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दिल्लीः पांच दिन नहीं 5 साल लागू रहना चाहिए सम-विषम का नियम

हेमराज सिंह चौहान | Updated on: 9 November 2017, 18:52 IST

दिल्ली के परिवहन मंत्री कैलाश गहलौत ने गुरुवार को दिल्ली में तीसरी बार ऑड-ईवन फॉर्मूला लागू करने का एलान कर दिया. इस बार ये फैसला दिल्ली में बढ़ते स्मॉग की वजह से लिया गया है. दिल्ली में ये नियम 13 नवंबर से 17 नवंबर तक यानी पांच दिन तक चलेगा. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इन पांच दिनों से दिल्ली की आबोहवा को बेहतर किया जा सकता है? 

हिंदी में एक मशहूर दोहा है, "दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय. जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे को होय." इसका मतलब कि बुरे वक्त में सभी ऊपर वाले को याद और उनसे फरियाद करते हैं, लेकिन अगर इंसान हर वक्त यानी अच्छे वक्त में भी ऊपर वाले को याद करता रहे तो दुख ही नहीं आएगा. 

ऐसा ही कुछ सम-विषम नियम के साथ भी है. यह कोई प्रदूषण हटाने वाली मच्छर मार जैसी दवा तो है नहीं कि इसे लागू किया और प्रदूषण गायब. दरअसल, हवा को सुधारने का काम एक दिन का नहीं बल्कि लगातार होना चाहिए. अगर सरकार इसे लंबे वक्त के लिए लागू कर देती है, तो अगले साल इसी वक्त संभवता सभी को बहुत बड़ा अंतर दिखाई देगा.

दिल्ली में ऑड-ईवन लागू करने पर अगर सरकार गंभीरता से विचार कर रही हैं तो उन्हें कम से कम इसे 5 सालों तक लागू करना चाहिए. इन 5 सालों में दिल्ली सरकार को पब्लिक ट्रांसपोर्ट को सुधारने पर जोर देना होगा. दिल्ली में सीएनजी गाड़ियों को बढ़ावा देने के लिए सीएनजी की कीमतों को फिक्स और कम करना होगा. दिल्ली और एनसीआर में इन्हें एक समान करना होगा. सीएनजी स्टेशनों की संख्या में बढ़ोतरी करनी होगी ताकि लोग लंबी लाइनों में ना फंसें.

दिल्ली में 5 सालों तक इसे लागू करना किसी को भी पहली नज़र में अव्यावहारिक लग सकता है. लेकिन अगर इस विचार पर गंभीरता के साथ आगे बढ़ा जाए तो ये बिल्कुल संभव हो सकता है. लोंगों को छुट्टी और त्योहारों के दिन इससे छूट दी सकती है. महिलाओं के लिए सरकार अलग से बसें चला सकती हैं ताकि वो खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें.

और अगर इस नियम को पांच वर्षों के लिए लागू कर दिया जाता है तो जाहिर सी बात है दिल्ली की सड़कों पर वाहनों की संख्या सीमित होगी, पेट्रोल-डीजल वाहनों की बिक्री पर लगाम लगेगी और सीएनजी वाहनों की बिक्री बढ़ेगी, जो सीधे तौर पर दिल्ली की हवा की गुणवत्ता को अगर सुधारने में काम नहीं आएगी, तो बिगाड़ेगी भी नहीं. इसके साथ ही सरकार को उद्योगों, निर्माणकार्यों, कूड़ा जलाने आदि पर भी लगाम लगानी होगी.

गौरतलब है कि साल 2016 में जनवरी और अप्रैल में दिल्ली सरकार ने इसी फ़ार्मूले को लागू किया था. पर्यावरण से जुड़ी संस्था सेंटर फॉर साइंस एंड एंवायर्मेंट की अनुमिता राय चौधरी ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि दिल्ली सरकार का ये फ़ैसला सराहनीय कदम है.

अनुमिता मानती हैं कि अकेले ऑड-ईवन दिल्ली की प्रदूषण की समस्या का इलाज नहीं है. बदरपुर पॉवर प्लांट को बंद करने, निर्माण कार्य पर रोक, दिल्ली में मेट्रो पार्किंग की फीस में बढ़ोतरी और डीज़ल जेनरेटर सेट पर पांबदी जैसे फ़ैसलों के साथ अगर ऑड-ईवन भी लागू किया जाए तो परिणाम ज़्यादा बेहतर होंगे. कारों पर ऑड-ईवन फ़ार्मूले का मतलब ये बिल्कुल नहीं कि 17 नवंबर के बाद दिल्ली की हवा एकदम ताज़ी हो जाएगी. 

जैसे कि दावा किया जाता है दिल्ली के पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की वजह से इस मौसम में प्रदूषण का स्तर खतरनाक हो जाता है पर ये आधा सच है. इस मौसम के अलावा और महीनों में दिल्ली की हवा का स्तर औसत ही रहता है. एनजीटी लगातार इस पर चिंता जताता रहा है और इससे निपटने के लिए नए आदेश जारी करता रहता है. डीजल गाड़ियों पर प्रतिबंध और ट्रकों के दिल्ली से गुजरने पर ज्यादा टैक्स लेना उसी के तहत किया गया है.

बता दें इस सोमवार से गुरुवार तक दिल्ली की हवा की गुणवत्ता बेहद खराब हो चुकी है. कई इलाकों हवा की क्वॉलिटी का इंडेक्स 451 तक जा पहुंचा है, जबकि इसका अधिकतम स्तर 500 है. दिल्ली के लोधी रोड पर गुरुवार को पीएम 2.5 और पीएम 10 का लेवल 500 के पर जा चुका था. वही, पंजाबी बाग में तो यह लेवल 600 तक पहुंच चुका है. दिल्ली विश्वविद्यालय की बात करें तो यहां भी पीएम 2.5 और पीएम 10 का लेवल 500 से ज़्यादा ही है. ये आंकड़े चौकांने वाले हैं.

सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी लगातार इस पर अपनी चिंता जाहिर कर चुके हैं. फिलहाल दिल्ली गैस चैंबर में तब्दील हो चुकी है. खराब एयर क्वॉलिटी की वजह से बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ पर सबसे बुरा असर पड़ रहा है. इसके अलावा अस्थमा के मरीजों के लिए यह हवा जहर से कम नहीं है.

First published: 9 November 2017, 18:52 IST
 
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