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नहीं जागे तो ख़त्म हो जाएंगी छत्तीसगढ़ की नदियां

राजकुमार सोनी | Updated on: 16 May 2017, 11:20 IST

बहुत पुरानी बात नहीं है जब नदी में बैराज या एनीकट खेतों में सिंचाई के लिए बनाए जाते थे, लेकिन अब इनका निर्माण उद्योगों को फायदा पहुंचाने के मकसद से किया जाने लगा है. प्रदेश की सबसे बड़ी महानदी पर इस समय कुल 21 बैराज और एनीकट है. इनमें जांजगीर-चांपा जिले के शिवरीनारायण, बंसतपुर, मिरौनी, साराडीह, कलमा और रायपुर के समोदा बैराज का निर्माण तो सीधे तौर पर उद्योगों को पानी देने के लिए किया गया है.

प्रदेश की दूसरी बड़ी नदी खारून में भी छोटे-बड़े सभी तरह के 22 बैराज और एनीकट बनाए हैं, जिनका सीधा लाभ उद्योगों को मिल रहा है. छत्तीसगढ़ जब अविभाजित मध्य प्रदेश का हिस्सा था, तब दुर्ग जिले की लाइफ लाइन के नाम से विख्यात नदी 'शिवनाथ' को एक व्यापारी ने बंधक बना लिया था, यह नदी आज भी आजाद नहीं हो पाई है.

जल विशेषज्ञों का मानना है कि बैराजों और एनीकट के निर्माण ने प्रदेश में बहने वाली नदियों के प्राकृतिक प्रभाव को बाधित कर रखा है. एक नदी में हर दो-तीन किलोमीटर में बनाए गए बैराज और एनीकट की वजह से नदियों के अस्तित्व पर संकट गहरा गया है. अभी तो केवल गर्मी के दिनों में ही पानी को लेकर हाय-तौबा मचती है, लेकिन अगर समय रहते चेता नहीं गया तो आने वाले कुछ सालों में स्थिति ज्यादा भयावह हो सकती है.

क्यों सूखती है नदी?

एक दशक पहले तक प्रदेश की नदियों का पानी दिसंबर और जनवरी माह में ही सूखा करता था, लेकिन अब महानदी, शिवनाथ, केलो, जोंक, माढ़ सहित कई अन्य नदियों का पानी नवंबर में ही सूखने लगता है. बस्तर की जीवनदायिनी समझी जानी वाली इंद्रावती और पहाड़ी इलाके से बहने वाली जशपुर की ईब नदी में अप्रैल तक पानी की स्थिति ठीक-ठाक रहती है, लेकिन अप्रैल के बाद इन नदियों का पानी भी कम हो जाता है.

जल मौसम विज्ञान के उपसंचालक अखिलेश वर्मा का कहना है कि जब तक नदी के उदगम स्थल के आस-पास पोखर और नालों में छोटे-छोटे चेक डेम नहीं बनाए जाएंगे, तब तक नदियों का सूखना बंद नहीं हो सकता. वर्मा कहते हैं, "जब तक हम पानी को ज़मीन के भीतर ठहरने का मौका नहीं देंगे, तब तक नदी की स्वाभाविकता पर खतरा बरकरार रहेगा."

भू-जल दोहन

देश की जल नीति कहती है कि किसी भी संसाधन से जितना जल रिचार्ज हो सकता है उससे अधिक खर्च नहीं होना चाहिए, लेकिन केंद्रीय भू-जल बोर्ड की रायपुर शाखा के सर्वे में यह बात सामने आई है कि प्रदेश की बालोद, बेमेतरा, साजा, बिल्हा, कुरूद, नगरी, दुर्ग, धमधा, पाटन, फिगेश्वर, मालखरौदा, कवर्धा, पंडरिया, पुसौर, धरसींवा और राजनांदगांव सहित कुल 18 तहसीलों में जरूरत से ज्यादा भू-जल का दोहन हो रहा है.

रायगढ़ के बरमकेला और रायपुर से लगभग 77 किलोमीटर दूर धमतरी की स्थिति और भी ज्यादा खतरनाक है, जबकि एक तहसील गुरूर क्रिटिकल जोन में हैं. भू-जल बोर्ड के अनुसार प्रदेश में 12 सौ और 13 सौ मिलीमीटर औसत वर्षा होती है, लेकिन इस वर्षा का महज 10 फीसदी ही रिचार्ज हो रहा है. इसी तरह निर्माण कार्यों में भू-जल के बेतहाशा उपयोग ने भी नदी में पानी उपलब्धता को कमजोर कर दिया है.

जल प्रदूषण

अमूमन प्रदेश की हर छोटी-बड़ी नदी पर या तो निजी इंटकवेल स्थापित है या फिर उद्योगों ने स्वयं के खर्चे पर छोटे-मोटे बांध का निर्माण कर लिया है. रायपुर से लगभग 17 किलोमीटर दूर एक गांव सिलतरा के बेंद्री और मुरेठी गांवों के पास से बहने वाली खारून नदी में फिलहाल चार निजी कंपनियों का इंटकवेल स्थापित है.

इलाके के ग्रामीण कई मर्तबा कई स्तरों पर यह शिकायत कर चुके हैं कि नदी का रास्ता रोककर उद्योगों को पानी दिए जाने से उन्हें रोजमर्रा की जरूरतों के लिए पानी नहीं मिल पा रहा है, लेकिन उनकी गुहार पर कोई ध्यान नहीं दिया गया. फैक्ट्री द्वारा लगाए गए बड़े-बड़े पंपों की वजह से नदी और जमीन के भीतर का पानी इस कदर प्रदूषित हो चुका है कि गांवों के हैंडपंपों से निकलने वाले पानी से भी लोहे के बारीक कण निकलते हैं.

रायगढ़ में स्थापित एक निजी कंपनी जिस धड़ल्ले से केलो नदी के पानी का उपयोग करती है, वह किसी से छिपा नहीं है. एक अन्य निजी कंपनी के केलो से पानी लेने को लेकर आपत्ति उठी तो उसने नदी के किनारे ही भारी-भरकम बोर कर लिया. अब कंपनी का तर्क है कि वह नदी के पानी का उपयोग नहीं कर रही है.

जनचेतना मंच के राजेश त्रिपाठी का कहना है कि रायगढ़ में स्थापित बिजली कंपनी जिस ढंग से तमनार और तराईमाल इलाके में स्थापित संयंत्रों के लिए भूमिगत स्रोतों के अलावा कुरकुट नदी के पानी का इस्तेमाल कर रही है, उससे खतरनाक स्थिति पैदा हो गई है. बिजली घरों का गंदा पानी नदियों में प्रवाहित होने से न केवल प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो गई है, बल्कि पिछले साल रायगढ़ के 1156 हैंडपंपों से पानी निकलना बंद हो गया था और तमनार ब्लॉक के 54 गांव पूरी तरह सूख गए थे.

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला का कहना है कि छत्तीसगढ़ में जब कभी भी किसानों को पानी देने की बात आती है, तो पूरे मामले को जल उपयोगिता समिति और भी न जाने किस-किस तरह की बैठकों में उलझा दिया जाता है, लेकिन जब मामला उद्योगों को पानी देने का होता है तो सारे नियम-कानून किनारे रख दिए जाते हैं. प्रदेश में अब भी 146 से ज्यादा उद्योग नदियों पर बनाए गए बांध, बैराज या एनीकटों से 2507.55 मिलियन घनमीटर पानी ले रहे हैं. उद्योगों को पानी देने के मामले में सरकार मेहरबान है.

अब तक बंधक है शिवनाथ

नदियों को निजी हाथों में सौंपने की सबसे पहली शुरुआत तब हुई थी, जब छत्तीसगढ़ अविभाजित मध्य प्रदेश का हिस्सा था. 26 जून 1996 को दुर्ग जिले के औद्योगिक क्षेत्र बोरई में स्थापित एक स्पंज आयरन कंपनी ने मध्य प्रदेश औद्योगिक विकास निगम की रायपुर शाखा को पत्र लिखकर प्रतिदिन 24 लाख लीटर पानी की मांग की थी. एकेवीएन ने कंपनी को पानी देने का आश्वासन तो दिया, लेकिन निजी कंपनी से यह आग्रह भी किया कि वह शिवनाथ नदी पर एक एनीकट बनाएगा.

कंपनी एनीकट बनाने के लिए तैयार हो गई, लेकिन बाद में राजनांदगांव जिले के कैलाश इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन के कर्ता-धर्ता कैलाश सोनी कूद पड़े. उन्होंने एकेवीएन को प्रस्ताव दिया कि उनके द्वारा ऑटोमेटिक टिल्टिंग गेट तैयार किया गया, जिसके जरिए स्पंज आयरन कंपनी को उसकी मांग के अनुसार पानी दिया जा सकता है. लिहाज़ा, 5 अक्टूबर 1998 को औद्योगिक विकास निगम ने कैलाश सोनी की कंपनी रेडियस वॉटर के बीच बिल्ड, ओन, ऑपरेट एंड ट्रांसफर ( बूट ) सिस्टम से पानी देने के लिए अनुबंध कर लिया. और इस तरह जब एक व्यापारी ने नदी के पानी पर अधिकार जमाया तो गांव के सामुदायिक अधिकार खत्म हो गए.

खनन से भी बरबादी

प्रदेश में इस समय 39 कोयला खदानें हैं और 16 थर्मल पावर प्लांट हैं, जबकि कई बनने को तैयार हैं. सरप्लस बिजली स्टेट बनने की कवायद के चलते भी नदियां मौत के मुहाने पर आ खड़ी हुई हैं. मिनीमाता बांध का ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र 'हसदेव अरण्य' के नाम से जाना जाता है. इस वन क्षेत्र में कोयले का विशाल भंडार है. फिलहाल हसदेव अरण्य के परसा, केटे और कांटे बासन गांव में जहां भरपूर कोयला है, वहां बेधड़क खनन हो रहा है. खुली खदानों से खनन होने से भू-जल स्तर प्रभावित हो रहा है.

इन इलाकों में भू-जल स्तर प्रभावित होने से हसदेव नदी भी बरबादी के कगार पर आ खड़ी हुई है. देश की विभिन्न नदियों के घटते जल स्तर को लेकर कार्यरत संस्था फोरम फॉर पालिसी डायलॉग ऑन वॉटर कन्फ्लिक्ट इन इंडिया की अध्ययन रिपोर्ट कहती है कि बिजली घरों के गंदे पानी की निकासी की वजह से हसदेव नदी में न केवल प्रदूषण बढ़ गया है, बल्कि नदी के बहाव में गिरावट आई है.

छत्तीसगढ़ के पूर्व जल संसाधन मंत्री रामचंद्र सिंहदेव का कहना है कि नदियों में जितने भी एनीकट बनाए गए हैं, वह एनीकट निर्माण की थ्योरी के विपरीत है. सामान्य तौर पर एक एनीकट का 75 फीसदी हिस्सा खुला रहना चाहिए, लेकिन जरूरत से ज्यादा पानी रोकने के चक्कर में 25 फीसदी हिस्सा ही खुला रखा जाता है. एनीकट में मिट्टी जमा होने लगती है, जिससे नदी में पानी का प्रवाह प्रभावित होता है.

एक एनीकट बैक वॉटर (जहां पर पानी पहुंचता है) उससे दो किलोमीटर दूर बनना चाहिए, लेकिन इस नियम का पालन भी नहीं किया जाता. प्रदेश में महानदी, सोनगंगा और इंद्रावती बेसिन (कछार) है. इन नदियों में जल की उपलब्धता और उसके उपयोग को लेकर कोई मास्टर प्लान भी नहीं बनाया गया है जो दुर्भाग्यजनक है.

First published: 16 May 2017, 11:20 IST
 
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