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विश्व महासागर दिवस: महासागरों पर आश्रित हमारा भविष्य

नवनीत कुमार गुप्ता | Updated on: 8 June 2017, 16:41 IST

सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण होने के कारण महासागर अत्यंत उपयोगी हैं. महासागरों के प्रति जागरूकता के उद्देश्य से हर साल 8 जून को विश्व महासागर दिवस मनाया जाता है. प्रत्येक वर्ष एक थीम विशेष पर पूरे विश्व में महासागर दिवस से संबंधित आयोजन किए जाते हैं.

इस वर्ष की थीम ''हमारे महासागर-हमारा भविष्य'' है. संयुक्‍त राष्‍ट्र की तरफ से तय किए गए टिकाऊ विकास के लक्ष्यों में महासागरों के संरक्षण एवं उनके टिकाऊ उपयोग को भी शामिल किया गया है. इससे जुड़े मुद्दों पर चर्चा करने के लिए इस हफ्ते संयुक्‍त राष्‍ट्र महासागर सम्‍मेलन चल रहा है.

पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व यहां उपस्थित वायुमंडल और महासागरों जैसे कुछ विशेष कारकों के कारण ही संभव हो पाया है. अपने आरंभिक काल से आज तक महासागर जीवन के विविध रूपों को संजोए हुए हैं.

पृथ्वी के विशाल क्षेत्र में फैले अथाह जल का भंडार होने के साथ ही महासागर अपने अंदर और आस-पास अनेक छोटे-छोटे नाजुक पारितंत्रों को पनाह देते हैं, जिससे उन स्थानों पर विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु और वनस्पतियां पनपती हैं. महासागरों में प्रवाल भित्ति क्षेत्र ऐसे ही एक पारिस्थितिकी तंत्र का उदाहरण है, जो असीम जैव विविधता का प्रतीक है. 

तटीय क्षेत्रों में स्थित मैन्ग्रोव जैसी वनस्पतियों से संपन्न वन, समुद्र के अनेक जीवों के लिए नर्सरी बनकर आश्रय प्रदान करते हैं. अपने आरंभिक काल से आज तक महासागर जीवन के विविध रूपों को संजोए हुए हैं. महासागर पृथ्वी के सबसे विशालकाय जीव व्हेल से लेकर सूक्ष्म जीव को रहने के लिए ठिकाना मुहैया कराते हैं. एक अनुमान के अनुसार समुद्रों में जीवों की करीब दस लाख प्रजातियां मौजूद हैं. 

महासागर धरती के मौसम को निर्धारित करने वाले प्रमुख कारक हैं. महासागरीय जल की लवणता और विशिष्ट ऊष्माधारिता का गुण पृथ्वी के मौसम को प्रभावित करता है. यह तो हम जानते ही हैं कि पृथ्वी की समस्त ऊष्मा में जल की ऊष्मा का विशेष महत्व है. अधिक विशिष्ट ऊष्मा के कारण दिन में सूर्य की ऊर्जा का बहुत बड़ा भाग समुद्री जल में समाहित हो जाता है. इस प्रकार अधिक विशिष्ट ऊष्माधारिता से महासागर ऊष्मा का भण्डारक बन जाते हैं, जिससे विश्व भर में मौसम संतुलित बना रहता है या कहें कि पृथ्वी पर जीवन के लिए औसत तापमान बना रहता है.

मौसम के संतुलन में समुद्री जल की लवणता का भी विशेष महत्व है. समुद्री जल के खारेपन और पृथ्वी की जलवायु में बदलाव की घटना आपस में जुड़ी होती है. हम जानते ही हैं कि ठंडा जल, गर्म जल की तुलना में अधिक घनत्व वाला होता है. इसके अलावा महासागर में किसी स्थान पर सूर्य के ताप के कारण जल के वाष्पित होने से उस क्षेत्र के जल के तापमान में परिवर्तन होने के साथ ही वहां के समुद्री जल की लवणता और आस-पास के क्षेत्र की लवणता में अंतर उत्पन्न हो जाता है, जिसके कारण गर्म जल की धाराएं ठंडे क्षेत्रों की ओर बहती है और ठंडा जल उष्ण और कम उष्ण प्रदेशों में बहता है.

लिहाजा महासागर के जल का खारा होना समुद्री धाराओं के बहाव की घटना का एक मुख्य कारण है. यदि सारे समुद्रों का जल मीठा होता तो खारेपन का सिलसिला कभी न बनता और जल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने वाली धाराएं सक्रिय न होतीं. परिणामस्वरूप ठंडे प्रदेश बहुत ठंडे रहते और गर्म प्रदेश बहुत गर्म. तब पृथ्वी पर जीवन के इतने रंग न बिखरे होते, क्योंकि पृथ्वी की असीम जैव विविधता का एक प्रमुख कारण यह है कि यहां अनेक प्रकार की जलवायु मौजूद है और जलवायु के निर्धारण में महासागरों का महत्वपूर्ण योगदान नकारा नहीं जा सकता है.

पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति महासागरों में ही हुई और आज भी महासागर जीवन के लिए आवश्यक परिस्थितियों को बनाए रखने में सहायक हैं, क्योंकि महासागर पृथ्वी के एक तिहाई से अधिक क्षेत्र में फैले हैं, इसलिए महासागरीय पारितंत्र में थोड़ा सा परिवर्तन पृथ्वी के समूचे तंत्र को अव्यवस्थित करने की सामर्थ्य रखता है.

आज जब विश्व की कुल जनसंख्या का 30 प्रतिशत तटीय क्षेत्रों में निवास करता है, तो ऐसी स्थिति में महासागर उनके लिए खाद्य पदार्थों का प्रमुख स्रोत साबित हो सकते हैं. महासागर खाद्य पदार्थों का एक प्रमुख स्रोत होने के कारण हमारी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं.

आज विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की मदद से महासागरों से पेट्रोलियम सहित अनेक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों को निकाला जा रहा है. इसके अलावा जलवायु परिवर्तन सहित अनेक मौसमी परिघटनाओं को समझने के लिए समुद्रों का अध्ययन भी महत्वपूर्ण है. वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद् के अंतर्गत गोवा में कार्यरत राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान में ऐसे अनेक अध्ययन किए जा रहे हैं.

महासागरों में बढ़ता प्रदूषण चिंता का विषय बनता जा रहा है. अरबों टन प्लास्टिक का कचरा हर साल महासागर में समा जाता है. आसानी से विघटित नहीं होने के कारण यह कचरा महासागर में जस का तस पड़ा रहता है. अकेले हिंद महासागर में भारतीय उपमहाद्वीप से पहुंचने वाली भारी धातुओं और लवणीय प्रदूषण की मात्रा हर साल करोड़ों टन है. विषैले रसायनों के रोज़ाना मिलने से समद्री जैव विविधता भी प्रभावित होती है.

इन विषैले रसायनों के कारण समुद्री वनस्पति की वृद्धि पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है. पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने वाले परितंत्रों में महासागर की उपयोगिता को देखते हुए यह आवश्यक है कि हम महासागरीय पारितंत्र के संतुलन को बनाए रखें, तभी हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा.

साभार: (इंडिया साइंस वायर)

First published: 8 June 2017, 16:41 IST
 
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