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चमड़ा कारखानों से निकलने वाले दूषित पानी से खेती करना पड़ सकता है महंगा

उमाशंकर मिश्र | Updated on: 23 May 2017, 18:31 IST

यूं तो पानी की कमी के चलते दूषित जल का इस्तेमाल सिंचाई के लिए दुनिया भर में किया जाता है. लेकिन ऐसा करना मिट्टी और भूमिगत जल के लिए बहुत खतरनाक है. कानपुर में चमड़ा कारखानों से निकलने वाले दूषित पानी से हो रही सिंचाई के बाद खेतों की मिट्टी और भूजल के नमूनों का अध्‍ययन करने के बाद शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं.

शोधकर्ताओं की मानें तो चर्म-शोधन इकाइयों (टेनरियों) से निकले दूषित जल से लंबे वक्त तक सिंचाई करने से हानिकारक धातुएं मिट्टी और भूमिगत जल में इकट्ठा हो जाती हैं. भोपाल स्थित मृदा विज्ञान संस्‍थान के शोधकर्ताओं के मुताबिक लंबे वक्त तक टेनरियों से निकले दूषित जल से सिंचाई होने से कानपुर के कई इलाकों की मिट्टी में हानिकारक धातुओं की मात्रा बढ़ गई है, जिसमें क्रोमियम की मात्रा सबसे अधिक पाई गई है.

अध्‍ययन के दौरान टेनरियों से निकले दूषित जल, भूमिगत जल और मिट्टी के नमूने उन कृषि क्षेत्रों से एकत्रित किए गए थे, जहां इस पानी से सिंचाई की जाती है. इससे सिंचित क्षेत्र के नमूनों की तुलना अन्‍य इलाकों की मिट्टी और भूमिगत जल के नमूनों से की गई.

भूमिगत जल के कुछ नमूनों में क्रोमियम की मात्रा आश्चर्यजनक रूप से खतरनाक स्तर पर पहुंच चुकी थी और यह संयुक्‍त राष्‍ट्र की पर्यावरण संरक्षण एजेंसी के मानकों से काफी अधिक पाई गई. यह शोध ‘बुलेटिन ऑफ एन्‍वायरमेंटल कंटैमिनेशन ऐंड टॉक्सिलॉजी’ में प्रकाशित किया गया है.

शोधकर्ताओं की टीम में शामिल एमएल दोतानिया कहते हैं, "टेनरियां पर्यावरण में क्रोमियम के प्रवाह का प्रमुख स्रोत हैं और चर्म-शोधन उद्योग में उपयोग होने वाले कुल क्रोमियम का करीब 40 प्रतिशत हिस्‍सा पर्यावरण में हानिकारक तत्‍व के रूप में सीधे निस्‍तारित कर दिया जाता है."

शोधकर्ताओं द्वारा तैयार किए गए भू-संचय सूचकांक से पता चलता है कि मिट्टी के कुछ नमूनों में कॉपर, निकिल, जिंक, कैडमियम और लेड जैसी धातुओं का स्‍तर सामान्‍य से अधिक था.

टेनरियों से निकले दूषित पानी के नमूनों में कैडमियम का मामूली स्‍तर पाया गया है, जबकि क्रोमियम की मात्रा सबसे अधिक थी. इस पानी का उपचार करके निस्‍तारित करना काफी खर्चीली प्रक्रिया है.

शोधकर्ताओं के अनुसार घरेलू अथवा छोटी औद्योगिक इकाइयों से निकले अपशिष्‍ट जल को बिना उपचारित किए सीधे छोड़ दिया जाता है, जिससे मिट्टी एवं जल प्रदूषित होता है.

कानपुर को "लेदर सिटी" के नाम से भी जाना जाता है. भारत की कई बड़ी टेनरियां यहीं पर हैं. यहां से निकले अपशिष्‍ट जल का उपयोग सिंचाई के लिए करने से मिट्टी में कुल क्रोमियम का स्‍तर सामान्‍य कृषि क्षेत्रों की मिट्टी की अपेक्षा 28-30 गुना अधिक पाया गया है.

कानपुर और इसके आसपास के इलाकों में लंबे समय से मिट्टी और भूमिगत जल प्रदूषित होने के कारण यहां फसलों की उपज में कमी आई है और कुल फसल क्षेत्र भी घटा है.

टेनरियों से निकले दूषित जल में घुलनशील रासायनिक ऑक्‍सीजन, जैव रासायनिक ऑक्‍सीजन, कार्बोनेट, क्‍लोराइड, कैल्शियम और क्रोमियम की मात्रा भारतीय मानक ब्‍यूरो (बीआईएस) के तय मापदंड से अधिक पाई गई है. इसलिए टेनरियों से निकले पानी का इस्तेमाल सिंचाई के लिए करना ठीक नहीं है क्‍योंकि इसका सीधा असर पर्यावरण और मानवीय स्‍वास्‍थ्‍य पर भी पड़ता है।.

मिट्टी में लवण और धातुओं की सांद्रता (तीव्रता) बढ़ने से उसकी गुणवत्‍ता कम हो सकती है और और इसका सीधा असर खाद्य श्रृंखला पर भी पड़ सकता है.

अध्‍ययनकर्ताओं के मुताबिक, "इस समस्‍या से निजात पाने के लिए दूषित जल का उपचार करने वाले संयंत्रों की नियमित निगरानी जरूरी है. यह सुनिश्चित करना होगा कि पर्यावरण में इन अपशिष्‍टों को को निस्‍तारित करने से पहले नियमों का पूरी तरह से पालन किया जाए. इसके साथ-साथ लोगों को जागरूक करना भी जरूरी है, ताकि अपशिष्‍ट जल का उपयोग सिंचाई में करने से रोका जा सके."

(साभारः इंडिया साइंस वायर)

First published: 23 May 2017, 18:31 IST
 
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