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हिमांशु ठक्कर: श्री श्री के कार्यक्रम से होने वाले नुकसान का अनुमान लगाने में चूका एनजीटी

निहार गोखले | Updated on: 13 March 2016, 9:21 IST

यमुना सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व की नदी है. सालों से यमुना प्रदूषण और अतिक्रमण से जूझ रही है. कुछ लोग मजाक करने लगे हैं कि यमुना को अब नदी कहा जाए या नाला?

दुर्दशाग्रस्त यमुना के लिए नई मुसीबत बना श्री श्री रविशंकर की संस्था आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा कराया जा रहा भव्य कार्यक्रम. ये कार्यक्रम यमुना के डूब क्षेत्र में कराया जा रहा है. जिसकी वजह से यमुना की जैव पारस्थितिकी को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है.

इस कार्यक्रम के आयोजन में कई नियम-कानूनों की अनदेखी की गई. नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल(एनजीटी) ने 'आर्ट ऑफ लिविंग' पर पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन के लिए जुर्माना भी लगाया.

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इन्हीं विषयों पर कैच ने बात की 'साउथ एशियन नेटवर्क ऑन डैम्स, रीवर्स एंड  पीपल' के संयोजक हिमांशु ठक्कर से.

केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडु ने कहा है कि इस कार्यक्रम का इसलिए विरोध हो रहा है क्योंकि ये हिंदु धर्म से जुड़ा है?


देखिए, ये मुद्दा पुरी तरह साफ है. एक, ये पर्यावरण को क्षति पहुंचाने का मामला है. दो, कानून के उल्लंघन का मामला है, तीन, जनवरी 2015 में दिए एनजीटी के फैसले के उल्लंघन का मामला है. इसके अलावा संबंधित संस्थाओं के अपने दायित्व की अनदेखी करने का मामला है.

एनजीटी ने अपने फैसले में इन बातों का साफ जिक्र किया है. ऐसे में इस मुद्दे पर धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिश करना भारतीय संविधान की अवमानना करना है.

एनजीटी ने अपने फैसले में कहा है कि उसके पास बहुत देर से याचिका दायर की गई इसलिए अब वो कार्यक्रम पर रोक नहीं लगा सकता. क्या आप इससे सहमत हैं?


मैं इससे सहमत नहीं हूं. जब दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी(डीडीए) ने कार्यक्रम के लिए 15 दिसंबर को इजाजत दी तो आर्ट ऑफ लिविंग के कार्यक्रम के बारे में पूरी जानकारी नहीं थी.

नदी के डूब क्षेत्र का मुद्दा किसी का निजी मुद्दा नहीं है. ये सामाजिक मुद्दा है. लेकिन याचिकाकर्ताओं को पहले से कैसे पता चलता है आखिर वहां क्या होने वाला है? एनजीटी ने इस पर गौर नहीं किया.

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मनोज मिश्रा को दिसंबर में इसके बारे में पता चला. उन्हें किसानों ने बताया कि श्री श्री रविशंकर कोई कार्यक्रम करा रहे हैं. फिर उन्होंने कार्यक्रम की वेबसाइट देखी.

उन्होंने 11 दिसंबर को इस बाबत लेफ्टिनेंट गवर्नर को चिट्ठी लिखी क्योंकि वो डीडीए के चेयरमैन हैं. उन्होंने लेफ्टनेंट गवर्नर को बताया कि इस कार्यक्रम को अनुमति देना क्यों गैर-कानूनी है और इससे एनजीटी के फैसले का उल्लंघन होता है.फिर भी डीडीए ने चार दिन बाद कार्यक्रम को इजाजत दे दी.

तो क्या उसी समय याचिका दायर नहीं करनी चाहिए थी?


देखिए, कार्यक्रम का जमीनी काम जनवरी में शुरू हुआ. इस बीच मिश्रा विभिन्न एजेंसियों के पत्र लिखते रहे. उनके अलावा भी कई लोगों ने विभिन्न एजेंसियों से इसकी शिकायत की. जब किसी ने कोई कार्रवाई नहीं की तब आठ फरवरी को एनजीटी में मामला दायर किया गया.

क्या एनजीटी को थोड़ा जल्दी सुनवाई करनी चाहिए थी?


एनजीटी ने 14 फरवरी को आईआईटी के प्रोफेसर गोसाईं को जमीनी मुवायना करके एक दिन में रिपोर्ट देने के लिए कहा. प्रोफेसर गोसाईं ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इससे प्रकृति को भारी नुकसान पहुंचेगा. इससे एनजीटी के आदेश का खुला उल्लंघन होता है. उस रिपोर्ट के बाद ही एनजीटी कार्रवाई कर सकती थी.

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लेकिन उसने एक टेक्नीकल कमेटी बनाकर एक और रिपोर्ट मांगी. इस कमेटी के प्रमुख थे केंद्रीय जल संसाधन सचिव शशि शेखर. उस कमेटी ने भी 22 फरवरी को अपनी रिपोर्ट दे दी. अगर एनजीटी ने उस दिन भी फैसला कर दिया होता तो ये नौबत नहीं आती.

ऐसे में एनजीटी का ये कहना सही नहीं है कि याचिकाकर्ता उसके पास देर से आए. ख़ुद एनजीटी ने फैसला करने में देरी की.

ये तर्क कितना सही है कि कार्यक्रम की पूरी तैयारी हो चुकी है इसलिए इसे रोका नहीं जा सकता?


अगर ये कोई विकास कार्य होता जिससे व्यापक जनहित होता तो एक बार इस तर्क को मान भी लिया जाता. लेकिन ये एक निजी कार्यक्रम था. ये जनहित का कार्य कत्तई नहीं था. ऐसे में एनजीटी का ये तर्क मेरे अनुसार ग़लत है.

जल संसाधन मंत्रालय और पर्यावरण मंत्रालय का कहना है कि आर्ट ऑफ लिविंग को कार्यक्रम के लिए उनसे अनुमति लेने की जरूरत नहीं थी. तो क्या ऐसा नहीं लगता कि खुद कानून में ही ऐसे सुराख हैं जिनकी वजह से ऐसा कार्यक्रम होता है?


एनजीटी ने अपने फैसले में कहा है कि कोई भी कार्यक्रम जिससे 50 हेक्टेयर से ज्यादा इलाका प्रभावित होता हो उस पर विशेष कानून द्वारा विचार होगा. पर्यावरण मंत्रालय उसके आधार पर कार्रवाई करने में विफल रहा.

लेकिन कुछ कमियां कानून में भी हैं. नदियों या जलस्रोतों को प्रभावित करने वाले कार्यक्रमों के लिए पर्यावरण मंत्रालय से अनुमति नहीं लेनी पड़ती. जबकि ऐसा कानून होना चाहिए.

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जुलाई 2014 में पर्यावरण मंत्रालय ने नदियों के प्रदूषण से सारे मामले जल संसाधन मंत्रालय के हवाले कर दिए. ऐसे में दुर्भाग्यपूर्ण है कि दोनों मंत्रालय अपना दायित्व निभाने में विफल रहे.

आर्ट ऑफ लिविंग के कई समर्थक अक्षरधाम मंदिर और बाटला हाउस इलाके का हवाला दे रहे हैं कि वो भी यमुना के किनारे हैं लेकिन उसे जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है?


नदी के डूब क्षेत्र में होने वाली किसी भी गतिविधि को इजाजत नहीं देनी चाहिए. लेकिन किसी ने पहले गलत किया है तो इसका ये मतलब नहीं कि अब हर किसी को गलत करने का अधिकार मिल गया है.

एनजीटी ने 13 जून, 2015 के अपने फैसले में साफ कहा था कि नदियों के 25 साल के डूब क्षेत्र में किसी तरह की गतिविधि नहीं होनी चाहिए. लेकिन इस कार्यक्रम में उसका खुला उल्लंघन किया गया. जिसके खिलाफ तत्काल कार्रवाई करने की जरूरत थी.

First published: 13 March 2016, 9:21 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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