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अंधाधुंध विकास और बाघ संरक्षण दोनों एक साथ शायद मुश्किल है

आकाश बिष्ट | Updated on: 5 June 2016, 0:46 IST
(गेट्टी)

नेशनल टाइगर कंजरवेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) के पिछले साल के आंकड़ों के अनुसार देश के 49 बाघ अभयारण्य में बाघों की संख्या में 30% की वृद्धि हुई है.

जनवरी 2015 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बताया कि भारत में इस समय 2,226 बाघ हैं. साल 2010 में देश में 1706 बाघ थे. 

ये आंकडे उत्साह जगाने वाले हैं लेकिन इनसे देश के बाघ अभयारण्य की सही स्थिति का पता नहीं चलता.

बाघ संरक्षण की मुश्किलें

अभयारण्यों का सिकड़ते जाना, पुरातन वन विभाग, विकास के नाम पर बढ़ रही गतिविधियां, कमजोर वन कानून, गांवों के पुनर्स्थापना से जुड़ा कमजोर कानून इत्यादि वो कारण हैं जिनसे बाघों का भविष्य जुड़ा हुआ है.

जिस दिन जावड़ेकर ने बाघों की संख्या बढ़ने की घोषणा की उसी दिन उन्होंने एक और महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की.

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वाइल्ड इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूआईआई) की इस रिपोर्ट के अनुसार विभिन्न बाघ अभयारण्यों को आपस में जोड़ने वाले संपर्क मार्ग सिकुड़ते जा रहे हैं.

ये संपर्क मार्ग ने केवल बाघों बल्कि सभी जंगली जीवों के लिए महत्वपूर्ण हैं. इनकी मदद से विभिन्न समूहों के बीच प्रजनन संभव हो पाता है. दुनिया में कई जीवों की संख्या कम होने का कारण विभिन्न समूहो के बीच प्रजनन रुक जाना रहा है.

इन संपर्क मार्गों से किशोर बाघों को छिपने और अपना क्षेत्र बनाने में मदद मिलती है. इससे उनका मानव आबादी से भी सामना नहीं होता.

बाघ अभयारण्य से बाहर बाघों को जहर देने और मारने की खबरें आती रहती हैं. जनवरी से मई 2016 के बीच 45 बाघ मारे गए. साल 2015 में 69 बाघ मारे गए थे. वास्तविक आंकड़े इनसे अलग भी हो सकती हैं.

वन विभाग की दिक्कतें

कई बाघ अभयारण्यों में कई सालों से नए कर्मचारियों की नियुक्ति नहीं हुई है. जिसकी वजह से वन विभाग की क्षमता कुंद हो गई है. 

वन विभाग के मौजूदा कर्मचारियों में पिछड़ी पीढ़ी की तरह बाघों के बचाव का नैतिक दायित्वबोध का भी अभाव दिखता है.

तस्करों के पास अत्याधुनिक संसाधन होते हैं जबकि वन्यकर्मी आज भी लाठी से करते हैं रखवाली

वन्यकर्मियों के पास वन्यजीव तस्करों से निपटने के लिए संसाधनों का भी अभाव है. आज भी फॉरेस्ट गॉर्ड लाठी से जंगल की रखवाली करते हैं. 

वाइल्डलाइफ ट्र्स्ट ऑफ इंडिया से जुड़े डॉक्टर मयुख चटर्जी लंबे समय से बाघ संरक्षण के क्षेत्र में काम करते रहे हैं. चटर्जी कहते हैं कि तस्कर वन्यकर्मियों से बहुत ज्यादा तेज होते हैं.

चटर्जी कहते हैं, "तस्कर कुछ घंटों में बाघ की टोह ले लेते हैं जबकि वन विभाग को स्थानीय बाघ को खोजने में कई दिन लग जाता है...हालांकि अब कई एनजीओ वन्यकर्मियों को प्रशिक्षित कर रहे हैं लेकिन अभी इस दिशा में काम किया जाना है."

वन्यकर्मियों के पास वन्यजीव तस्करों से निपटने के लिए संसाधनों का भी अभाव है. आज भी फॉरेस्ट गॉर्ड लाठी से जंगल की रखवाली करते हैं. 

वाइल्डलाइफ ट्र्स्ट ऑफ इंडिया से जुड़े डॉक्टर मयुख चटर्जी लंबे समय से बाघ संरक्षण के क्षेत्र में काम करते रहे हैं. चटर्जी कहते हैं कि तस्कर वन्यकर्मियों से बहुत ज्यादा तेज होते हैं.

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चटर्जी कहते हैं, "तस्कर बहुत तेजी से बाघ की टोह ले लेते हैं जबकि वन विभाग को स्थानीय बाघ को खोजने में कई दिन लग जाता है...हालांकि अब कई एनजीओ वन्यकर्मियों को प्रशिक्षित कर रहे हैं लेकिन अभी इस दिशा में काम किया जाना है."

विकास की मार

बाघों के अस्तित्व के लिए विकास कार्य भी बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं. एनएच-7 के चौड़ीकरण से प्रभावित कान्हा-पेंच बाघ अभयारण्य, नागजीरा नावेगांव और तड़ोबा बाघ अभयारण्य इसका उदाहरण है.

डब्ल्यूआईआई और कई एनजीओ ने इसका विरोध किया लेकिन सरकार ने नहीं सुना.

इसी तरह केन-बेतवा नदी लिंकिंग परियोजना को हरी झंडी देने से भी मध्य प्रदेश के पन्ना बाघ अभयारण्य पर नकारात्मक असर होगा.

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अरुणाचल प्रदेश में बनाए जा रहे बड़े बांधों से भी वन्यजीवन को खतरा है. इससे असम का काजीरंगा बाघ अभयारण्य भी प्रभावित होगा.

बाघ अभयारण्यों के निकट पनपने वाली टूरिस्ट गतिविधियों से भी बाघों के प्राकृतिक निवास को खतरा पहुंच रहा है.

देश भर के बाघ अभयारण्यों को प्रभावित करने वाले कारणों की कोई भी सूची अंतहीन होगी. लेकिन जब तक सरकार बाघ संरक्षण को अपनी प्राथमिकता नहीं बनाएगी इस दिशा में कुछ होने की संभावना नहीं है.

अंधाधुंध विकास और बाघ संरक्षण दोनों एक साथ शायद मुश्किल होगा.

First published: 5 June 2016, 0:46 IST
 
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