाकू के बराबर ही कैंसरजनित तत्व

सेन्टर फॉर साइंस एंड इनवायरमेन्ट से जुड़ीं अनुमिता राय चौधरी कहती हैं कि डीजल तम्बाकू के बराबर ही प्रथम श्रेणी का कैंसर पैदा करने वाला तत्व है. सन 2020 में यूरो-6 विसर्जन मानक लागू करने तक हमें वर्तमान के डीजल उपयोग को कम करना चाहिए. राय चौधरी कहती हैं कि भारत के मेट्रो शहरों में वर्तमान में यूरो-4 मानक का पालन हो रहा है. पिछले एक सालों में जहरीला प्रदूषण बढ़ा है. पेट्रोल की तुलना में डीजल गाडिय़ों की संख्या ने इसमें इजाफा किया है. दस साल से ज्यादा पुरानी कारें भी प्रदूषण की वजह हैं.

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उन्होंने कहा कि वर्तमान में अन्य तरह के डीजल वाहन भी हैं जिनके लिए कायदे-कानून हैं. बसों, टैक्सियों, व्यापारिक कार्यों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले वाहनों पर कार्रवाई की गई है (इन्हें सीएनजी में भी परिवर्तित कराया गया है) और ट्रकों के दिल्ली में प्रवेश पर रोक है. पर इन उपायों का जो सार्थक असर पड़ना चाहिए था, वह निजी डीजल कारों की बढ़ती संख्या के कारण नहीं पड़ रहा है.

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डीजल से चलने वाली कारें जनता में इसलिए पसन्द की जा रहीं हैं क्योंकि पेट्रोल की तुलना में डीजल सस्ते दामों पर मिलता है. डीजल पर कर इसलिए कम है क्योंकि ट्रांसपोटर्स और किसानों के लिए इसे सस्ता रखा जाता है. सस्ता डीजल बेचना हमारी सरकारी नीति का हिस्सा है ताकि किसानों को लाभ मिले.

एक अच्छा कदम

एनजीटी का यह आदेश वर्धमान कौशिक बनाम भारत सरकार मामले में आया है. इस आदेश को अब भारत के शहरों में प्रदूषण के स्तर के आधार पर देखा जाएगा. मई में एनजीटी ने केरल के छह बड़े शहरों में दस साल से ज्यादा पुराने डीजल वाहनों पर रोक लगा दी थी. हालांकि केरल हाईकोर्ट ने इस आदेश पर स्थगन आदेश दे दिया था. एनजीटी का आदेश केवल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में लागू होगा. अन्य क्षेत्रों में यह आदेश नहीं लागू होगा.

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ग्रीन पीस इंडिया के स्वच्छ वायु अभियान से जुड़े सुनील दहिया कहते हैं कि मेरे विचार से यह एक अच्छा कदम है पर निश्चित तौर पर दिल्ली में वायु प्रदूषण कम करने के लिए यह सिर्फ एकमात्र और बड़ा कदम नहीं है.

दहिया कहते हैं कि हवा का झटका तो चारों तरफ से लगता है. 100 किमी की दूरी से भी इसका प्रहार होता है. इसे किसी भी राजनीतिक या शहर की सीमायी चारदीवारी में नहीं बांधा जा सकता. वायु प्रदूषण कम करने के लिए लोगों और सरकारी विभागों की जवाबदेही के साथ व्यवस्थित और व्यापक राष्ट्रीय/क्षेत्रीय एक्शन प्लान बने ताकि लोग साफ वायु में सांस ले सकें. ऐसा तुरन्त प्रभाव से करने की जरूरत है.

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दहिया इस दिशा में किए गए एक अध्ययन के एक सह-लेखक भी हैं. इस अध्ययन में पता चला है कि दिल्ली समेत अन्य शहरों के पीएम 2.5 वायु प्रदूषण में थर्मल पावर प्लांट से निकला उत्सर्जन बहुत हद तक जिम्मेदार है. दिल्ली में डीजल वाहनों से जुड़े और जो विवादित मुद्दे हैं, वे सुप्रीम कोर्ट में लम्बित हैं.

एनजीटी के इस ताजा आदेश से उन लोगों को अस्थाई रूप से परेशानी महसूस होगी जो दस साल से ज्यादा पुराने डीजल चालित वाहनों का इस्तेमाल कर रहे हैं. एनजीटी के आदेश का अर्थ यह है कि ये वाहन अवैध हो गए हैं. सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व के आदेश के तहत दिल्ली एनसीआर में 2000 सीसी से ज्यादा क्षमता वाली नई डीजल कारों के रजिस्ट्रेशन पर रोक लगी हुई है. यानी 2000 सीसी का कोई नया वाहन रजिस्टर्ड नहीं कराया जा सकता.

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खबरों के अनुसार इस प्रतिबंध में बहुत जल्द ढील दी जा सकती है. सुझाव है कि इस तरह के वाहनों की खरीद करते समय ही पर्यावरण क्षतिपूर्ति के नाम पर कुछ स्थाई चार्ज लगा दिया जाए. एनजीटी सार्वजनिक उपयोग वाले वाहनों पर तो रोक लगा चुका है, लेकिन निजी मालिकों के लिए रोक लगाना इतना आसान नहीं होगा. अभी तो सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश आना बाकी है.

First published: 19 July 2016, 12:30 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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