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'सिंगल टाइम जोन' से भारतीयों की जिंदगी पर पड़ रहा बुरा असर, जानें क्या है वजह

कैच ब्यूरो | Updated on: 12 February 2019, 17:03 IST

हर देश में समय यानि टाइम देखने के लिए टाइम जोन निर्धारित किया जाता है. भारत में भी ब्रिटिश काल मेें टाइम जोन की शुरुआत की गई थी. ब्रिटिश काल में भारत में एक टाइम जोन की शुरुआत की गई थी, लेकिन अब आकर पता चला है कि सिंगल टाइम जोन की वजह से भारत के लोगों की जिंदगी पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है. वैसे इस सिंगल टाइम जोन को एकता के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता था,लेकिन कुछ लोग इसे ठीक नहीं मानते.

बता दें कि भारत की पूर्व से पश्चिम तक की दूरी करीब 2933 किलोमीटर है, इस वजह से पूर्व में सूर्योदय और सूर्यास्त पश्चिम से 2 घंटे जल्दी होता है. इसीलिए उत्तर-पूर्वी राज्य के लोगों को उनकी घड़ियां आगे बढ़ने की आवश्यकता पड़ती है, जिससे सूर्योदय के उपरांत ऊर्जा का क्षय न हो. टाइम जोन की वजह से बड़ी संख्या में लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है, खासतौर पर उन लोगों को जो गरीबी में जिंदगी जी रहे हैं.

बता दें कि पूर्व में पश्चिम से दो घंटे पहले सूर्योदय होता है. सिंगल टाइम जोन के आलोचकों का कहना है कि पूर्वी भारत में दिन की रोशनी का इस्तेमाल ठीक से हो सके, इसके लिए भारत को दो अलग मानक समय के बारे में सोचना चाहिए. जिसके कारण पूर्व में रहने वाले लोगों को दिन की शुरुआत में ही लाइटों का इस्तेमाल करना पड़ता है, जिससे बिजली की अधिक खपत होती है.

सूर्योदय और सूर्यास्त से शरीर की घड़ियों और सर्कैडियन रिदम भी प्रभावित होती हैं. जैसे-जैसे शाम ढलती जाती है, वैसे ही शरीर स्लीप हार्मोन मेलाटोनिन प्रड्यूस करता है, जिससे सोने में मदद मिलती है. कोर्नेल यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री मौलिक जगनानी का मानना है कि सिंगल टाइम जोन नींद की गुणवत्ता को कम करता है.

खासतौर पर गरीब बच्चों की नींद की गुणवत्ता इससे कम होती है. इस वजह से उनकी पढ़ाई भी प्रभावित होती है. भारत में लगभग सभी स्कूल एक ही समय पर शुरू होते हैं लेकिन जहां सूरज देरी से ढलता है वहां बच्चे देरी से सोते हैं. सूरज का एक घंटे देरी से ढलने की वजह से बच्चे की नींद 30 मिनट तक कम हो जाती है. इन सबका प्रभाव सबसे अधिक गरीब बच्चों पर पड़ता है, जिनके घरों में आर्थित समस्याएं रहती हैं.

यही नहीं वे बताते हैं कि इससे छात्रों के परीक्षा परिणामों पर भी असर पड़ता है. वार्षिक औसत सूर्यास्त के समय में एक घंटे की देरी से शिक्षा में 0.8 साल की कमी आ जाती है. वो बच्चे जो उन जगहों पर रहते हैं जहां सूर्यास्त देरी से होता है, उनके प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल पूरा कर पाने की संभावना कम होती है.

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First published: 12 February 2019, 17:03 IST
 
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