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22वीं सदी तक बाघ और गैंडे किताबों में सिमट जाएंगे

कैच ब्यूरो | Updated on: 3 August 2016, 7:56 IST

शेर, जो जंगल के राजा के नाम से विख्यात है, कभी भारतीय उपमहाद्वीप में खुलेआम विचरण करता था, आज जंगल का यह गुजरात के गिर अभ्यारण्य में महज पर्यटकों के आकर्षण के लिए बचा है. सबसे तेज दौड़ने वाला जानवर चीता कभी गंगा के मैदानों और गुजरात व राजस्थान की अर्धशुष्क जलवायु में दौड़ता रहता था, आज विलुप्त हो चुका है. आखिर, हम कहां जा रहे हैं?

पूरे विश्व के 40 वैज्ञानिकों ने हाल में ही एक संयुक्त बयान जारी कर कहा है कि विशाल आकार वाले जीवों जैसे हाथी, शेर, टाइगर, चीता, गैंडा आदि का यदि हमने बड़े पैमाने पर गंभीरता से संरक्षण नहीं किया तो ये ज्यादा दिन तक देखने को नहीं मिलेंगे. इनकी संख्या घटती जा रही है. 

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बड़े पैमाने पर इनकी घटती संख्या को देखते हुए वैज्ञानिकों ने कहा है कि मानवीय गतिविधियों जैसे तेजी से कटते जा रहे जंगल, प्रजातियों पर मानव प्रभाव और शिकार के कारण सदी के अन्त तक इनकी आबादी पूरी तरह खत्म हो जाएगी. इनके संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयासों की जरूरत है.

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जर्नल बायोसाइंस में प्रकाशित एक आलेख में मेगाफौना (बड़े आकार वाले जानवर जो दूर से ही दिखाई पड़ जाते हैं) की आबादी में तेजी से से गिरावट आई है. उन क्षेत्रों में भी जहां वे बहुतायत में पाए जाते थे.

दक्षिणपूर्व एशिया और सब सहारा अफ्रीका में खासकर ये प्रजातियां तेजी से विलुप्त हो रहीं हैं. गोरिल्ला, गैंडा, टाइगर आदि पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है. 100 किलो से ज्यादा वजन वाले विश्व के 59 फीसदी मांसाहारी और 60 फीसदी पशु पहले से ही विलुप्तप्राय श्रेणी में हैं. दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है ये ओझल होते जा रहे हैं और विज्ञान कहता है कि इसकी वजह पारिस्थितिकी तंत्र का असंतुलन और उसका विनाश होना है.

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मेगाफौना को बड़ा खतरा तेजी से काटे जा रहे जंगलों, मानव-वन्यजीवों के बीच पैदा हुआ टकराव, अवैध शिकार, खेती और चारागाह के लिए जंगलों का सफाया होने से उत्पन्न हो रहा है. इसके चलते जानवरों के प्राकृतिक रहवास खत्म हो गए, जहां ये पलते-बढ़ते थे. बचे-खुचे रहवास भी टुकड़ों में बंट गए हैं.

अध्ययन के एक सह-लेखक वरुण आर गोस्वामी ने मीडिया को जारी एक बयान में कहा है कि वन्यजीवों के रहवासों की कमी, बढ़ती आबादी, कृषियोग्य जमीन का फैलाव, लोगों और वन्यजीवों के बीच समझ का अभाव आदि के चलते एक साथ ही नुकसान हुआ है. लोग लगातार अन्य प्रजातियों के संसाधनों और रहवासों में लगातार अतिक्रमण कर रहे हैं. इसका भारी नकारात्मक असर कई जीवों के ऊपर पड़ रहा है.

विलुप्ति का संकट

अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि व्यापारिक सरोकार वाले माहौल में प्राकृतिक संरक्षण से जुड़े वैज्ञानिक बहुत जल्द ही मेगाफौना की उप-प्रजातियों के लुप्त होने का इतिहास लिखने में व्यस्त हो जाएंगे क्योंकि ये प्रजातियां धरती से पूरी तरह लुप्त हो चुकी होंगी.

अध्ययन में यह भी कहा गया है कि कुछ दुर्लभ प्रजातियां बहुत जल्द ही विलुप्त हो जाएंगी या वे पहले से ही विलुप्त हो चुकी हैं. साड़ जैसा दिखने वाला एक जंगली जानवर कूपरे जो दक्षिणपूर्व एशिया में मुख्यत: पाया जाता था, आखिरी बार 1988 में देखा गया था. उत्तरी कम्बोडिया में पाए जाने वाले सफेद गैंडे सिर्फ तीन ही बचे हैं. सुमात्रा आइसलैंड में पाए जाने वाले गैंडों की आबादी पिछले 30 सालों में 800 से घटकर 100 ही रह गई है.

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अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि केवल कड़ी कार्रवाई से ही इनका संरक्षण किया जा सकता है. वन्यजीवों के संरक्षण के लिए ग्लोबल फंडिंग कम से कम दोगुनी की जानी चाहिए. वन्यजीवों के संरक्षण की अभी जो रूपरेखा है, उसे बदले जाने की जरूरत है ताकि लोग वन्यजीवों के संपर्क में आने से बचे.

हाल ही में 40 वैज्ञानिकों ने जो कुछ कहा है, उसे ध्यान में रखना बहुत जरूरी है. उन्होंने कहा कि एक बायोलॉजिस्ट, इकोलॉजिस्ट और कंजरवेशन साइंटिस्ट होने के नाते हमें यह अच्छी तरह मालुम है कि हम जो कुछ कह रहे हैं, उसमें कुछ भी नया नहीं है. 

हमारे नुस्खे विस्तार से लिखने की बजाए उसे जमीन पर अमलीजामा पहनाना ज्यादा आसान हैं. हमारा उद्देश्य उन्हें साथ लाना है ताकि जानवरों पर अध्ययन करने और उनका रक्षण करने वाले वैज्ञानिकों के वैश्विक समुदाय के बीच आम सहमति को प्रदर्शित किया जा सके. इससे तरीके से इस समस्या की ओर विश्व का ध्यान आकर्षित करने में मदद मिलेगी.

आर्थिक तंगी?

2002 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित जैव विविधता पर सम्मेलन में जैव-विविधता कार्ययोजना पर सहमति जताई गई थी. इसके तहत 2010 तक वैश्विक जैव-विविधता में आ रही गिरावट को पूरी तरह से रोकना था. लेकिन इस उद्देश्य को अभी तक पूरा नहीं किया जा सका है.

2013 में अमरीका के प्रोसीडिंग्स ऑफ दि नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (पीएनएस) के एक अध्ययन में कहा गया कि जैव-विविधता के लक्ष्यों को हासिल न कर पाने की मूल वजह पर्याप्त धन का न मिलना है.

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अध्ययन में यह भी निष्कर्ष निकाला गया है कि वन्यजीवों के संरक्षण के लिए फंडिग में बढ़ोतरी के बाद भी वन्यजीवों की घटती आबादी को रोकने के लिए लम्बा रास्ता तय करना होगा. क्या सरकारें और जनहित में लगी संस्थाएं इस पर ध्यान दे रही हैं?

First published: 3 August 2016, 7:56 IST
 
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