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अर्थ ओवरशूट डे: जब हम ब्याज की बजाय मूलधन में ही सेंध लगा देते हैं

निहार गोखले | Updated on: 8 August 2016, 8:38 IST
QUICK PILL
  • पिछले महीने संयुक्त राष्ट्र ने ग्लोबल मैटीरियल फ्लोज एंड रिर्सोसेज प्रोडक्टिविटी के नाम से एक रिपोर्ट जारी की. रिपोर्ट में कहा गया है कि एशिया और अफ्रीका के मुकाबले उत्तरी अमेरिका और यूरोप के फुटप्रिंट में बढ़ोतरी हुई है.
  • आर्थिक समृद्धि की वजह से हमारी खपत में बढ़ोतरी हुई है और 2008 की मंदी के बाद इसमें आई गिरावट इसकी पुष्टि करता है. आर्थिक स्थिति में सुधार होने के साथ ही इसमें एक बार फिर इसमें बढ़ोतरी हो रही है.

इस साल अर्थ ओवरशूट डे 8 अगस्त को मनाया जा रहा है जो कि चिंताजनक है. अर्थ ओवरशूट डे को इस तरह से समझा जा सकता है-

दुनिया के समुद्रों में मौजूद एक करोड़ मछलियां हर साल करीब 20 लाख नई मछलियों को जन्म देती हैं. हम अगर उनमें में 20 लाख या उससे कम मछलियां खा रहे हैं तो इस बात की गारंटी है कि हमें हमेशा मछलियां मिलती रहेगीं. अगर हम इस सीमा से ज्यादा खाते हैं तो तय है कि एक दिन ऐसा आएगा जब सारी मछलियां खत्म हो जाएगीं.

यानी हम उस एक करोड़ की मूल संख्या में सेंध लगा देंगे जो अभी तक सुरक्षित है. ऐसी स्थिति में अगले साल 90 लाख मछलियां ही बचेंगी जो आगे चलकर 18 लाख मछलियों को जन्म देंगी. यह उल्टा चक्र तब तक चलेगा जब तक सभी मछलियां खत्म हो जाएंगी.

इसलिए खपत का स्मार्ट तरीका अधिकतम 20 लाख मछलियों या फिर उनसे कम को खाने का है और इसकी टामइलाइन 31 दिसंबर को खत्म होती है. लेकिन तब क्या करें जब हम अगस्त में ही वह समय सीमा पार कर चुके हैं.

ओवरशूट डे इसी के बारे में बात करता है. यह केवल मछलियों के बारे में नहीं बल्कि उन सभी प्राकृतिक संपदाओं के बारे में है जो हमें मिला हुआ है और हर साल हम इसकी एक निश्चित संख्या खत्म कर रहे हैं. अगर हम इस तय मात्रा से आगे नहीं बढ़ते हैं और ओवरशूट डे कायदे से 31 दिसंबर को मना रहे हैं तो हम कह सकते हैं हम एक ऐसे समाज में रह रहे हैं जो स्थिरता की अवधारणा पर टिका है.

अब देखिए कि हम इससे कितने दूर हैं. पिछले साल 13 अगस्त को ओवरशूट डे मनाया गया और एक साल के भीतर ही हमने इसमें पांच और दिन की कमी कर दी है. हर साल हम अपने प्राकृतिक संसाधनों का एक हिस्सा चट कर देते हैं और फिर आने वाले वर्षों के लिए हमारे पास और कम संसाधन बचता है.

तो अगर हमें प्रत्येक साल धरती के एक हिस्से का इस्तेमाल करना है तो फिर सोचिए कि हमें कितना इस्तेमाल करना होगा? ग्लोबल फुटप्रिंट नेटवर्क के मुताबिक हमें ऐसी 1.6 धरती की जरूरत होगी. मछली वाले संदर्भ में देखे तो हम 20 लाख के बदले हर साल करीब 30 लाख मछलियों की खपत कर रहे हैं.

एशिया और अफ्रीका के मुकाबले उत्तरी अमेरिका और यूरोप के फुटप्रिंट में बढ़ोतरी हुई है.

इसके लिए कौन जिम्मेदार है? जनसंख्या.

नेटवर्क के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और स्विट्जरलैंड करीब पांच धरती के बराबर खपत करते हैं. वहीं भारत का अनुपात 0.7 गुना है.

पिछले महीने संयुक्त राष्ट्र ने ग्लोबल मटीरियल फ्लोज एंड रिर्सोसेज प्रोडक्टिविटी के नाम से एक रिपोर्ट जारी की. रिपोर्ट में कहा गया है कि एशिया और अफ्रीका के मुकाबले उत्तरी अमेरिका और यूरोप के फुटप्रिंट में ज्यादा बढ़ोतरी हुई है.

आर्थिक समृद्धि बढ़ने के चलते हमारी खानपान की आदतों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है. 2008 की माहमंदी के बाद आदत में आई गिरावट इस बात की पुष्टि करता है. आर्थिक स्थिति में सुधार होने के साथ ही इसमें एक बार फिर इसमें बढ़ोतरी हो रही है.

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट बताती है, 'दुनिया की अर्थव्यवस्था में 2000 के बाद से भौतिक खपत में तेजी आई है और यह सीधे तौर पर चीन की औद्योगिक और शहरी क्रांति से जुड़ा हुआ है.'

भारत में गरीबों के मुकाबले एक फीसदी धनाढ्य लोगों का इकोलॉजिकल फुटप्रिंट करीब 40 गुना ज्यादा है. भारत में हर साल सैकड़ों लग्जरी कारें बेची जाती हैं और आने वाले दशक में यह संख्या तीन गुना होने की उम्मीद है.

First published: 8 August 2016, 8:38 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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