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वेटलैंड के मुद्दे पर केंद्र और राज्य नरम, एनजीटी गरम

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने भारत के वेटलैंड को बचाने के लिए एक बड़ी पहल की है. अधिकरण ने सेंट्रल वेटलैंड्स रेगुलेटरी अथॉरिटी (सीडब्ल्यूआरए) को हर महीने बैठक करने के लिए कहा है. अधिकरण ने अथॉरिटी को देश में मौजूद वेटलैंड को अधिसूचित करने के लिए भी कहा है. केंद्र और राज्य सरकारें वेटलैंड को अधिसूचित करने से 2010 से ही बच रही हैं.

सरकारी भाषा में झीलों, तालाबों, पोखरों इत्यादि को वेटलैंड कहा जाता है. इनका पशु-पक्षियों समेत कइयों के जीविका की सीधा संबंध होता है. शीतकालीन प्रवास पर भारत आने वाले ज्यादातर पक्षी वेटलैंड क्षेत्रों में ही आते हैं.

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वेटलैंड (कंजरवेशन एंड मैनेजमैंट) रूल्स, 2010 के अनुसार देश के सभी वेटलैंड की पहचान करके अधिसूचित किया जाना चाहिए. वेटलैंड को अधिसूचित करना काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि ये तेजी से अतिक्रमण का शिकार होते जा रहे हैं, खासकर शहरी इलाकों में. अधिसूचना एक जरूरी कानूनी प्रक्रिया जिसके बिना वेटलैंड का संरक्षण या प्रबंधन संभव नहीं है.

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ये सीडब्ल्यूआरए का जिम्मा है कि वो राज्य द्वारा प्रस्तावित वेटलैंट का निरीक्षण करे और तद्नुसार अधिसूचना जारी करे. लेकिन ऐसा नहीं हो सका है.

राज्यों ने अभी तक वेटलैंड को चिह्नित ही नहीं किया है. दूसरी तरफ सीडब्ल्यूआरए की बैठक शायद ही कभी होती है.

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पिछले साल दिल्ली स्थित ईआईए रिसोर्स एंड रिस्पॉन्स सेंटर के निदेशक पुष्प जैन ने एनजीटी में याचिका दायर करके इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की थी. एनजीटी ने शुक्रवार को दिए अपने फैसले में राज्यों से वेटलैंड की सूची देने के लिए कहा है.

एजीटी का फैसला ऐसे समय में आया है, जब केंद्र सरकार 2010 के कानून को नरम बनाने की तैयारी में है

एनजीटी ने सीडब्ल्यूआरए को हर महीने बैठक करने के लिए कहा है और बैठक के मिनट्स को एनजीटी में जमा करना होगा. सीडब्ल्यूआरए को वेटलैंड को चिह्नित करने और अधिसूचना से जुड़ी प्रक्रिया में हुई प्रगति की जानकारी भी एनजीटी को देनी होगी.

एनजीटी का फैसला ऐसे समय में आया है, जब केंद्र सरकार 2010 के कानून को नरम बनाने की तैयारी में है. 31 मार्च को पर्यावरण मंत्रालय ने 2010 के कानून की जगह लेने के लिए एक नए कानून का मसौदा पेश किया. नए प्रस्तावित कानून में सीबीडब्ल्यू को भंग करने का भी प्रस्ताव दिया गया है.    

प्रस्तावित कानून में वेटलैंड से जुड़ी समस्त जिम्मेदारी राज्यों पर डाली गई है. इसके अनुसार वेटलैंड को चिह्नित करने, उनका आकलन करने और नियमानुसार कार्रवाई करने की जिम्मेदारी संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री की होगी. पर्यावरण कार्यकर्ता इस प्रस्ताव की आलोचना कर रहे हैं. आलोचकों का कहना है कि जब राज्यों ने वेटलैंड को चिह्नित करने का काम ही नहीं किया तो उनपर पूरी जिम्मेदारी सौंपना अनुचित होगा. 

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एनजीटी ने 22 अप्रैल को भी राज्यों को वेटलैंड की सूची देने का निर्देश दिया था. शुक्रवार को एनजीटी ने दोबारा यही निर्देश जारी किया.

याचिका के वकील ऋत्विक दत्ता कहते हैं, "राज्य केवल समय काट रहे हैं ताकि वेटलैंड से जुड़ा नया नरम कानून आ जाए. सीडब्ल्यूआरए निष्क्रिय हो चुका है, वो केवल कागजी संस्था बनकर रह गया है."

एनजीटी के फैसले से सरकार द्वारा प्रस्तावित कानून पर सवाल खड़े हो गए हैं क्योंकि नया कानून एजीटी के निर्देशों के खिलाफ है.

भारत 'रैमसैर कन्वेंशन ऑन प्रोटेक्शन ऑफ वेटलैंड' पर दस्तखत कर चुका है. इसके तहत भारत के 26 वेटलैंड को अंतरराष्ट्रीय महत्व का घोषित किया गया है. ऐसे वेटलैंड में ओडिशा के चिलिका लेक और मणिपुर के लोकतक लेक शामिल हैं.

First published: 23 July 2016, 7:52 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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