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नन्हें कीट से जगी दुनिया की आस

रंजन क्रास्टा | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • भारत में हर साल क़रीब  120 लाख टन प्लास्टिक की खपत होती है. पूरी दुनिया में प्लास्टिक प्रदूषण का ख़तरा बढ़ता जा रहा है.
  • अमरीका और चीन के वैज्ञानिको के दल को एक नए शोध से पता चला है कि गुबरैले की इल्लियां प्लास्टिक को पचा सकती हैं. वैज्ञानिकों को उम्मीद है इससे प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने की नई राह खुलेगी.

आप आसपास नज़र घुमाएंगे तो आपको तुरंत ही कोई न कोई प्लास्टिक की चीज़ दिख जाएगी. हमें एहसास हो न हो हमारे रोजमर्रा के जीवन में प्लास्टिक की खपत बढ़ती ही जा रही है.

साल 2013 में ही भारत में प्लास्टिक की खपत 120 लाख टन हो चुकी थी. उसके बाद भी देश में प्लास्टिक की खपत में कोई कमी आती नहीं दिख रही है. माना जाता है कि भारत में प्लास्टिक की खपत में हर साल 10 फ़ीसदी की दर से बढ़ोतरी हो रही है.

एक अनुमान के मुताबिक यही हाल रहा तो साल 2020 तक ये खपत बढ़कर सालाना 200 लाख टन हो जाएगी.

जिस कुर्सी पर बैठकर मैंने जिस लैपटॉप पर ये स्टोरी टाइप की है उनका ज्यादातर हिस्सा प्लास्टिक से बना है. आज शहरों और क़स्बों में पानी के लिए भी प्लास्टिक(की बोतल) का इस्तेमाल होता है.

दुनिया में प्लास्टिक कचरा इतना अधिक हो चुका है कि पूरी धरती को उसमें चार बार लपेटा जा सकता है.

प्लास्टिक बन चुका है बड़ा ख़तरा

प्लास्टिक की बढ़ती खपत हमारे पर्यावरण के लिए गंभीर ख़तरा बन चुका है. ये वायु और जल प्रदूषण बढ़ाने वाले प्रमुख कारणों में एक है. लेकिन एक नए शोध से इस ख़तरे से निपटने की नई उम्मीद जगी है.

इंसानों के फैलाए हुए कचरे को साफ करने के लिए नन्हे गुबरैले नयी उम्मीद बन गए हैं. एक नए शोध के अनुसार गुबरैले की इल्लियां प्लास्टिक को पचा सकती हैं.

अमेरिका के स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय और चीन की बीहैंग विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के नए शोध के अनुसार ये इल्लियां पॉलीस्टाइरीन से बनने वाले स्टाइरोफ़ोम(थर्मोकोल) को पचाने में सक्षम हैं.

शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने करीब 100 इल्लियों को हर रोज़ 35-39 मिलीग्राम प्लास्टिक खिलाया.

इस शोध के नतीजों से प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने की एक नयी उम्मीद जग गयी है. इससे पहले तक यही माना जाता था कि प्लास्टिक को प्राकृतिक रूप से नष्ट करना संभव नहीं है.

इन इल्लियों ने प्लास्टिक खाने के बाद कार्बन डाइऑक्साइड और बड़ी मात्रा बॉयोडिग्रेबल पदार्थ (जिस पदार्थ को प्राकृतिक रूप से सड़ाया जा सकता है) का उत्सर्जन किया. इस पदार्थ का खेतों में खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.

इल्लियों को प्लास्टिक को पचाने में महज 24 घंटे लगे. इससे पहले तो प्लास्टिक को भराव वाली जगहों में डिग्रेड करने में दशकों लग जाते थे.

हैरत की बात ये है कि जिन इल्लियों को केवल स्टाइरोफ़ोम खाने को दिया गया उनके स्वास्थ्य पर इसका कोई नकारात्मक असर नहीं देखा गया.

बड़ी उम्मीद, शानदार शुरुआत

इंसान हर रोज़ जितना प्लास्टिक कचड़ा पैदा कर रहा है उसके सामने एक दिन में इन इल्लियों द्वारा पचाए जा सकने वाले प्लास्टिक की मात्रा बहुत कम है. लेकिन इस प्रयोग के बाद उम्मीद की जा रही है कि प्लास्टिक प्रदूषण से छुटकारा पाने का कोई ठोस तरीका निकल सकता है.

शोध में शामिल स्टैनफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के वी-मिन वू ने कहा, "इस खोज ने प्लास्टिक प्रदूषण की ग्लोबल समस्या के हल के लिए नये दरवाज़े खोल दिए हैं."

इस शोध के बाद अब वैज्ञानिक ज़्यादा शक्तिशाली एंजाइम विकसित कर सकें जो प्लास्टिक को ज़्यादा तेज़ी से और बेहतर तरीके से सड़ा सके.

संभव है कि वैज्ञानिक ऐसे एंजाइम भी विकसित कर सकें जिनसे ज़्यादा नकुसानदायक प्लास्टिक की किस्मों (पॉलिप्रोप्लेन और बॉयोप्लास्टिक) को भी सड़ाया जा सके.

समंदर में भी खतरा बढ़ रहा है

प्लास्टिक प्रदूषण से केवल ज़मीन पर ही ख़तरा नहीं है. समुद्र के अंदर भी प्लास्टिक प्रदूषण चिंताजनक स्तर तक पहुंच चुका है. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि समुद्र के हर वर्ग मील जलक्षेत्र में क़रीब 46 हज़ार प्लास्टिक की वस्तुएं तैर रही हैं.

समुद्द के सतह के नीच के पानी में प्लास्टिक प्रदूषण का स्तर और भी ज़्यादा है. एक अनुमान के मुताबिक केवल प्लास्टिक प्रदूषण के कारण हर साल क़रीब 10 लाख समुद्री पक्षी और लगभग एक लाख समुद्री जीव मारे जाते हैं.

इस शोध में शामिल वैज्ञानिकों को उम्मीद है के वो गुबरैला जैसे किसी समुद्री जीव की खोज करने में सफल होंगे जो प्लास्टिक को सड़ा सके.

एक बहुत नन्हें से जीव ने पहले ही इसकी उम्मीद जगा दी है.साल 2011 में वैज्ञानिकों ने ऐसे माइक्रोबी की खोज की थी जो समद्र को प्रदूषित करने वाले माइक्रोप्लास्टिक को खाते हैं. जिसके कारण सतह पर तैरने वाले प्लास्टिक डूबकर समुद्र के तल में चले जाते हैं. और समद्रीय जीवन को कम नुकसान पहुंचाते हैं.

इसी तरह भारत में आईआईटी मद्रास के वैज्ञानिकों ने पाया था कि तीन प्रकार के फफूंद अल्ट्रावॉयलेट प्रकाश में प्लास्टिक का विखण्डन करने में सक्षम हैं.

इन प्रयोगों से ऐसा लगता है कि दुनिया की सबसे बड़ी मुश्किलों में से एक का हाल, दुनिया के सबसे नन्हें माने वाले जीवों के पास हो सकता है.

First published: 16 November 2015, 8:34 IST
 
रंजन क्रास्टा @jah_crastafari

मल्टी-मीडिया प्रोड्यूसर, कैच न्यूज़

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