Home » एन्वायरमेंट » Why India needs to worry about melting glaciers
 

'ग्लोबल वार्मिंग को नहीं रोका गया तो पिघल सकते हैं दो-तिहाई ग्लेशियर, आ सकती है भयानक बाढ़'

कैच ब्यूरो | Updated on: 6 February 2019, 13:15 IST

एक नए अध्ययन में कहा गया है कि यदि ग्लोबल वार्मिंग को सीमित करने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए हैं, तो हिंदू कुश हिमालय में दो तिहाई ग्लेशियर पिघल सकते हैं. इस अध्ययन में कहा गया है कि इससे बड़ी संख्या में नदियों में बाढ़ आ सकती है. हिंदू कुश का हिमालयी क्षेत्र का बड़ा महत्व माना जाता है.

1970 के दशक से लगातार वार्मिंग का प्रभाव इनपर पड़ रहा है. अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यदि ग्लोबल वार्मिंग को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे तक सीमित करने के वैश्विक प्रयास विफल हो जाते हैं, तो यह 2100 तक क्षेत्र के दो तिहाई ग्लेशियरों के पिघलने का कारण बन सकता है.

 

अध्ययन में इसे भयावह बताया गया है. इस क्षेत्र में लगभग 8,790 हिमनदों की झीलें मौजूद हैं. जिनमें से 203 में पर ग्लेशियर के पिघलने से बड़ा असर पड़ सकता है. हिंदू कुश में हर साल औसतन 76 घटनाएं होती हैं. हिंदू कुश एशिया को वाटर टावर माना जाता है. जो ग्लेशियरों से निकलने वाली 10 मुख्य नदियों के माध्यम से दो अरब से अधिक लोगों की लाइफ लाइन है.

2050 तक सिंधु में उच्च हिमनद पिघल के कारण प्रवाह बढ़ सकता है. गंगा और ब्रह्मपुत्र, जो मुख्य रूप से मानसून से प्रभावित नदियां हैं, में भी बदलाव देखने को मिलेंगे, क्योंकि प्री-मॉनसून प्रवाह में गिरावट हो सकती है. इससे कृषि में बाधा आएगी.

दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत में वार्षिक वर्षा का 70% हिस्सा है. इस क्षेत्र के अनुमानों में गर्मी की वर्षा में निकट अवधि में 4-12% और लंबी अवधि में 4-25% की वृद्धि की संभावना है. मानसून के पैटर्न में बदलाव, तूफान की गंभीरता और आवृत्ति सहित, पहाड़ के खतरों को जन्म दे सकता है जो महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को नष्ट कर सकते हैं.

First published: 6 February 2019, 13:11 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी