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खतरे की घंटी: कार्बन डाई ऑक्साइड 400 पीपीएम के पार

निहार गोखले | Updated on: 25 May 2016, 17:13 IST
QUICK PILL
  • 10 मई को ऑस्ट्रेलिया के एयर मॉनिटरिंग सिस्टम ने पहली बार दक्षिणी गोलार्द्ध में कार्बन डाई ऑक्साइड की सघनता को 400 पीपीएम से ज्यादा पाया.
  • साल 2016 में कार्बन डाई ऑक्साइड की बढ़ी मात्रा चिंताजनक इसलिए भी है क्योंकि 2015 में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा में पहले ही रिकॉर्ड बढ़ोतरी हो चुकी है.
  • औद्योगिक क्रांति से पहले धरती की पीपीएम 280 था. पिछले कुछ दशकों में इसमें बेहद तेजी आई है. 1958 के बाद से कार्बन डाई ऑक्साइड में 24 फीसदी की तेजी आई है.

पिछले 15 दिनों में पर्यावरणविदों के बीच 400 पीपीएम जिस तेजी से चर्चा का विषय बना है, वह चौंकाने वाला है. 

400 पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) से धरती के वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड की सघनता का आकलन करते हैं. यह एक ऐसी सीमा है जिसके पार जाना ठीक नहीं. लेकिन अब हमारी दुनिया इस सीमा के पास पहुंच चुकी है.

10 मई को ऑस्ट्रेलिया के एयर मॉनिटरिंग सिस्टम ने पहली बार दक्षिणी गोलार्द्ध में कार्बन डाई ऑक्साइड की सघनता को 400 पीपीएम से ज्यादा पाया. पिछले साल एक और मॉनिटरिंग सिस्टम उत्तरी गोलार्द्ध में ऐसी सघनता की रिपोर्ट कर चुका है.

हालांकि उत्तरी गोलार्द्ध के स्टेशन के आंकड़ों के मुताबिक कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा 400 पीपीएम से अधिक बस थोड़े समय के लिए रही. यह 2012 में गर्मियों के दौरान हुआ था. 

हालांकि अब वैज्ञानिकों का मानना है कि मौजूदा साल इस लिहाज से ज्यादा निर्णायक होगा क्योंकि पहली बार दक्षिणी गोलार्द्ध ने जो आंकड़ा दिया है, उसके मुताबिक यह सघनता थोड़े समय के लिए रहने वाली नहीं है. उनका कहना है कि अब कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा 400 पीपीएम से नीचे नहीं जाएगी.

कितना अहम हैं आंकड़ा

पिछले साल नवंबर में हवाई में मौजूद दुनिया के सबसे पुराने कार्बन डाई ऑक्साइड मॉनिटरिंग स्टेशन ने 400 पीपीएम से अधिक कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा को चिह्नित किया था. 

अमेरिकी सरकार की संस्था नेशनल ओसियन एंड एटमॉस्फिेरिक एडमिनिस्ट्रेशन ने भी जो आंकड़ा जुटाया था वह वैश्विक औसत से ज्यादा था. यह आंकड़ा मार्च महीने का था.

उत्तरी गोलार्द्ध में आबादी कम है और हरियाली ज्यादा है. इसलिए वहां कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा आम तौर पर ज्यादा होती है. प्रत्येक साल गर्मियों और सर्दियों में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा में तेजी आती है.

लेकिन अभी तक यह दक्षिणी गोलार्द्ध में नहीं हुआ था. इसलिए जब केप ग्रिम मॉनिटरिंग स्टेशन ने पहली बार कार्बन डाई ऑक्साइड के 400 पीपीएम से ज्यादा होने की सूचना दी तब वैज्ञानिकों ने यह मान लिया है कि यहां बढ़ी मात्रा में जल्द कमी नहीं आएगी. इसकी वजह मौसमी उतार चढ़ाव का नहीं होना है.

नासा के वैज्ञानिक मिशेल गुंसन ने कहा, '400 का आंकड़ा पार करना हमें यह बताता है कि हम 450 पीपीएम या उससे भी अधिक आंकड़े की तरफ जा रहे हैं. यह सबके लिए एक मनोवैज्ञानिक  नियंत्रण रेखा होनी चाहिए.'

साल 2016 में कार्बन डाई ऑक्साइड की बढ़ी मात्रा चिंताजनक इसलिए भी है क्योंकि 2015 में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा में पहले ही रिकॉर्ड बढ़ोतरी हो चुकी है. इस साल कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा 3 पीपीएम तक बढ़ चुकी है. इसका मतलब यह हुआ कि अगर मौजूदा दर से यह बढ़ना जारी रहा तो हम अगले 20 सालों में  460 पीपीएम तक पहुंच जाएंगे.

हालांकि इस बढ़ोतरी के लिए मानवीय उत्सर्जन ज्यादा जिम्मेदार है. साथ ही अल-नीनो की वजह से भी इसमें बढ़ोतरी होती है. सूखे मौसम की वजह से कार्बन डाई ऑक्साइड तेजी  से ऑक्सीजन में नहीं बदल पाता. 

2016 अब तक का सबसे गर्म साल रहने वाला है. तापमान में 1 डिग्री की बढ़ोतरी हो चुकी है और यह 1.5 डिग्री से बस कुछ ही पीछे है.

2015 में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा में पहले ही रिकॉर्ड बढ़ोतरी हो चुकी है

400 पीपीएम का मतलब होता है कि हवा के एक लाख मॉलेक्यूल में 400 कार्बन मॉलेक्यूल का होना. कार्बन डाई ऑक्साइड धरती से निकलने वाली उष्मा को सोख लेता है और यह प्रक्रिया ग्रीन हाउस प्रभाव कहलाती है. ग्रीन हाउस प्रभाव की वजह से जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया तेज होती है. वातावरण में जितना अधिक कार्बन डाई ऑक्साइड होगा, उतनी ही तेज जलवायु परिवर्तन की दर होगी.

वैसे तो 400 पीपीएम के स्तर को छूना ही बुरी खबर है. लेकिन इससे तत्काल कोई असर नहीं होगा. 

हालांकि इसके दूरगामी असर होंगे. वातावरण में अधिक कार्बन होने से गर्मी बढ़ेगी और धु्रव पर जमे बर्फ के पिघलने की दर में तेजी आएगी. इसके साथ ही समंदर की  अम्लीयता बढ़ेगी जिससे समुद्री जीवन को नुकसान होगा.

कितना पीपीएम सुरक्षित?

औद्योगिक क्रांति से पहले धरती की पीपीएम 280 था. पिछले कुछ दशकों में इसमें बेहद तेजी आई है. 1958 के बाद से कार्बन डाई ऑक्साइड में 24 फीसदी की तेजी आई है. 1958 में ही हवाई में दुनिया का सबसे पहला कार्बन मॉनिटरिंग सेंटर स्थापित किया गया.

सख्त पर्यावरणविद इस स्तर को 280 पीपीएम तक ले जाना चाहते हैं. कई अन्य इसे 350 के नीचे रखना चाहते हैं.

ऐसा समझा जाता है कि 460 पीपीएम दुनिया के तापमान में 3 डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोतरी कर सकता है. फिलहाल हम अपेक्षित तापमान से 0.9 डिग्री सेल्सियस अधिक हैं. हालिया पेरिस समझौता इसे 2 डिग्री सेल्सियस बनाए रखने के पक्ष में है. हालांकि उनकी कोशिश इसे थोड़ा और कम कर 1.5 फीसदी करने की है.

First published: 25 May 2016, 17:13 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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