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क्या सूखे से निपटने में सक्षम है नई राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना?

निहार गोखले | Updated on: 10 June 2016, 23:26 IST
(पीटीआई)

1 जून को भारत को अपनी पहली राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना मिली. प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा तैयार की गई यह योजना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहमति प्राप्त आपदा जोखिम न्यूनीकरण (2015-2030) के सेंडाई फ्रेमवर्क के अनुरूप है.

इस योजना की कई विशेषताएं हैं. जैसे इसमे पहली बार जानवरों के बचाव के अलावा बड़े पैमाने पर सूखे से निबटने के भी प्रावधान शामिल किये गए हैं. यह योजना उच्चतम न्यायालय द्वारा इसे तैयार करने में हो रही देरी को लेकर लताड़ लगने के बाद तैयार हुई है.

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स्वराज अभियान द्वारा दायर की गई सूखा राहत याचिका पर दिये गए फैसले में अदालत ने कहा था कि योजना का अभी तक तैयार न होना ‘‘काफी हैरान’’ करने वाला है. साथ ही न्यायालय ने आदेश देते हुए कहा था कि देश में पड़े हुए सूखे को देखते हुए इसे ‘‘जल्द से जल्द तात्कालिक स्तर पर तैयार किया जाए.’’

पहली बार जानवरों के बचाव के अलावा बड़े पैमाने पर सूखे से निबटने के भी प्रावधान पहली बार शामिल किये गए हैं

अदालत ने यह आदेश 11 मई को दिया और गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू द्वारा योजना के दस्तावेजों में लिखी गई प्रस्तावना में 10 मई की तारीख उल्लिखित है. एनडीएमपी सूखे के विभिन्न पहलुओं और प्रभावों को उल्लिखित करता है - बेहतर तैयारी करना, जहां कहीं भी संभव हो वहां चेतावनी प्रणाली स्थापित करना, कुशलता से प्रतिक्रिया करना, आपदा के प्रभावों को कम करते हुए आखिरकार यह सुनिश्चित करना कि देश भविष्य के लिये बेहतर तरीके से तैयार रहे. और ऐसा करने के लिये यह राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर पर विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में रोजगार के नए अवसर भी प्रदान करती है.

उदाहरण के लिये चक्रवात की स्थिति में इस योजना के अनुसारः चक्रवात को समझना और उसकी भविष्यवाणी करना भारतीय मौसम विभाग और अंतरिक्ष विभाग की जिम्मेदारी है जबकि राज्यों के निकाय ग्रामीण और शहरी निकायों के माध्यम से सहायता प्रदान करते हुए निगरानी का काम संभालेंगे.

साथ ही चेतावनी देने का जिम्मा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को सौंपा गया है. किसी भी आपदा की स्थिति में कार्रवाई या प्रतिक्रिया करने के लिये भी एक निर्धारित ढांचा तैयार किया गया है जिसके केंद्र में एनडीएमए को रखा गया है. यह सुनिश्चित करना कि हम चक्रवात से बचे रहें.

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हालांकि आपदा प्रबंधन अधिनियम की धारा 11 के तहत इस योजना को तैयार करना जरूरी बनाया गया था लेकिन इसके प्रावधानों को कानूनी तौर पर बाध्यकारी बनाने का कोई रास्ता नहीं है. इसमें आपदा की स्थिति आने पर सशस्त्र बलों या केंद्रीय एजेंसियों की तैनाती करने को लेकर भी कोई दिशानिर्देश नहीं दिये गए हैं और योजना के परिचय में लिखा है कि ऐसा करना सरकार के विशेषाधिकार में है.

केंद्र और राज्य सरकार के मंत्रालयों और विभागों को अलग से अपनी जरूरत के हिसाब से आपदा प्रबंधन की योजनाओं को तैयार करके बाद में उन्हें अधिसूचित करवाना होगा. हालांकि महिलाओं, दलितों और दिव्यांगों की आवश्यकताओं का ध्यान न रखने के चलते इस योजना की आलोचना भी की जा रही है.

इस योजना में इस बात का उल्लेख किया गया है कि दिव्यांगों की विशेष आवश्यकताओं के मद्देनजर निर्माण गतिविधियों का ध्यान रखा जाए और महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के पुनर्वास के लिये एक विशेष अनुभाग की भी स्थापना की जाए.

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एक्शन एड के अनुसार इसमें उनकी विशेष आवश्यकताओं का कोई उल्लेख नहीं होने के अलावा सरकार को उनके साथ कैसे निबटना चाहिये इसे लेकर भी कोई निर्देश नहीं दिया गया है.

इंटरनेशनल दलित साॅलिडेटरी नेटवर्क का कहना है कि इस बात के साफ सबूत हैं कि आपदा राहत के कामों में दलितों के साथ भेदभाव किया जाता है जैसा कि 2004 में आई सूनामी के बाद हुआ था और इस योजना में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि भविष्य में ऐसा दोबारा नही होगा.

किसी भी आपदा की स्थिति में कार्रवाई या प्रतिक्रिया करने के लिये भी एक निर्धारित ढांचा तैयार किया गया है

दलित साॅलिडैरिटी नेटवर्क के कार्यकारी निदेशक रिक्की नाॅहर्लिंड ने राॅयटर्स से कहा, ‘‘निःसंदेह भारत सरकार इस तथ्य से अच्छी तरह अवगत है और यह हमारी समझ से बाहर है कि वह इस मुद्दे पर कुछ भी करने से क्यों कतरा रही है. यह बेहद दुख की बात है कि इतनी महत्वपूर्ण योजना में मनुष्यों के बजाय जानवरों पर अधिक ध्यान दिया गया है.’’

इस योजना के अनुसार इसकी तमाम सिफारिशों को लागू करने में 15 वर्ष तक का समय लग सकता है हालांकि कुछ उपायों की प्रकृति ऐसी है जो इससे कम समय (जिन्हें लागू होने में 5 से 10 वर्ष का समय लग सकता है) में लागू किया जा सकता है. डीएम अधिनियम के अनुसार इसे प्रतिवर्ष एक बार अपडेट किया जाना है.

इसके बावजूद इस योजना की कई विशेषताएं है. उनमें से प्रमुख तीन हैंः

सूखा

जैसा कि हम सब जानते हैं कि देश के 11 राज्यों के करीब 300 जिले भयंकर सूखे की चपेट में हैं. अपने फैसले में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि सूखा एक आपदा है जो आपदा प्रबंधन अधिनियम के दायरे में आता है. और वास्तव में एनडीएमपी सूखे से निबटने के लिये व्यापक योजना पेश करता है.

इसमे काफी हद तक कृषि मंत्रालय और फामर्स वेलफेयर 2009 ड्राउट मैन्युअल से सूखा प्रबंधन के उपायों को अपनाते हुए सूखे से संबंधित एनडीएमए के कुछ दिशा-निर्देशों को भी अपनाया है. सूखे के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि कि राज्य अपनी सुविधा के हिसाब से इसकी घोषणा करते हैं.

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हालांकि बीते वर्ष मानसून के फेल होने के बाद सूखे की स्थितियां बिल्कुल स्पष्ट थीं लेकिन अधिकतर राज्यों ने नवंबर या दिसंबर में सूखे की घोषणा की. सिर्फ गुजरात ने अप्रैल 2016 में इसका आकलन करना प्रारंभ कर दिया था. हालांकि एनडीएमपी साफ बताता है कि सूखे के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों पर नजर रखने के लिये तमाम राज्यों को क्या कदम उठाने चाहिए इसमें ऐसा करने के लिये कोई समयसीमा निर्धारित नहीं की गई है.

ऐसे में इस योजना में भी सूखे को लेकर उन्हीं गलतियों को दोहराया जाएगा जो अबतक होती आई हैं.

जानवर

जब इसका मैन्यूअल खोज और बचाव कार्यों के बारे में बात करता है तो उसका आशय इंसानों और पशुधन दोनों से है. ऐसा पहली बार है और एक प्रगतिशील कदम के रूप में इसकी काफी सराहना भी हो रही है. इसमें पशुधन के लिये विशेष बचाव भवनों का भी उल्लेख है. यहां तक कि सूख राहत के कार्यों में भी जानवरों को चारे और पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने पर विशेष ध्यान देने पर जोर दिया गया है.

वर्ल्ड एनिमल प्रोटेक्शन इंडिया ने एक बयान में कहा, ‘‘आपदा प्रबंधन के केंद्र में पशुधन को एकीकृत करने के लिये काफी लंबी यात्रा तय करनी पड़ती है. अब हम विभिन्न राज्य सरकारों से आग्रह करते हैं कि वे आपात स्थितियों में पशुधन के कल्याण की रक्षा करने के लिये अपने संबंधित राज्य आपदा प्रबंधन में जानवरों को भी शामिल करें.’’

मीडिया एथिक्स

इस योजना में किसी भी आपदा के समय कवरेज करने को लेकर मीडिया के आचार-विचार को लेकर भी दिशा-निर्देश दिये गए हैं और साथ ही मीडिया द्वारा की जाने वाली क्षमता निर्माण गतिविधियों का भी उल्लेख है. ऐसा किसी भी आपदा के दौरान या उसके बाद पत्रकारों को क्या करना चाहिये और क्या नहीं इसकी जानकारी के लिये है. इसके अलावा यह अफवाहों को समाप्त करने के लिये सरकार से नियमित रूप से प्रेस वार्ताएं करने के लिये भी कहता है.

First published: 10 June 2016, 23:26 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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