Home » एन्वायरमेंट » क्या अवैध शिकारियों को देखते ही गोली मार देना सही है?
 

वनरक्षकों द्वारा बड़ी संख्या में मारे जा रहे शिकारियों के बावजूद शिकार पर लगाम क्यों नहीं?

आकाश बिष्ट | Updated on: 1 March 2017, 7:52 IST

असम के काजीरंगा नेशनल पार्क पर बीबीसी की डॉक्यूमेंटरी (किलिंग फॉर कंजरवेशन) का विवाद अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि कॉरबेट नेशनल पार्क को लेकर विवाद उठ खड़ा हुआ. बीबीसी ने काजीरंगा के वनरक्षकों पर अवैध शिकारियों को मारने का आरोप लगाया था. कुछ इसी तरह के आरोप पर कॉरबेट पार्क के कार्यकारी निदेशक पराग धकाती को बर्खास्त किया गया है.

धकाती ने 5 दिन के लिए खास अवैध शिकार-विरोधी मुहिम का ऐलान करते हुए स्टाफ को आदेश दिया था कि वे अवैध शिकारियों को देखते ही गोली मार दें. उनके इस आदेश से बवाल मच गया. कॉरबेट नेशनल पार्क भारत का एक प्रमुख टाइगर संरक्षण स्थल है. बाद में वन विभाग ने स्पष्टीकरण दिया कि उसने ऐसा कोई आदेश जारी नहीं किया. धकाती ने अपनी सफाई में कहा कि उन्होंने अपने स्टाफ को महज याद दिलाया था कि वे अभियोजन पक्ष से मुक्त होने का आनंद ले रहे हैं, और उनकी बात को गलत समझा गया.

कुछ वन्यजीव एवं कानून विशेषज्ञ नेशनल पार्क और अन्य संरक्षण स्थलों में अवैध शिकारियों को देखते ही गोली मारने के आदेश के पक्ष में हैं, तो कुछ नहीं हैं.

इतना कठोर कानून नहीं हो सकता

सीआरपीसी और आईपीसी में अवैध अधिकारियों को देखते ही गोली मारने का आदेश नहीं हैं. यहां तक कि पुलिस को भी यह अधिकार नहीं है. वे ऐेसा केवल कर्फ्यू के दौरान ऐसा कर सकते हैं. उसके लिए भी ऊपर से आदेश होना चाहिए.  पर क्या किसी को ऐसे अधिकारिक कानून की जानकारी है? हमारे यहां ऐसा कठोर कानून नहीं है.

ग्लोबल टाइगर फोरम के सहायक महासचिव एसपी यादव ने कहा, ‘कश्मीर में लोगों को गोली मारने को लेकर काफी तूफान मचा हुआ है, इस तरह के आदेश की पूरे देश में कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया होगी.’ यादव पहले नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) के डीआईजी रह चुके हैं.

बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री के बारे में यादव ने दावे से कहा कि उसमें काफी बढ़ा-चढ़ा कर कहा गया है. अवैध शिकारी काजीरंगा में ‘मरने-मारने की नीयत’ से आते हैं. उन्होंने बताया कि गैंडे की चमड़ी लगभग बुलैटप्रूफ होती है. गैंडे को मारने के लिए शिकारियों को कम से कम 10 मीटर दूर रहना होता है. उन्होंने आगे कहा, ‘बुलैट से गैंडा नहीं मरता, वे उसे सिर्फ रोकते हैं, भागने नहीं देते. फिर उनके सींग को उनके जीते जी काटा जाता है.

पर यदि गैंडा पलटवार करे, तो उनके मरने में कुछ बाकी नहीं रहता. यदि शिकारियों को वन अधिकारी देख लेते हैं, तो वे उन पर गोली चला देते हैं. इस तरह के तत्व काजीरंगा तक सीमित हैं. इस तरह के नियम देश के अन्य नेशनल पार्कों में लागू नहीं किए जा सकते.’

शिकारी जनजातियां कहां जाए?

यादव का समर्थन करते हुए टाइगर वॉच के धर्मेंद्र खांडल ने कहा कि इस तरह का आदेश राजस्थान में रणथंभोर जैसे नेशनल पार्क में कहर बरपा देगा. खांडल ने रणथंभोर परिधि में रहने वाली आखेटी जनजातियों को आजीविका के विकल्प तलाशने का प्रशिक्षण दिया है. खांडल मानते हैं कि स्थानीय लोगों को नाराज करने से वे संरक्षण के विरोधी हो जाएंगे.

उन्होंने कहा, ‘पार्क में 150 मंदिर हैं, जहां पूरे साल लोग आते हैं. यदि यहां ऐसा आदेश हुआ, तो सैकड़ों मारे जाएंगे और जवाबी हमला होगा. लोग वन में शौच करते हैं, अपने जानवरों को पार्क में अंदर तक चराने ले जाते हैं, कुछ ईंधन के लिए लकडिय़ां भी इकट्ठी करने जाते हैं. यदि वे इस तरह के आदेश से शिकारी मारे गए, तो अराजकता फैल जाएगी.’

खांडल सहमत थे कि काजीरंगा का मामला अलग है. यदि शिकारी यहां एके-47 के साथ आएंगे, तो उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए. खांडल ने दावा किया कि राजस्थान में ऐसा नहीं है. यहां उनका संगठन स्थानीय समुदाय को संरक्षण के लिए स्टेकहोल्डर्स बना रही है. उनका प्रयास सार्थक भी हो रहा है. फिर भी उन्होंने कहा, ‘यदि कोई गंभीर खतरा बनते हैं, तो उसे मार दिया जाना चाहिए, भले ही वह टाइगर क्यों ना हो.’

कॉरबेट के एक वरिष्ठ अधिकारी की भी यही राय थी. उन्होंने कहा कि वन अधिकारियों को वन की रक्षा कानून के दायरे में रहकर करनी चाहिए. उन्होंने आगे कहा, ‘ऐसा नहीं है कि ये विदेशी हैं, जिन्होंने हमारे देश के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी है. उन्हें पकडऩे की आवश्यकता है और कानून के मद्देनजर उन पर कार्रवाई की जाए. यह कोई वाइल्ड वेस्ट नहीं है.

मानवाधिकारों का सम्मान करना ही होगा.’ अधिकारी ने आगे कहा कि वन के स्टाफ और वन्यजीवों के लिए जो खतरा बनेंगे, उसे गोली मारते समय उनके हाथ नहीं कांपेंगे. ‘पर यह लापरवाही से नहीं होना चाहिए. विरोध अपनी क्षमता के भीतर दर्शाया जाना चाहिए.’

सख्त कार्रवाई की जाए

इन विचारों से इतर विशेषज्ञों के अन्य वर्ग ने दावा किया कि शिकारी दुस्साहसी हैं, जो वन्यजीव को नुकसान पहुंचाने की नीयत से आते हैं. उनके साथ कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए. डॉ. एमके रणजीत सिन्हा अधिक संख्या में नेशनल पार्क बनाने और वाइल्ड लाइफ एक्ट, 1972 के लिए जाने जाते हैं. वे अवैध शिकारियों को मारने के पक्ष में हैं, जो वन्यजीवों को मारने की मंशा से आते हैं.

उन्होंने दावा किया, ‘नेशनल पार्क में भला कोई बंदूक लेकर क्यों आएगा, जबकि साफ हिदायत है कि किसी को भी उसके साथ अंदर जाने की अनुमति नहीं है. क्या वन अधिकारी उनसे (शिकारियों) मारे जाने का इंतजार करें? खतरे बहुत ज्यादा हैं. काजीरंगा में यदि सख्त कदम नहीं उठाए जाते, तो हम इतने गैंडे जीवित नहीं देख पाते.’

रणजीत सिन्हा का मानना है कि शिकारियों को आत्मसमर्पण करने के लिए कहा जाना चाहिए. यदि वे ऐेसा नहीं करें, तो वन अधिकारियों को उनके साथ विधि प्रवर्तन एजेंसी जैसी कार्रवाई करनी चाहिए. उन्होंने चेताया भी कि व्यक्तिगत उपलब्धियां बनाने के लिए कानून का दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए. शिकारियों के एनकाउंटर के बारे में जांच आश्वस्त करे कि कोई निर्दोष नहीं मारा गया है.

वन (वन्यजीव) के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक जगदीश किशवान ने कहा कि उन घोर अपराधियों को गोली मारना उचित है, जो वन अधिकारियों को मारते हुए नहीं थकते. जब उन्हें एके-47 से लैस शिकारियों का सामना करना पड़ता है, उनके लिए एकमात्र विकल्प गोली दागना रहता है. उन्होंने कहा, ‘एक वन पालक के मरने की बजाय हथियार से लैस शिकारी को मारना ज्यादा बेहतर है.’

इंटेलिजेंस एजेंसियां दोषी

किशवान ने इस विवाद में इंटलिजेंस एजेंसियों का एक नया आयाम जोड़ दिया. उन्होंने वर्तमान हालात के लिए उन्हें दोषी ठहराया. उन्होंने कहा कि शिकारियों के नेटवर्क पर छापा मारने में एजेंसियां विफल रही हैं. गैंडों का अवैध शिकार दशकों से हो रहा है और हम अब तक उन सरगनाओं को नहीं पकड़ सके हैं, जो मासूम लोगों को इस काम के लिए रखते हैं.

नेशनल पार्क की सीमा पर रह रहे समुदायों के लिए किशवान कहते हैं कि उन्हें संरक्षण के काम में स्टेकहोल्डर्स बनाया जाए, ताकि वे शिकारियों के साथ जुडऩे की बजाय शिकारियों के नेटवर्क पकडऩे में मदद कर सकें. उनका तर्क था, ‘जब ड्रग्स अवैध बिकने की बात आती है, हम बड़ी कानूनी कार्रवाई करते हैं, पर वन्यजीवों के उत्पाद बड़ी आसानी से देश से बाहर ले जाए जाते हैं. हम अब तक उन मार्गों को नहीं पहचान सके हैं, किसी सरगना को नहीं पकड़ सके हैं. यदि हम इंटलीजेंस का काम सुधारें, तो कोई भी मासूम, यहां तक कि शिकारी भी नहीं मारा जाएगा.’

First published: 1 March 2017, 7:52 IST
 
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