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एनजीटी का फैसला: श्रीनगर में अलकनंदा हाइड्रो पावर कंपनी देगी 9.26 करोड़ का मुआवजा

निहार गोखले | Updated on: 26 August 2016, 8:25 IST

2013 में उत्तराखंड में बादल फटने के कारण आई बाढ़ से 10,000 लोगों की मौत हो गई थी. तीन साल बाद अब कहीं उनके परिवारों और उस हादसे में बचे रह गए लोगों को कुछ राहत मिली है. नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल का कहना है कि श्रीनगर में अलकनंदा नदी पर बनाए जा रहे हाइड्रो इलेक्ट्रिक बांध के कारण राज्य के पौड़ी जिले में तबाही मची थी. साथ ही बांध बना रही इस कम्पनी को आदेश दिया कि वह श्रीनगरवासियों को 9.26 करोड़ रुपए का मुआवजा दे.

इस मामले में दस माह के लंबे समय बाद 19 अगस्त को आया यह फैसला कई वजहों से याद किया जाएगा. पहली बार ऐसा हुआ है जब राज्य मेें किसी हाइड्रो इलेक्ट्रिक परियोजना को किसी आपदा के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है.

केदार घाटी में कम से कम ऐसी 100 परियोजनाएं प्रस्तावित हैं. यहां तक कि स्थानीय लोग और पर्यावरणविद भी पहाड़ों में ऐसे बांध के निर्माण और उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता जताते रहते हैं. राज्य व केंद्र सरकार ने इस तरफ से आंखें मूंद रखी हैं.

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इस फैसले से बांध निर्माताओं का गैर जिम्मेदाराना रवैया सामने आता है. श्रीनगरवासियोें के एक संगठन श्रीनगर बांध आपदा संघर्ष समिति ने यह याचिका दायर कर एनजीटी ने आपत्ति जताई थी कि बांध के आस-पास मलबे का ढेर पड़ा है. वैसे तो इससे कोई नुकसान नहीं है लेकिन यह तब खतरनाक हो जाता है जब इसके ढेर ढलवां पहाड़ियों पर एक उफनती नदी के किनारे इकठ्ठे हो जाते हैं.

इस बात का त्वरित परिणाम यह है कि अब यह मुआवजा राशि पीड़ितों को दी जाएगी

इस मलबे और वहां जमा हुए कीचड़ के कारण 2013 में अलकनंदा नदी में आई बाढ़ ज्यादा खतरनाक हो गई. श्रीनगर में आठ फीट ऊंचाई तक पानी का बहाव देखा गया. 

याचिकाकर्ताओं के वकील राहुल चौधरी ने बताया करीब 600 लोगों ने यह याचिका लगाई है और हर एक ने अपने घर के सामने से यह मलबा और कीचड़ हटाने की कीमत 1से 4 लाख रुपए तक मांगी है. ये सारे दावे कुल मिलाकर 9 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है. एनजीटी यह राशि मुआवजे के तौर पर देने पर सहमत हो गया है.

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इस बात का त्वरित परिणाम यह है कि अब यह मुआवजा राशि पीड़ितों को दी जाएगी. एनजीटी ने पौड़ी के वरिष्ठ उप-विभागीय मजिस्ट्रेट को निर्देश दिए हैं कि वह पौड़ी में इस बात पर ध्यान दे कि मुआवजे की राशि का भुगतान सही तरीके से हो रहा है कि नहीं.

(एसडीएम को पहले दावे आमंत्रित करने होंगे, जिन्हें आवश्यक प्रमाण के साथ 90 दिन के अंदर दायर करना होगा.)

परन्तु एनजीटी द्वारा शुरू की गई यह प्रथा सिर्फ रुपए के भुगतान से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है. बांध पर सुरक्षा के कोई उपाय नहीं किए गए थे, इस वजह से नुकसान की भरपाई के लिए आर्थिक भुगतान करना लाजमी हो जाता है.

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अलकनंदा हाइड्रो पावर कम्पनी द्वारा इस बांध का निर्माण किया जा रहा है जो कि निर्माण क्षेत्र की बड़ी कम्पनी जीवीके की सब्सिडरी कम्पनी है. जीवीके ने एनजीटी के समक्ष तर्क दिया था कि बाढ़ ‘भगवान की मर्जी’ से आती है, इसलिए श्रीनगर में हुए नुकसान से जीवीके का कोई वास्ता नहीं है.

एनजीटी ने इस तर्क को सिरे से नकारते हुए कहा कि इस बारे में मानवीय दूरदर्शिता की उम्मीद की जाती है, कि आस-पास फैले मलबे और गंदगी के ढेर के प्रति लापरवाही बरतने और सुरक्षा उपाय नहीं करने से आपदा आ सकती है. ट्राइब्युनल ने कहा, ‘हमारे समक्ष प्रस्तुत सामग्री के आधार पर कहा जा सकता है कि अलकनंदा हाइड्रो पावर की ओर से इस मामले में लापरवाही बरती गई.’

यह मूल याचिका की सीमा में रहा, जो कि श्रीनगर की रिहायशी संपत्ति के नुकसान के बदले मुआवजे के रूप में आया

दूसरे शब्दों में जीवीके को पता होना चाहिए था कि मलबा भले ही नुकसानदायक नहीं है लेकिन जिस तरह से यह पहाडि़यों के ऊपर बिखरा पड़ा था वह लापरवाही का सबूत है विशषकर उसके पास से ही तेज बहाव वाली नदी बहती है तो यह और भी खतरनाक हो सकता है.

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मलबे का प्रबंध करने के कुछ आधिकारिक नियम कानून भी हैं लेकिन एनजीटी ने पाया कि बांध पर इन नियमों का पालन नहीं किया जा रहा था.

ऐसा करके एनजीटी ने एक और पहल की है, ‘बिना गलती के जिम्मेदारी लेने’ के सिद्धान्त की अनुपालना की. यह एक कानूनी सिद्धान्त है जिसके अनुसार, भले ही बाढ़ बांध के कारण नहीं आई हो, फिर भी मुआवजे के भुगतान की जिम्मेदारी बांध निर्माता कम्पनी की ही है.

पर्यावरणीय अधिवक्ता रित्विक दत्ता ने कहा है कि पहली बार किसी बांध पर इस तरह का फैसला आया है अन्यथा अब तक बांध निर्माण कम्पनियां यह कहकर बचती रही हैं कि ‘उनका कोई दोष नहीं है, यह तो प्राकृतिक आपदा है.’

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अंत में, एनजीटी का फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मूल याचिका की सीमा में रहा, जो कि श्रीनगर की रिहायशी संपत्ति के नुकसान के बदले मुआवजे के रूप में आया. इससे एनजीटी ने घाटी में बांधों के निर्माण के खिलाफ एक सशक्त संकेत दिया है.

अपने फैसले में एनजीटी की दो सदस्यीय खंडपीठ ने लिखा कि ‘बांध निर्माताओं को पता था’ कि बांध भौगोलिक रूप से संवेदनशील हिमालय क्षेत्र में है, जहां बादल फटना कोई नई बात नहीं है.

मंत्रालय ने कहा कि वह बांध बनाने की इजाजत तभी देगा जब इनका निर्माण एक सौ साल पुराने दस्तावेज पर हो

इस फैसले ने बड़ी चतुराई से एक सवाल उठाया है कि हिमालय में बांधों का होना कितना उचित है? यह मामला सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है.

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उच्चतम न्यायालय ने 2013 की बाढ़ का स्वत: संज्ञान लिया था. मामला इसलिए लंबा खिंच रहा है क्योंकि सरकार बांधों को सही ठहराने पर तुली है. यद्यपि गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय बांध नहीं चाहता, प्रधानमंत्री ऑफिस ने पर्यावरण मंत्रालय को निर्देश दिए हैं कि वह ऐसी कई समितियां बनाएं जो बांध निर्माण के खिलाफ एक स्वर में बोलें.

अंततः मंत्रालय ने कहा कि वह बांध बनाने की इजाजत तभी देगा जब इनका निर्माण एक सौ साल पुराने दस्तावेज पर हो, यानी 1916 में ब्रिटिश उपनिवेश सरकार और हिन्दू राष्ट्रवादी नेता मदन मोहन मालवीय के बीच 1916 में हस्ताक्षरित एक संधि के आधार पर हो.

इस संधि के अनुसार, गंगा नदी पर बांध तभी बनाया जा सकता है जब वे 1000 क्यूसेक पानी छोड़ें. अलकनंदा गंगा की ही एक उपनदी है लेकिन यह समझाौता यहां लागू नहीं होता क्योंकि आधुनिक जल विज्ञान के लिए यह लगभग चार दशक पुराना है, जो कि आज की तारीख में मायने नहीं रखता.

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एनजीटी ने अपने फैसले से साफ कर दिया है कि बहाव की बात को छोड़ भी दिया जाए तो भी हिमालयी क्षेत्र में बांध काफी जोखिमपूर्ण है. जलवायु परिवर्तन इसे और खतरनाक बना देते हैं. क्या अब पर्यावरण मंत्रालय जागेगा?

First published: 26 August 2016, 8:25 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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