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क्यों 300 जंगली सुअरों और नील गायों को मारने की नौबत आई?

अश्विन अघोर | Updated on: 23 May 2016, 12:38 IST

महाराष्ट्र का चंद्रपुर जिला भारत की बाघ राजधानी कहलाता है. सरहदी इलाके में स्थित तडोबा टाइगर रिजर्व जैसे रहवास और जिलेभर में फैले घने जंगलों के कारण चंद्रपुर जिले में 100 से अधिक बाघों और 300 से अधिक तेंदुओं के होने का अनुमान है.

सबसे ज्यादा वनों और वन्य जीवों के घनत्व के कारण चंद्रपुर जिले में अक्सर मानव और पशुओं के बीच संघर्ष होता रहता है. कई बार ये जंगली बिल्लियां अपनी हद पार कर जाती हैं तो कई बार घास-फूस खाने वाले शाकाहारी जंगली जीव खेतों में खड़ी फसल रौंद डालते हैं.

मनुष्य और जानवरों के बीच संघर्ष चंद्रपुर जिले के लिए नई बात नहीं है. लेकिन आखिर में इसकी कीमत हर बार वन्य जीवों को ही चुकानी पड़ती है. उन्हें हमेशा या तो मार डाला जाता है या दूसरी जगह स्थानांतरित कर दिया जाता है.

मनुष्य और जानवरों के बीच संघर्ष चंद्रपुर जिले के लिए नई बात नहीं है

अभी हाल ही में एक घटना हुई. जंगली सुअरों और नीले बैलों (नील गायों) द्वारा फसलों को तबाह कर डालने की कई शिकायतों के बाद स्थानीय वन विभाग ने पिछले कुछ महीनों में ऐसे 300 जानवरों को मार डाला.

जिले में जंगली सुअरों और नील गायों से फसलों को पैदा हुए खतरे की पहली सूचना इस साल जनवरी की शुरुआत में मिली थी. कई किसानों ने यह शिकायत की कि जंगली जानवरों द्वारा फसल तबाह कर देने के कारण उन्हें भारी नुकसान हुआ है.

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जब फसलों पर जंगली जानवरों के धावे हद से ज्यादा बढ़ गए तब लोगों ने इन जानवरों को मार डालने की मांग शुरू कर दी. जब दबाव बढ़ गया तो राज्य के वन विभाग ने सुअरों और नील गायों को मारने के निर्देश जारी कर दिए.

जहां एक ओर, वन विभाग का दावा है कि जंगली जानवरों को मारने का निर्णय ग्रामीणों से लगातार शिकायतों के आधार पर लिया गया था, वहीं दूसरी ओर पर्यावरणविदों को लगता है कि विभाग मनमाने ढंग से जानवरों को मार रहा है. दिलचस्प बात यह है कि जंगली जानवरों को मारने के लिए आंध्र प्रदेश से पेशेवर शिकारियों को बुलाया जा रहा है.

स्थानीय वन विभाग ने पिछले कुछ महीनों में ऐसे 300 जानवरों को मार डाला

वन विभाग इन जानवरों को सुरक्षित जंगलों में स्थानांतरित करने को लेकर चुप्पी साध लेता है. वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी, जो अपना नाम नहीं देना चाहते, कहते हैं कि "विभाग के पास समस्या बन चुके जानवरों को मारने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. अन्यथा, लोगों के बीच असंतोष और आक्रोश बढ़ जायेगा जिससे वे अन्य वन्यजीवों को भी मारने लगेंगे, ऐसी स्थित वन्य जीवों के लिए और बड़ी समस्या हो जायेगी."

जब वन विभाग के अधिकारियों से यह पूछा गया कि क्या इन जानवरों को अन्य जंगलों में स्थानांतरित करने का विकल्प खोजा गया था तो अधिकारियों ने इस विकल्प को यह कहकर खारिज कर दिया कि इन जानवरों स्थानांतरित करना विभाग के लिए संभव नहीं है क्योंकि उनके पास इन जानवरों को पकड़ने की विशेषज्ञता ही नहीं है.

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सुरेश चोपने चंद्रपुर के एक वन्यजीव कार्यकर्ता और राज्य वन्यजीव बोर्ड के सदस्य हैं, इन्होंने वन्य जीवों की हत्या के विरोध में आंदोलन का नेतृत्व किया था. इन्होंने वन विभाग में कई शिकायतें दर्ज कराई और वन विभाग के अधिकारियों वन्य जीवों की हत्या की बजाय अन्य विकल्पों का पता लगाने के लिए कई बैठकें भी की हैं.

चोपने कहते हैं कि "हमारी शिकायतें तो बहरे कानों पर असर ही नहीं कर पा रही हैं. लगता है मेरे सभी पत्र और शिकायतें कूड़ेदान में फेंक दिए गये हैं. जब भी हमने वन्य जीवों को स्थानांतरित करने के बारे में बात करने की कोशिश की, अधिकारियों ने इस बारे में विचार करने से भी मना कर दिया. अब हम वन्य जीवों की हत्या को रोकने के लिए एक जन आंदोलन शुरू करने के लिए योजना बना रहे हैं."

चंद्रपुर जिले में जंगली सुअरों की मनमाने ढंग से हत्या से जानवरों पर बहुत बुरा असर पड़ना तय है

भारतीय वन्यजीव संरक्षण सोसायटी (डब्ल्यूपीएसआई) के मध्य भारत के निदेशक नितिन देसाई कहते हैं, "यह एक नासमझी भरा निर्णय है. कोई भी समझ सकता है कि नियंत्रित संख्या में वन्य जीवों का शिकार एक विकल्प हो सकता है. लेकिन चंद्रपुर जिले में जंगली सुअरों की मनमाने ढंग से हत्या से जानवरों पर बहुत बुरा असर पड़ना तय है. जानवरों की हत्या करने वाले को उनके चयन के दौरान बहुत सावधान रहने की जरुरत होती है."

देसाई के अनुसार, इन जानवरों को आसानी से मेलघाट टाइगर रिजर्व या पेंच रिज़र्व जैसे अन्य बाघ रहवासों में स्थानांतरित किया जा सकता था. जानवरों को स्थानांतरित करने में रसद समस्याओं के दावे को खारिज करते हुए देसाई कहते हैं, "जंगली सुअर इतने चुस्त होते हैं कि उन्हें आसानी से अन्य जंगलों में स्थानांतरित किया जा सकता है. वन विभाग को इन जानवरों को मेलघाट टाइगर रिजर्व में स्थानांतरित करने पर विचार करना चाहिए क्योंकि वहां बाघों और तेंदुओं के लिए शिकार की भारी कमी है."

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उन्होंने कहा कि मेलघाट टाइगर रिजर्व में हाल ही में किए गए एक विश्लेषण से खुलासा हुआ है कि वहां बाघ जो शिकार करते हैं अब उसमें बड़ा हिस्सा छोटे कीड़ों का है क्योंकि उनके शिकार के लिए बड़े पशु हैं ही नहीं.

देसाई ने कहा "यह जंगली सुअरों को स्थानांतरित करने के लिए आदर्श क्षेत्र है. वे यहां न केवल जीवित रहेंगे, बड़ी संभावना है कि मेलघाट टाइगर रिजर्व में छोड़े जाने पर वे वहां भी पनप जायेंगे." चंद्रपुर के मुख्य वन संरक्षक एसपी ठाकरे से इस संबंध में बातचीत नहीं हो पाई.

First published: 23 May 2016, 12:38 IST
 
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