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पॉल्यूशन: लाहौर से कोलकाता तक आबोहवा में ज़हर ही ज़हर

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:39 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • एयर पॉल्यूशन सिर्फ दिल्ली की समस्या नहीं, 11 भारतीय शहर बुरी तरह इसकी चपेट में हैं. मगर मीडिया में सिर्फ राजधानी दिल्ली की ज़हरीली होती आबोहवा की चर्चा छाई रही. 
  • विशेषज्ञों का मानना है कि लाहौर से लेकर कोलकाता तक के शहर प्रदूषित हैं और एक ही तरह की समस्या से जूझ रहे हैं. 

दिवाली से ही दिल्ली की खराब हवा का असर लोगों की सेहत पर पड़ रहा है. पॉल्यूशन इतना बढ़ गया है कि सांस लेने में तकलीफ़ हो रही है. पॉल्यूशन का स्तर ख़तरनाक स्तर तक पहुंच जाने के कारण इसे 'इमर्जेन्सी' तक कहा गया है. मगर यह सच्चाई सिर्फ राष्ट्रीय राजधानी की ही नहीं है जिसकी एयर क्वालिटी इतनी खराब है. दिल्ली की तरह ही उत्तर भारत के कई शहरों के हालात भी इतने ही खराब हैं या इससे बदतर हैं.

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 25 शहरों की मॉनिटरिंग की है. इसकी रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली की तरह ही 11 अन्य शहर भी इसी तरह की वायु प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे हैं. इनमें से अधिकांश शहरों को विश्व स्वास्थ्य संगठन की सूची में दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में रखा गया था. साल 2016 की वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की लिस्ट में दिल्ली को 11वां नम्बर मिला था, लेकिन राष्ट्रीय मीडिय़ा में इसे अनदेखा कर दिया गया. 

पर्यावरण और वन मंत्रालय ने दिल्ली की वायु गुणवत्ता को लेकर दो उच्च स्तरीय बैठकें की हैं. अफ़सोस कि इन बैठकों में भी अन्य शहरों की एयर क्वालिटी की समस्या को अनदेखा कर दिया गया. ये बैठकें पर्यावरण सचिवों और दिल्ली से सटे राज्यों-पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के मंत्रियों के साथ की गईं. हालांकि इन राज्यों के कई अन्य शहर भी दिल्ली जितने ही प्रदूषित हैं.

पूरे भारत की समस्या

सेन्ट्रल पॉल्यूशन कन्ट्रोल बोर्ड के मॉनीटर्स के मुताबिक 6 नवम्बर को नई दिल्ली का एय़र क्वालिटी इंडेक्स 500 के स्केल पर 497 था. मतलब कि एयर पॉल्यूशन का लेवल काफी ऊपर है. सेन्ट्रल पॉल्यूशन कन्ट्रोल बोर्ड के मुताबिक इससे काफी लोगों को स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें पैदा हो सकती हैं और जो पहले से ही बीमारी से पीड़ित हैं, उनके लिए गंभीर खतरे का सबब बन सकती है. 

वहीं जिन 11 शहरों का पॉल्यूशन स्तर 'खतरनाक' स्तर का आधा पाया गया है, वे भी पर्याप्त रूप से असुरक्षित हैं. सीपीसीबी के अनुसार खराब हवा से अधिकांश लोग लम्बे समय तक चलने वाली बीमारी की चपेट में आ जाते हैं. बहुत खराब हवा पुराने फेफड़ों के रोग, हृदय रोग, हृदय के कैंसर में बढ़ोत्तरी की वजह बनती है जबकि कम खराब हवा से किडनी, अस्थमा की समस्या पैदा हो जाती है. 

जिन नौ शहरों को प्रदूषण के मध्यम श्रेणी में रखा गया है, उनमें चेन्नई, हैदराबाद, नागपुर, नासिक, पुणे, नवी मुम्बई, सोलापुर और तिरुपति शामिल हैं. इसका मतलब यह हुआ कि 25 शहरों में से 21 शहरों की एयर क्वॉलिटी चिन्ताजनक है.

भयावह हालात

हालांकि यह अधूरा आंकड़ा है क्योंकि सीपीसीबी के मॉनीटर्स ने केवल चुने हुए शहरों का प्रदूषण स्तर मापा है. इन शहरों में भी ये मॉनीटर्स बहुत ही कम संख्या में प्रदूषण स्तर मापने गए थे, आम तौर पर सिर्फ एक या दो. स्वतंत्र रूप से एयर क्वॉलिटी की निगरानी करने वाली संस्था इंडिया स्पेंड ब्रीथ नेटवर्क के अनुसार चंडीगढ़, इलाहाबाद, पटना, वाराणसी, रायपुर और चेन्नई का प्रदूषण स्तर 'वेरी पुवर' या खतरनाक स्थिति वाला पाया गया.

साल 2014 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की सूची में पटना, ग्वालियर, फिरोजाबाद, रायपुर, अमृतसर और लुधियाना को अतिरिक्त रूप से सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शुमार किया गया था. वायु प्रदूषण का स्तर मापने वाले विशेषज्ञ और अर्बनइमीशन्स.इन्फो के सह-निदेशक सरत गुत्तीकुंडा कहते हैं कि लाहौर से लेकर कोलकाता तक के शहर, पूरे गंगा के मैदान वाले शहर प्रदूषित हैं.

इन शहरों में से अधिकांश में, विशेषकर गंगा के मैदान वाले इलाके में, एक जैसी ही समस्या है, 'वाहनों से निकलने वाला धुआं, सड़क का गुबार, धूल, निर्माण कार्यों से निकलने वाली गर्द, घर से निकलने वाला धुआं, उद्योगों, ऊर्जा संयंत्रों और मौसम में जलाए जाने वाले खर-पतवार हवा खराब करने की बड़ी वजहें हैं. 

मौसमी समस्य़ा नहीं

इस तरह की समस्या केवल सर्दियों में ही हो, ऐसा नहीं है. ग्रीनपीस इंडिया की एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक थर्मल पावर संयंत्रों से निकलने वाला धुंआ है. इससे काफी दूर-दराज तक की हवा खराब हो जाती है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्तरी भारत के अधिकांश शहर जैसे आगरा, दिल्ली, फरीदाबाद, गया, कानपुर, लखनू, मुजफ्फरपुर, पटना, वाराणसी, जयपुर, जोधपुर सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर हैं. यहां यह महत्वपूर्ण तथ्य उल्लेखनीय है कि ये शहर काफी दूरियों पर हैं. इससे समस्या के निदान में दिक्कत आती है.

सेन्टर फॉर इनवायरमेन्ट एंड एनर्जी डेवलपमेन्ट द्वारा मई 2016 में कराए गए एक अध्ययन के अनुसार पटना में एयर क्वालिटी कभी भी परमीशिबल लेबल पर नहीं पाई गई. इसकी वजह वाहनों से निकलने वाला धुआं, खर-पतवार का जलाना, डीजल से चलने वाले जेनरेटर का धुआं और निर्माण गतिविधियों से उड़ने वाली धूल है.

First published: 11 November 2016, 7:37 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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