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पर्यावरण का संकट: जंगलों का दायरा दुनिया में खतरनाक तरीके से सिमट रहा है

कैच ब्यूरो | Updated on: 15 September 2016, 7:26 IST
(गेट्टी इमेज)

नब्बे का दशक पर्यावरणवादियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा है. 1992 में, संयुक्त राष्ट्रसंघ के तत्वावधान में ब्राजील के रियो डी जनेरो में प्रथम पर्यावरण शिखर सम्मेलन सपन्न हुआ था. इसे 'पृथ्वी शिखर सम्मेलन' भी कहा जाता है. इसमें पारित रियो घोषणा सिर्फ पर्यावरण और विकास से संबंधित एक महत्वपवूर्ण दस्तावेज ही नहीं है, यह एक ऐसा दस्तावेज है जिसे पर्ययावरणविद आज भी बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं.

इस घोषणा ने जैव विविधता की समस्या को मुखर रूप से चर्चा का विषय बना दिया (आज जैव विविधता हर किसी की चिंता का विषय बन चुका है). इस घोषणा ने जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) के लिए आधार तैयार किया (जिसके जरिए हमें जलवायु परिवर्तन पर वार्षिक सम्मेलन, क्योटो प्रोटोकाल और विगत वर्ष पेरिस समझौते जैसी महम्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल हुई हैं).

बावजूद इसके, समस्या की गंभीरता को देखते हुए अभी ये उपलब्धियां काफी सीमित हैं. दर हकीकत ये इतनी कम हैं कि इसका अंदाजा हाल में किए गए एक अध्ययन से लगता है, जिसमें बताया गया है कि 1990 के दशक के बाद से, दुनिया में वन्य क्षेत्र सिकुड़ कर 10 प्रतिशत ही रह गया है. इसका अर्थ है कि वन्य क्षेत्र कुल 33 लाख वर्ग किलामीटर रह गए हैं, जो कि भारत के कुल क्षेत्रफल से कुछ ही अधिक होगा.

करेंट बॉयालोजी के ताजा अंक में 'जंगल क्षेत्रों में भयावह गिरावट से वैश्विक पर्यावरण लक्ष्य कमजोर' शीर्षक से एक शोध प्रकाशित किया है. यह अध्ययन वन्य क्षेत्रों के ह्नास की समस्या की गंभीरता के प्रति सचेत करता है. आस्ट्रेलिया व अमेरिका के आठ वैज्ञानिकों के एक दल ने यह अध्ययन प्रस्तुत किया है.

वैज्ञानिकों ने पाया कि सबसे अधिक क्षति अमेजन के सदाबहार वर्षा वनों की हुई है. यहां 30 प्रतिशत वन्य क्षेत्र हैं. इसी प्रकार मध्य अफ्रीका में 14 प्रतिशत वन नष्ट हो गए हैं. इस अध्ययन में कहा गया है कि यदि वनों के धटने की यही गति जारी रही तो इस सदी के अंत तक दुनिया में कहीं कोई वन क्षेत्र नहीं बच पाएगा.

इस अध्ययन में सबसे अधिक सचेत करने वाला तथ्य है, जंगल या वन की संकीर्ण परिभाषा. वैज्ञानिकों ने वन्य क्षेत्र या जंगल में ऐसे क्षेत्रों को ही माना है जो कि “जैविक और पारिस्थितिकी की दृष्टि ऐसी एक संपूर्ण भूमि के रूप में परिभाषित किए जा सकते हैं जो कि मानव हस्तक्षेप से लगभग मुक्त है.”

इसमें वे क्षेत्र सम्मिलित हैं जहां स्थानीय मूल निवासी भी रहते हैं लेकिन वे क्षेत्र इसमें नहीं आते हैं जहां कृषि या बुनियादी सुविधाओं के लिए जंगलों को बड़े स्तर पर साफ किए गए हैं. वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका और “चट्टानी एवं बर्फीले” तथा झीलो वाले क्षेत्रों को भी इस परिभाषा के अनुसार वन्य क्षेत्रों से बाहर रखा है.

वृक्षारोपण के जरिए विकसित पेड़, उपग्रह से प्राप्त चित्रों में वन्य क्षेत्र ही नजर आते है, लेकिन यह सच है कि वे जंगल नहीं हैं. इस परिभाषा के अनुसार ये वन की परिभाषा में सम्मिलित नहीं किए गए हैं.

इस नियम के अनुसार, अमेजन के सदाबहार वन्य क्षेत्र में 500,000 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है. मान चित्रण तकनीक का उपयोग करते हुए वैज्ञानिकों ने 1990 के दशक से होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन किया है.

कुल 27 पारिस्थितिकी क्षेत्र

इस किस्म का पहला अध्ययन नब्बे के दशक में ही हुआ था. अगला अध्ययन 2002 में किया गया और उसके बाद हाल ही में उपग्रह चित्रों से वन क्षेत्र में हुए परिवर्तनों का निरीक्षण करने और तुलनात्मक अध्ययन के बाद वैज्ञानिकों का यह निष्कर्ष है.

उन्होंने तथाकथित 'विश्व स्तर पर महत्वपूर्ण वन्य खंड' (जो कि कम से कम 10,000 वर्ग किलोमीटर हैं) में परिवर्तनों की भी नाप-जोख की है. अध्ययन में पाया गया है कि 80 प्रतिशत वन ऐसे ही वनखंड हैं. बहरहाल, 1990 के दशक में इस तरह के 350 वनखंडो को चिह्नित किया गया था. तब से 37 वनखंडों में 10,000 वर्ग किलोमीटर तक गिरावट हुई है.

अध्ययन में बताया गया है कि नब्बे के दशक से अब तक कुल 27 पारिस्थितिकी क्षेत्र (वैश्विक स्तर पर अलग-अलग पर्यावरणीय और पारिस्थितिकी रूप से विशिष्ट भौगोलिक इकाइयों का ह्रास हुआ है और उनका वैश्विक स्तर पर महत्व शेष नहीं बचा है.

अध्ययन ने अपने सुझावों में बड़े वन्य क्षेत्रों पर खास जोर दिया है जहां कोई बड़ी मानवीय गतिविधियां या हस्तक्षेप नहीं है. इनमें वन्यजीव गलियारे भी सम्मिलित हैं. अध्ययन का निष्कर्ष है कि वन्य क्षेत्रों का हो रहा यह निरंतर ह्रास, वैश्विक स्तर पर बहुत बड़ी समस्या है.

मनुष्य और प्रकृति दोनों के लिए इसके नतीजे जो हानिकारक और अपूर्णीय क्षति है जिसकी भरपाई संभव नहीं है. अगर यह सिलसिला यों ही चलता रहा तो एक सदी से भी कम समय में हालात वहां पहुंच जाएंगे जब दुनिया में कहीं भी बड़े वन क्षेत्र नहीं बचेंगे.

First published: 15 September 2016, 7:26 IST
 
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