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विश्व पर्यावरण दिवस: सावधान! एंडरसन भागा नहीं है

आवेश तिवारी | Updated on: 5 June 2016, 23:24 IST
QUICK PILL
  • हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश-छत्तीसगढ़-मध्य प्रदेश के सीमा पर स्थित सोनभद्र-सिंगरौली पट्टी की. हम इसे देश की उर्जा राजधानी भी कहते हैं. ये क्षेत्र देश का सबसे बड़ा एनर्जी पार्क है.
  • अगले पांच वर्षों में यहां रिलायंस, लैंको और एस्सार समेत निजी व सार्वजानिक कंपनियों के लगभग 20 हजार मेगावाट के अतिरिक्त बिजलीघर लगाये जायेंगे. 

यह देश में हर जगह पैदा हो रहे भोपाल का किस्सा है, ये किस्सा हिंदुस्तान के स्विटजरलैंड की तबाही का किस्सा है. ये रिहंद बांध में अपने महल के साथ डूब गयी रानी रूपमती का किस्सा भी है क्यूंकि हम एक ऐसे देश में जी रहे हैं जहां सरकारें विकास के नाम पर देश, काल को बदलने का मुगालता रखती हैं.

हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश-छत्तीसगढ़-मध्य प्रदेश के सीमा पर स्थित सोनभद्र-सिंगरौली पट्टी की. हम इसे देश की उर्जा राजधानी भी कहते हैं. ये क्षेत्र देश का सबसे बड़ा एनर्जी पार्क है. 

सोनभद्र-सिंगरौली पट्टी के लगभग 40 वर्ग किमी क्षेत्र में लगभग 21,000 मेगावाट क्षमता के आधा दर्जन कोयला और पानी से चलने वाले बिजलीघर मौजूद हैं जो देश के एक बड़े हिस्से को बिजली मुहैया करते हैं.

अगले पांच वर्षों में यहां रिलायंस, लैंको और एस्सार समेत निजी व सार्वजानिक कंपनियों के लगभग 20 हजार मेगावाट के अतिरिक्त बिजलीघर लगाये जायेंगे. बिरला का एल्युमिनियम, रसायन और कार्बन, जेपी का सीमेंट कारखाना यहां पहले से मौजूद है. 

यह इलाका जंगलों और खेती-किसानी की जमीनों को नेस्तानाबूद करके लाइमस्टोन और डोलोमाईट की स्टोन माइनिंग के लिए भी पूरे देश में जाना जाता है.

कार्बन डाई-आक्साइड का 16 फीसदी उत्सर्जन

यहां पांच लाख आदिवासी भी मौजूद हैं जिन्हें दो जून की रोटी भी आसानी से मयस्सर नहीं होती. दरअसल यह अकेला जिला है उत्तर प्रदेश में जो आदिवासी बहुल है. 

इस इलाके की एक और पहचान और भी है यहां छोटी-छोटी आठ नदियां भी हैं जिनका पानी पूरी तरह से जहरीला हो चुका है. यह इलाका देश में कुल कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन का 16 फीसदी अकेले उत्सर्जित करता है.

सीधे सीधे कहें तो यहां चप्पे चप्पे पर यूनियन कार्बाइड जैसे दानव और संबावनाएं मौजूद हैं. इसके लिए सिर्फ सरकार और नौकरशाही तथा देश के उद्योगपतियों में ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने के लिए मची होड़ ही जिम्मेदार नहीं है. 

इसके लिए मीडिया भी उतनी ही जवाबदेह है जितना कोई और. अक्सर बड़ी दुर्घटनाओं के बाद ही पर्यावरण विनाश का ये केंद्र सुर्खियां बन पाता है, वरना दुनिया सोचती है सब कुछ ठीक चल रहा.

केमिकल फैक्ट्री का जहर

कनोडिया केमिकल खतरनाक रसायनों का उत्पादन करने वाली कंपनी है. इसे कुछ वर्ष पूर्व ही आदित्य बिरला समूह ने खरीद लिया है. कनोडिया के जहरीले कचड़े से प्रतिवर्ष औसतन 40 से 50 मौतें होती हैं. यह कचरा रिहंद बांध के जलाशय में सीधा छोड़ा जाता है.

रिहंद जलाशय के इर्द-गिर्द बसे सैंकड़ों गांवों के हजारों लोग आंशिक या पूर्णकालिक विकलांगता के शिकार होते हैं. वर्ष 2011 के दिसंबर माह में उत्तर प्रदेश-बिहार सीमा पर अवस्थित सोनभद्र के कमारी डांड गांव में रिहंद बांध का पानी इस्तामाल करने वाले 20 लोगों की जान चली गयी थी. 

सोनभद्र के गांव-गांव फ्लोरोसिस की चपेट में आकर विकलांग हो रहे हैं

विषैले पानी की वजह से हजारों पशुओं की मौत भी हुई थी. मगर ये खबर सुर्खियां नहीं बन पायी. जबकि जांच में ये साबित हो चुका था मौतें प्रदूषित जल से हुई है और यह प्रदूषण कनोडिया केमिकल के कारण होता है.

इसके पहले जनवरी 2005 में भी कनोडिया के अधिकारियों की लापरवाही से हुई जहरीली गैस के रिसाव से पांच मौतें हुई थी. 

सोनभद्र के गांव-गांव फ्लोरोसिस की चपेट में आकर विकलांग हो रहे हैं. यहां के पडवा कोद्वारी,कुसुमहा इत्यादि गांवों में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो फ्लोरोसिस का शिकार न हो.

एक साल में डेढ़ टन पारा

सोनभद्र-सिंगरौली के बिजलीघरों से प्रतिवर्ष लगभग डेढ़ टन मर्करी मिला फ्लाइ एश निकलता है. हालत ये हैं कि यहां के लोगों के बालों, रक्त और यहां की फसलों तक में पारे के अंश पाए गए हैं. 

इसका असर भी आम जन मानस पर साफ़ दिखता हैं. उड़न चिमनियों की धूल से सूरज की रोशनी छुप जाती है और शाम होते ही चारों और कोहरा छा जाता है.

इस भारी प्रदुषण से न सिर्फ आम इंसान मर रहे हैं बल्कि गर्भस्थ शिशुओं की मौत के मामले भी सामने आ रहे हैं. ये एक कड़वा सच है कि उत्तर प्रदेश सरकार के ओबरा और अनपरा बिजलीघरों को पिछले एक दशक से केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अन्नापत्ति प्रमाणपत्र के बिना चलाया जा रहा है जबकि बोर्ड ने इन्हें बेहद खतरनाक बताते हुए बंद करने के आदेश दिए हैं.

मगर कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं हो रही. सिर्फ सोनभद्र-सिंगरौली में ही नहीं देश के कोने-कोने में भोपाल पैदा हो रहे है. 

प्रदूषण को लेकर जवाबदेही से बच रही केंद्र और राज्य सरकार के लिए सोनभद्र-सिंगरौली केवल सोना है, मगर सच्चाई यह है या पूरा इलाका एक यूनियन कार्बाइड में तब्दील होता जा रहा है, एंडरसन अभी भागा नहीं है.

First published: 5 June 2016, 23:24 IST
 
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