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पानी की कीमत पर आईपीएल का कुतर्क

निहार गोखले | Updated on: 13 April 2016, 16:19 IST
QUICK PILL
  • वानखेड़े में मैच कराए जाने को लेकर सरकार ने आखिरी समय में मंजूरी दी. बंबई हाई कोर्ट में दायर एक याचिका में आईपीएल को महाराष्ट्र के तीन शहरों में कराए जाने के फैसले को चुनौती दी गई है क्योंकि राज्य में पानी संकट की स्थिति बेहद भयानक हो चुकी है.
  • कैच में कुछ दिन पहले प्रकाशित जयदीप घोष का एक लेख आईपीएल को जारी रखने की पुरजोर वकालत करता है. उनका तर्क है कि महाराष्ट्र या देश के सूखे की वजह आईपीएल नहीं है.
  • घोष के मुताबिक यह सरकार की बड़ी विफलता है. देश की बड़ी आबादी सबसे बड़ी समस्या है. यह सब कुछ चट कर जाती है जो उसे दिया जाता है. इसके बाद वह और अधिक की मांग करती है.

इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) को आखिरकार मुंबई में कराने की मंजूरी मिल ही गई. वाणखेड़े स्टेडियम में आईपीएल के 9वें संस्करण का आगाज होगा जिसे बहुत लोग क्रिकेट कहने से कतराते हैं.

वानखेड़े में मैच कराए जाने को लेकर सरकार ने आखिरी समय में मंजूरी दी. बंबई हाई कोर्ट में दायर एक याचिका में आईपीएल को महाराष्ट्र के तीन शहरों में कराए जाने के फैसले को चुनौती दी गई है क्योंकि राज्य में पानी संकट की स्थिति बेहद भयानक हो चुकी है. लातूर में तो पानी संकट के कारण दंगों की आशंका को देखते हुए सरकार को धारा 144 तक लगाने का फैसला लेना पड़ा.

हालांकि आईपीएल को महाराष्ट्र में कराए जाने और नहीं कराए जाने के फैसले को लेकर दो पक्ष बन चुका है. वरिष्ठ खेल पत्रकार जयदीप घोष ने हाल ही में एक लेख लिखा था जिसका नाम था, 'नथिंग टू गेन बाई शिफ्टिंग आईपीएल.' 'मतलब आईपीएल को महाराष्ट्र से बाहर कराए जाने के बावजूद कुछ हासिल नहीं होगा. इससे बेहतर है कि सूखे से निपटने के लिए कुछ काम किया जाए.'

लातूर में तो पानी संकट के कारण दंगों की आशंका देखते हुए सरकार को धारा 144 तक लगाने का फैसला लेना पड़ा

मैं घोष के इस लेख हर तरह से नजरअंदाज करुंगा, क्योंकि कैच में हमने कुछ मूल्यों को तय किया है जिसमें पानी का संरक्षण प्रमुखता से शामिल है. मुझे लगता है कि घोष के तर्क को खारिज किए जाने की जरूरत है.

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घोष अपने लेख में कहते हैं कि आईपीएल को जारी रखा जाना चाहिए क्योंकि इसकी वजह से राज्य में सूखा नहीं पड़ा है. वास्तव में घोष के मुताबिक, 'यह सबकी विशेषकर सरकार की बड़ी विफलता है. देश की बढ़ती आबादी सबसे बड़ी समस्या है जो सब कुछ चट कर जाती है, उसे जो कुछ दिया जाता है. इसके बाद वह और अधिक की मांग करती है.'

विडंबना यह है कि घोष को लगता है कि आईपीएल एक वैसी ईकाई है जो आबादी से अलग है. वह इस बात को अगली लाइन में जाहिर भी कर देते हैं. वह कहते हैं, यहां पर मुर्गी और अंडे वाली स्थिति है. जितने अधिक लोग उतना अधिक वोट. इसलिए राजनीतिक दल इसे सुलझाते नहीं है. हालांकि यह एक 'अलग कहानी' है.

हमें नहीं लगता कि इसमें कोई दूसरी कहानी है. तो फिर घोष कहना क्या चाहते हैं? वह कहते हैं, 'खाली पड़ा मैदान, कुंओं और तालाबों को नहीं भर सकता. लेकिन चुपचाप किए गए काम से इसे भरा जा सकता है.'

मुझे खुशी है कि उन्होंने कुंओं का जिक्र किया.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक वानखेड़े स्टेडियम में हर दिन करीब 69,000 लीटर पानी की जरूरत होती है. इसमें से 19,000 लीटर निगम पीने के पानी के कोटे से देता है और बाकी पानी की आपूर्ति निजी टैंकरों से होती है जिनमें करीब 10,000 लीटर पानी भरा होता है. इन टैंकरों में पास के कुंओं से पानी भरा जाता है. 

वानखेड़े स्टेडियम में हर दिन करीब 69,000 लीटर पानी की जरूरत होती है. इसमें से 19,000 लीटर निगम पीने के पानी के कोटे से देता है

दूसरी कहानी यह है कि जब टैंकरों को पानी से भरा जा रहा होता है तब स्थानीय लोग टैंकरों से पानी लेने के लिए जद्दोजहद कर रहे होते हैं. वह अपनी आंखों के सामने टैंकरों को वानखेड़े स्टेडियम में जाते हुए देखते रहते हैं.

घोष को शायद यह रुलाने वाली कहानी लग सकती है लेकिन मैं उन्हें थोड़ा और रुलाना चाहता हूं. इस पानी से आप 3,450 बाल्टियों को भर सकते हैं.

ग्रामीण इलाकों में कम से कम 1,725 लोगों को यह पानी दिया जा सकता है. मैं ऐसा इसलिए कह सकता हूं क्योंकि ऐसा कोई नहीं है जिसे बिलकुल पानी नहीं मिलता हो. ऐसे में संभावित लाभार्थियों की संख्या दो से तीन गुणा बढ़ सकती है.

सीएनएन-आईबीएन की एक रिपोर्ट बताती है कि उत्तरी मुंबई में लोग अपने घरों में बड़े बैरलों में ताला लगाकर पानी रखते हैं. ऐसा कहा जाता है कि महानगर को पानी की आपूर्ति करने वाली 7 झीलें सूख रही हैं.

पुणे में आईपीएल का दूसरा मैच खेला जाना है और वहां पहले से ही लोगों को एक दिन के अंतराल पर पानी की आपूर्ति की जाती है. शहर के मेयर का कहना है कि आने वाले दिनों में पानी की आपूर्ति में कटौती की जा सकती है क्योंकि पानी को सूखा प्रभावित गांवों में भेजा जा रहा है.

नागपुर में आईपीएल का तीसरा मैच होना है और यह इलाका विदर्भ क्षेत्र में आता है. यह इलाका पहले से ही सूखा और कृषि संकट की चपेट में है. लेकिन यह सब कुछ घोष की लेखनी से गायब है.

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वास्तव में पूरी लेखनी में वास्तविकता से परहेज किया गया है. घोष चाहते हैं कि हम थोड़ा और गहरे उतरें.

मेरा मतलब है कि जो लोग तेल और गैस खोद सकते हैं वह पानी के लिए भी गहरी खुदाई कर सकते हैं.

क्या घोष को पता नहीं पानी की समस्या का समाधान और अधिक गहरे खुदाई करना नहीं है. गहराई से पानी निकालने का नतीजा हम बुंदेलखंड और मराठवाड़ा में देख चुके हैं. अब इसका असर पंजाब और हरियाणा में भी दिख रहा है.

उन्हें इस तथ्य का भी अंदाजा नहीं है कि ज्यादा गहराई से निकला पानी पीने के बिल्कुल योग्य नहीं होता. उसमें फ्लोराइड जैसी अशुद्धियां होती हैं जो कि फ्लोरसिस जैसी महामारी की वजह बनता है.

उत्तर मुंबई में लोग अपने घरों में ताला लगाकर पानी रखते हैं. महानगर को पानी की आपूर्ति करने वाली 7 झीलें सूख रही हैं

उनका दूसरा समाधान उस तरीके का अनुसरण करना है जिसे मध्य-पूर्व के कुछ देशों ने अपनाया है. मध्य-पूर्व के देश खारे पानी को फिल्टर कर रहे हैं और उसका इस्तेमाल खेती में कर रहे हैं.

ऐसा लगता है कि घोष ने अपना होमवर्क ठीक से नहीं किया. मध्य पूर्व के कुछ ऐसे देश समंदर के पानी को इस्तेमाल करने के लिए बड़ी ऊर्जा खर्च करते हैं. चेन्नई के बाहर लगा डिसैलिनेशन प्लांट पहले से ही तटीय क्षेत्र को नुकसान कर रहा है. अभी भी यह सवाल बना हुआ है कि उससे निकलने वाले कचरे को कहां और कैसे निपटाया जाए.

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घोष और भी कई तरह के तर्क देते हैं. 'मसलन अगर कोलकाता में फ्लाईओवर के नीचे कुछ गरीब लोग दब गए तो क्या वर्ल्ड टी 20 के फाइनल को ईडेन गार्डेन से बाहर कराना चाहिए था?' नहीं.

इसके बाद वह बताते हैं कि कैसे 2004 में विरोध आंदोलन के बावजूद एथेंस ओलिंपिक और फीफा वर्ल्ड कप का आयोजन किया गया. साथ ही 1972 में आतंकी हमले के बावजूद म्यूनिख में ओलिंपिक खेल को नहीं रोका गया.

मैं निश्चित तौर पर आईपीएल के खिलाफ गुस्से को समझ सकता हूं.

यहां मैं यह सोचने लगता हूं कि क्या वाकई में घोष को पता है कि वह क्या कह रहे हैं. क्या उन्हें नहीं पता कि महाराष्ट्र में पानी सीमित है और फिर गर्मी की शुरुआत ही हुई है. ऐसे में पानी की बर्बादी न केवल बर्बादी और लोगों को आक्रोशित कर सकती है बल्कि यह संसाधन की भी बर्बादी है.

यहां यह भी जानना जरूरी है कि उनका यह विचार ऐसे समय में आया है जब अधिकांश खेल पत्रकारों ने इस पर चुप्पी साध रखी है.

First published: 13 April 2016, 16:19 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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