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सुनीता नारायण: पर्यावरण और विकास पर हो रही बहसें बेहद पोलराइज़ हो चुकी हैं

निहार गोखले | Updated on: 5 June 2016, 0:50 IST
(फाइल फोटो)

सुनीता नारायण सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) की महानिदेशक हैं. अपने 30 वर्ष के पेशेवर जीवन में नारायण 1990 में वायु प्रदूषण को लेकर हुई बहस की शुरुआत से लेकर अंतरराष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन वार्ताओं, गंगा और यमुना के पुनरुद्धार के लिये शुरू हुए एक्शन प्लान की असफलता और पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया के प्रारंभ होने तक की यात्रा की साक्षी रही हैं.

उन्होंने हाल ही में बीते तीन दशक लंबी जलवायु की बहस को केंद्र में रखते हुए ‘सेमी-आॅटोबायोग्राफिकल’ किताब प्रकाशित की है. विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर कैच ने उनसे विस्तृत बाचतीत की. प्रस्तुत हैं उस बातचीत के चुनिंदा अंशः

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एनडीए सरकार का कहना है कि वह पर्यावरण मंजूरी मिलने में लगने वाले 100 दिनों की समयसीमा को कम करना चाहती है. क्या ऐसे में पर्यावरण सुरक्षा उपायों का पालन किया जा सकता है?

वास्तविकता यह है कि 2006 की पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन (ईआईए) संबंधी अधिसूचना के अंतर्गत पर्यावरण मंजूरी मिलने में लगने वाला समय 210 दिनों का था. अगर संबंधित विभाग आकलन करने की अपनी समय सीमा का पालन करें और तय प्रक्रियाओं के दायरे में कदम आगे बढ़ाएं तो यह समय काफी नहीं है. इसके अलावा देरी की एक और वजह है परियोजना के प्रस्तावकों द्वारा अधूरी जानकारी और कम कागजात मुहैया करवाना. ऐसे मे नियामक कानून या निधार्रित समयसीमा मुख्य समस्या नहीं है.

यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि अगर समयसीमा कम करने पर विचार किया जाता है तो ऐसा कैसे संभव हो पाएगा?

एनडीए सरकार ने विभिन्न क्षेत्रों के लिये अलग-अलग, क्षेत्र-विशेष के आधार पर एक मानक टर्म्स आॅफ रेफरेंस (टीओआर) तैयार किया है जिसके आधार पर ईआईए तैयार किया जा सकता है. सामान्य भाषा में इसका मतलब है कि परियोजना का प्रस्तावक अब साइट का चयन कर सकता है और एक मानक टीओआर के आधार पर ईआईए प्रारंभ कर सकता है. हालांकि गलत स्थान के चयन के चलते सॉम्पेता थर्मल पावर प्लांट, वेदांता की लांजीगढ़ माइन्स, गुजरात की निरमा की सीमेंट परियोजना इत्यादि सहित कई परियोजनाएं पूर्व में विवादों में आ चुकी हैं.

''गरीब का पर्यावरणवाद अभी तक हमारे पर्यावरण नियंत्रण प्रणाली का हिस्सा नहीं बन पाया है''

एक मानक टीओआर व्यवस्था अगर मनमानापन समाप्त कर सके तो वह इतना बुरा भी नहीं है और इसे समयीमा कम करने के एक उपाय के रूप में भी देखा जा सकता है. लेकिन एक मानक टीओआर के अंतर्गत ईआईए से पहले केंद्रीय और राज्य स्तर की विशेषज्ञ मूल्यांकन समितियों द्वारा स्थल की जांच करने के लिये जाना आवश्यक है जो वर्तमान में जरूरी नहीं है.

लेकिन सार्वजनिक परामर्श के लिये निधार्रित 45 दिनों की समयसीमा के साथ कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिये. लोगों की चिंताओं को जानना भी बेहद आवश्यक है. ऐसा करना परियोजना के प्रस्तावकों के लिये भी उपयोगी कदम है क्योंकि आम जनता को दरकिनार करना कई बार परियोजनाओं को मुजूरी मिलने के बावजूद विवादास्पद बना देता है.

इसके अलावा चिंता का एक और विषय है मूल्यांकन अवधि की समयसीमा को किसी भी सूरत में कम नहीं किया जाना चाहिये. अगर बाद वाले दो काम होते हैं तो मंजूरी देने की प्रक्रिया की प्रमाणिकता के साथ बेहद गंभीर समझौता माना जाएगा.

बीते एक वर्ष में एनजीटी और उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप के चलते वायु प्रदूषण चिंता का एक प्रमुख विषय बनकर उभरा है. लेकिन यह देखते हुए कि डब्लूएचओ की ताजा रिपोर्ट में ग्वालियर, पटना और इलाहाबाद के प्रदूषण के स्तर को राजधानी से कहीं अधिक बताया गया है आपको नहीं लगता है कि यह मामला मुख्यतः दिल्ली-केंद्रित होकर रह गया है?

दिल्ली हमेशा से ही केंद्र में रहा है और इसका कारण यह है कि 1990 के बाद से ही यह विभिन्न कारणों के चलते गंभीर वायु प्रदूषण की चपेट में आता रहा है. वायु की बिगड़ती हुई गुणवत्ता को लेकर लोगों की चिंता को देखते हुए विभिन्न अदालतों ने कई बार सामने आकर हस्तक्षेप भी किया है.

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वायु गुणवत्ता का डाटा अन्य शहरों में बढ़े हुए पीएम2.5 स्तर को भी स्पष्ट प्रदर्शित करता है जो दिल्ली के बराबर है या फिर यहां से अधिक है. लेकिन दिल्ली में उठाया गया कोई भी कदम दूसरे शहरों के लिये एक मिसाल होता है फिर चाहे वह स्वच्छ वाहनों को अपनाने का हो या ईंधन और अन्य (औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण, प्रदूषण कर, इत्यादि) प्रदूषण नियंत्रण उपायों का.

अब समय आ गया है जब राष्ट्रीय, प्रदेश और शहरी, तीनों ही स्तरों पर स्वच्छ वायु कार्ययोजना को अंजाम दिया जाए. साथ ही इसका अनुपालन सुनिश्चित करने और इसे प्रक्रिया का आवश्यक हिस्सा बनाने को लेकर कानूनी रूप से बाध्य किया जाए ताकि लोग इन उपायों को लेकर आश्वस्त हो सकें और बड़े प्रावधानों का भी समर्थन करें.

इसके अलावा सरकार को स्वच्छ वायु कार्ययोजना के प्रति भी प्रतिबद्धता दिखानी होगी जो लोगों को इस प्रक्रिया का हिस्सा बनने के लिये प्रेरित करेगी. ऐसा इसलिये भी आवश्यक है क्योंकि अधिकतर अदालत के हस्तक्षेप सरकार की निष्क्रियता के चलते बेमानी हो जाते हैं.

इसके अलावा राज्यों को वायु प्रदूषण कम करने के लिये जवाबदेह बनाना होगा. हमारे यहां ज्ञान की कोई कमी नहीं है और हमें इस समस्या के समाधान के लिये सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति पर ही निर्भर भी नहीं रहना चाहिये. जैसे उच्चतम न्यायालय अनुच्छेद 21 ‘जीवन के अधिकार’ को लागू करता है वैसे ही शहरों और राज्यों को अपना काम करना होगा और अंततः विभिन्न सरकारों को आगे आकर इसका हिस्सा बनना होगा.

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वरना किसी भी तरह की कार्रवाई के लिये अदालतों और अधिकरणों से टांग खिंचाई करवाते रहें. अगर ऐसा होता रहा तो फिर सरकार को यह शिकायत नहीं करनी चाहिये कि जो काम सरकार को करना चाहिये वह अदालत कर रही है. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सिर्फ दिखावे का माध्यम न बनकर आगे आकर कार्रवाई भी करनी होगी.

मोदी सरकार की गंगा सफाई की योजना सिर्फ सीवेज ट्रीटमेंट में निजी भागीदारों को लाने पर निर्भर है. आपके विचार से क्या यह योजना सफल होगी? इस प्रकार की ‘पर्यावरणीय’ परियोजनाओं को सफल बनाने में आप निजी कंपनियों की भूमिका किस रूप में देखती हैं?

मोदी सरकार ने दुनियाभर से विशेषज्ञों और नदी को साफ करने से संबंधित उनकी तकनीक साझा करने के लिये आमंत्रित किया था. वे तकनीक और बुनियादी ढांचे को उपलब्ध करवाने वाले हैं. ये विशेषज्ञ सिंगापुर, नीदरलैंड, आॅस्ट्रेलिया, कनाडा, चीन, जर्मनी और ब्रिटेन के अलावा अन्य कई देशों से यहां आए. जब भी यह देश सामने आए और तकनीक की पेशकश की तो बैठकों का आयोजन किया गया. बहुत सारी तकनीकों का सुझाव दिया गया लेकिन इनमें से अधिकतर पहले से ही हमारे देश में मौजूद हैं.

'अब समय आ गया है जब राष्ट्रीय, प्रदेश और शहरी, तीनों ही स्तरों पर स्वच्छ वायु कार्ययोजना को अंजाम दिया जाए''

उदाहरण के लिये सिंगापुर की ईकोसाॅफ्ट एरोबिक या एनएरोबिक प्रक्रियाओं के सिद्धांतों या फिर गंदे पानी की सफाई के लिये सूक्ष्मजीवों का उपयोग करने में महारत रखती है. वहीं दूसरी तरफ चीन की जिनमिन वाटर कंपनी लिमिटेड अपशिष्ट पानी के शोधन के लिये अनुक्रमित बैच रिएक्टर, सक्रिय कीचड़ प्रक्रिया और कुछ संशोधित संस्करणों का उपयोग करती है.

हालांकि ये कंपनियां कुछ भी नया प्रस्तुत नहीं कर रही हैं. इकोसाॅफ्ट की तकनीक पहले से भी भारत के कई तकनीक निर्माताओं द्वारा तैयार की जा चुकी है. भारत के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) जिनमिन कंपनी द्वारा पेश की गई इस तकनीक का पहले से ही इस्तेमाल कर रहे हैं.

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गंगा के प्रदूषण की प्रमुख वजह अनियंत्रित घरेलू सीवेज है. सबसे बड़ी समस्या यह है कि अधिक से अधिक अपशिष्ट जल उपचार संयंत्रों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करने के चलते नदी की सफाई से ध्यान बिल्कुल हट गया है. सीवेज उत्पादन को बहुत कम करके आंका जा रहा है. अधिकतर शहरों में सीवर कनेक्टिविटी की बेहद कमी के चलते नए एसटीपी के निर्माण से समस्या का निस्तारण नहीं होगा.

गंगा पर अपनी विशेषज्ञता की पेशकश करने वाली अधिकतर कंपनियां या तो डिजाइन-बिल्ट- आॅपरेट और ट्रांसफर के आधार पर या फिर पीपीपी के आधार पर या स्पेशल पर्पज़ व्हीकल के आधार पर काम करेंगी. विभिन्न राज्य एक बोली प्रक्रिया के माध्यम से तकनीक या बुनिादी ढांचे के प्रदाता का चयन करेंगे. केंद्र पहले पांच वर्षों के लिये इन सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के संचालन और रखरखाव की पूरी लागत वहन करेगा और उसके बाद संयंत्र को राज्य सरकार को सौंप दिया जाएगा.

राज्य स्थानीय निकायों को भी इनकी देखरेख का जिम्मा सौंप सकते हैं. जब इन एसपीटी को देखरेख के लिये शहरी स्थानीय निकायों को सौंपा जाएगा तो गंगा नदी के किनारे बसे अधिकतर शहरों के स्थानीय निकायों की बेहाल आर्थिक स्थिति के चलते इनका संचालन और रखरखाव कैसे होगा यह स्पष्ट नहीं है.

आपकी हालिया किताब आपके 30 वर्ष के काम को प्रदर्शित करती है. अब जब आप वैश्विक स्तर पर पर्यावरण नियंत्रण को देखती हैं तो क्या आपको लगता है कि हमारे अंदर जरूरी सुधार हुए हैं?

मैं यह कहना चाहूंगी कि पर्यावरण नियंत्रण में कुछ सुधार आया है, कम से कम पर्यावरणीय मामलों से जुड़ी गतिविधियों में लोगों की बढ़ती हुई सहभागिता को देखकर. लेकिन बीते तीन दशकों में पर्यावरण नियंत्रण को लेकर होने वाली बहस का बड़े पैमाने पर ध्रुवीकरण भी हुआ है.

जब भी कोई पर्यावरण की बात करता है तो उसे विकास विरोधी साबित करने का प्रयास करते हुए पलटकर हमला किया जाता है. अगर कोई बराबरी की बात करता है तो विकसित देशों का रवैया बेहद रूखा होता है जो किसी भी स्तर पर अपनी उस जीवनशैली से कोई समझौता करने को तैयार नहीं हैं जो सबसे अधिक प्रदूषण फैलाती है. नतीजतन जैसे ही हम कुछ सुधार देखते हैं राष्ट्रीय और वैश्विक जवाबी हमले प्रारंभ हो जाते हैं.

मेरे नजरिये से भारतीय परिप्रेक्ष्य को देखते हुए सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है कि गरीब का पर्यावरणवाद अभी तक हमारे पर्यावरण नियंत्रण प्रणाली का हिस्सा नहीं बन पाया है.

First published: 5 June 2016, 0:50 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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