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वन्यजीव अपराध पर अंकुश लगाने वाली एजेंसी हुई कमजोर

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:53 IST

पिछले साल अनगिनत जंगली जानवरों के अलावा 25 बाघों और 15 गैंडों का भारत में शिकार किया गया. इस वर्ष केवल जनवरी में ही नौ बाघों और दो गैंडों की हत्या कर दी गई. जानवरों के इतने बड़े पैमाने पर अवैध हत्या के मद्देनजर इसे रोकने का जिम्मा संभाल रही संस्था देश भर में सिर्फ 11 वन्य जीव नीरीक्षकों के साथ इससे निपट पाने में पूरी तरह असफल सिद्ध हो रही है.

यह हाल संगठित वन्यजीव अपराध पर अंकुश लगाने के लिए बनी पर्यावरण मंत्रालय के तहत 2007 में स्थापित वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (डब्लूसीसीबी) का है. डब्लूसीसीबी में केवल 109 कर्मचारियों को स्वीकृति दी गई है. जो कि भारत जैसे विशाल देश को देखते हुए बेहद कम है. इतना ही नहीं इस ब्यूरो में अभी भी 40 फीसदी कर्मियों की कमी है.

नतीजतन एजेंसी धीरे-धीरे जानकारी इकट्ठा करने और प्रशिक्षण गतिविधियों के संचालन के साथ अपने मूल उद्देश्य से ही भटक गई है. 

कागजों पर भारी

डब्लूसीसीबी के पास कम से कम कागज पर भारी जिम्मेदारी है. इसे संगठित वन्यजीव अपराध से जुड़ी जानकारियां देश भर से जुटानी होती है. ऐसे अपराधों के राष्ट्रव्यापी आंकड़ों को बनाए रखने के अलावा इसे राज्य पुलिस बलों के साथ जानकारी साझा कर कार्रवाई में साथ देना पड़ता है.

वास्तव में जब वन्यजीव अपराध से निपटने की बात आती है तब डब्लूसीसीबी विभिन्न राज्य और केंद्र सरकार के विभागों के लिए समन्वय एजेंसी का काम करती दिखती है.

यह अवैध रुप से जानवरों के हिस्सों को सीमा पार पहुंचाने पर नजर रखती है. इसे अंतरराष्ट्रीय अवैध शिकार विरोधी संधियों को भी लागू करना होता है. जैसे कंवेंशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड इन एंडैंजर्ड स्पीसीज ऑफ वाइल्ड फौना एंड फ्लोरा (सीआईटीईएस).

और फिर इसे वन्यजीव अपराध के बारे में स्थानीय पुलिस अधिकारियों को संवेदनशील बनाने में मदद करनी होती है.

एक दशक पहले के "बाघ संकट" विशेषरूप से सरिस्का अभ्यारण्य से 2005 में पूरी बाघों की आबादी गायब हो जाने के बाद डब्लूसीसीबी को बडे़ पैमाने पर अधिकार मिले थे.

तब यह स्पष्ट हो गया था कि अवैध शिकार एक छिटपुट या स्थानीय घटना नहीं थी. बल्कि नशीली दवाओं और हथियारों के व्यापार की तरह ही यह भी अंतरराष्ट्रीय आपराधिक नेटवर्क का हिस्सा है. लेकिन वन्यजीव अपराधों से मुख्यता स्थानीय पुलिस निपटती है और यह अन्य राज्यों या भारत के बाहर के मामले होने पर उनमें रुचि नहीं दिखाती.

जाहिर है इसके लिए एक राष्ट्रीय स्तर की विशेषज्ञता प्राप्त एजेंसी होना चाहिए. इसमें पुलिस, वन और सीमा शुल्क जैसे विभागों के अधिकारी शामिल हों.

नेतृत्वहीन ब्यूरो

अपने प्रारंभिक वर्षों में विशाल जनादेश के चलते डब्लूसीसीबी अवैध शिकार पर लगाम लगाने में कामयाब रही. इसने देश भर में एक साथ छापे मारने के लिए सीबीआई के साथ मिलकर काम किया और अवैध शिकार के नेटवर्क पर शिकंजा कसने के लिए विभिन्न राज्यों की पुलिस के साथ मिलकर काम किया.

हालांकि बाद के वर्षों में बड़े पैमाने पर कर्मचारियों की कमी के चलते ब्यूरो के प्रदर्शन में कमी आई. वर्तमान में ब्यूरो में सिर्फ दो निरीक्षक, नौ वन्य जीवन निरीक्षक और 16 कांस्टेबल हैं. वरिष्ठ कर्मचारियों के बीच उप निदेशक और सहायक निदेशक के आधे पद खाली पड़े हुए हैं. ब्यूरो के पास एक सरकारी वकील भी नहीं है.

पद को भरने के लिए सीमा शुल्क के मुख्य आयुक्त को पत्र लिखा, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ

ब्यूरो में उप निदेशक का एक पद, सीमा शुल्क विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के लिए आरक्षित है जो कि अतिरिक्त आयुक्त के समकक्ष है. ऐसा इसलिए क्योंकि जानवरों के हिस्सों की भारत से अन्य देशों में सबसे ज्यादा तस्करी होती है. लेकिन यह पद कभी भर नहीं पाया. जून 2015 में डब्लूसीसीबी ने पद को भरने के लिए सीमा शुल्क के मुख्य आयुक्त को पत्र लिखा, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.

वास्तव में पूरा ब्यूरो नेतृत्वहीन लगता है. सहायक सीमा इकाइयों के लिए निदेशक और "बाहर जाने वाले केंद्रों के समन्वय" की स्थिति का पद भी खाली पड़ा है.

ब्यूरो के साथ वन्यजीव अपराधों के बारे में जानकारी साझा करने वाली वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया के टिटो जोसेफ कहते हैं, "सीमा शुल्क अधिकारी का रिक्त पद एक बड़ा मुद्दा है. अपर आयुक्त के पद के समकक्ष का एक अधिकारी हवाई अड्डों के कार्गो केंद्रों पर सीमा शुल्क अधिकारियों के साथ समन्वय करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है." 

अजीब नियम

वास्तव में ब्यूरो के नियमों के हिसाब से इसके पदों में से ज्यादातर केवल अन्य विभागों के अधिकारियों द्वारा ही भरे जा सकते हैं. इन अधिकारियों को चार साल के लिए प्रतिनियुक्ति पर सेवा करनी होती हैं. केवल चुनिंदा को ही सीधे भर्ती किया जा सकता है.

कैच द्वारा बात करने पर ब्यूरो के एक वरिष्ठ अधिकारी ने खाली पदों के लिए इस "प्रतिनियुक्ति नियम" को दोषी ठहराया. उन्होंने ईशारा किया कि जिन पदों पर सीधी भर्ती हो सकती है वह सब पहले से भरे हैं. दरअसल मौजूदा 44 रिक्तियों में से 28 "प्रतिनियुक्ति पदों" पर होनी हैं.

जब एक इंस्पेक्टर चला जाता है तो जानकारी और स्रोतों का रास्ता बंद हो जाता है

उन्होंने कहा, "इच्छुक आवेदकों को खोजना बहुत मुश्किल है. यह समस्या सिर्फ हमारे साथ ही नहीं है. यहां तक ​​कि सीबीआई में प्रतिनियुक्ति वाले पदों पर कई खाली पड़ी हुई हैं. आप किसी को शामिल होने के लिए मजबूर नहीं कर सकते." 

जो थोड़े से अधिकारी आते भी हैं उनकी प्रतिनियुक्ति समाप्त होने पर वे छोड़कर चले जाते हैं. और ब्यूरो वापस इच्छुक उम्मीदवारों की तलाश में जुट जाता है. ब्यूरो दोहरी मार झेल रहा है क्योंकि एक ओर तो डब्लूसीसीबी के पास अधिकारियों की कमी हो जाती है और दूसरा इन अधिकारियों द्वारा अपने कार्यकाल में बनाए गए नेटवर्क और संपर्क भी खत्म हो जाते हैं.

2009-11 में ब्यूरो की बड़ी सफलताओं की अगुवाई का श्रेय दिए जाने वाले भारतीय वन सेवा के अधिकारी रमेश पांडेय ने कहा, "जब एक इंस्पेक्टर जिसने चार साल तक सेवा की है चला जाता है तो जानकारी और स्रोतों का रास्ता बंद हो जाता है. खुफिया और संस्थागत सूचनाएं बनाए रखने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है." 

पांडे ने कहा, "अगर डब्लूसीसीबी की मुख्य भूमिका खुफिया जानकारी जुटाने की है तो इसके पास एक ऐसी प्रणाली भी होनी चाहिए. अन्य खुफिया एजेंसियों की तरह यह भी एक निश्चित स्तर के अधिकारियों को बरकरार रखने की कोशिश कर सकता है."

अधिकारों का अभाव

फिर कानूनी अधिकार का मुद्दा भी है. जहां शिकारियों द्वारा बड़े पैमाने पर मोबाइल फोन और जीपीएस का उपयोग किया जाता है, डब्लूसीसीबी के पास सीधे उनके रिकॉर्ड का उपयोग करने की कोई शक्ति ही नहीं है. इस तरह की निगरानी के लिए उन्हें राज्य पुलिस को लिखने की जरूरत होती है.

डब्लूसीसीबी के पूर्व अधिकारी ने बताया, "ऐसे कामों में वास्तविक समय की सूचना (रियल टाइम इंफार्मेशन) की जरूरत होती है. अगर जरूरत के एक सप्ताह बाद सूचना मिले तो वो किसी काम की नहीं. उन्होंने कहा कि पूर्व में ब्यूरो ने इन शक्तियों के लिए गृह मंत्रालय को पत्र लिखा था लेकिन सफलता नहीं मिली.

उन्होंने यह भी कहा, "जब बाघों की संख्या बढ़ गई तब सरकार ने अन्य मुद्दों की तरफ अपना ध्यान लगा दिया जबकि वन्यजीव अपराध अभी भी फल-फूल रहा है."

कर्मचारियों की कमी को दूर करने के लिए ब्यूरो ने हाल ही में स्वीकृत 109 पदों की संख्या बढ़ाने के लिए वित्त मंत्रालय को एक प्रस्ताव भेजा था.

वन्यजीव तस्करी का पैमाना जबरदस्त है और भारत दुनिया के लिए आपूर्ति का बड़ा स्रोत है

इस प्रस्ताव का क्या परिणाम आता है देखने वाली बात है. लेकिन अगर सरकार वन्य जीवन को रोकने के बारे में गंभीर है तो यह ब्यूरो की अनदेखी नहीं कर सकती.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वन्यजीव अपराध को अवैध हथियार और नशीली दवाओं के व्यापार के बराबर ही एक संगठित अपराध समझा जाता है. यह व्यापार दुनिया भर में तकरीबन 1,70,000 करोड़ रुपये का होने का अनुमान लगाया गया है.

राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड के एक पूर्व सदस्य ने कहा, "वन्यजीव तस्करी बड़े पैमाने पर हो रही है और भारत दुनिया के लिए आपूर्ति का बड़ा स्रोत है. लेकिन जब वन्यजीव अपराध से लड़ाई के लिए एक संगठन को बनाया गया था, सरकार ने इसे जरूरी कर्मचारी संख्या तक मुहैया नहीं करवाई."

First published: 30 January 2016, 1:28 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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