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वर्ल्ड टाइगर डे: बढ़ते शिकार, अंधाधुंध विकास के बीच कैसे बचेंगे बाघ?

निहार गोखले | Updated on: 29 July 2016, 7:58 IST

नेशनल टाइगर कंजरवेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) के पिछले साल के आंकड़ों के अनुसार भारत के 49 बाघ अभ्यारण्य में बाघों की संख्या में 30 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है. भारत में इस समय 2,226 बाघ हैं. साल 2010 में देश में 1706 बाघ थे.

दूसरी ओर इस साल 70 से ज्यादा बाघों की मौतों के मामले भारत में सामने आए हैं. यानि हर महीने 10 बाघों की मौत हो गईं. वन एवं पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे के अनुसार तस्करों द्वारा बाघों के मारे जाने की 21 घटनाएं शामिल हैं.

ये आंकड़े उत्साह जगाने वाले हैं लेकिन इनसे देश के बाघ अभ्यारण्य की सही स्थिति का पता नहीं चलता. अभ्यारण्यों का सिकड़ते जाना, पुरातन वन विभाग, विकास के नाम पर बढ़ रही गतिविधियां, कमजोर वन कानून, गांवों के पुनर्स्थापना से जुड़ा कमजोर कानून इत्यादि वो कारण हैं जिनसे बाघों का भविष्य जुड़ा हुआ है.

बाघ संरक्षण की मुश्किलें

वाइल्ड इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूआईआई) की एक रिपोर्ट के अनुसार विभिन्न बाघ अभयारण्यों को आपस में जोड़ने वाले संपर्क मार्ग सिकुड़ते जा रहे हैं. ये संपर्क मार्ग ने केवल बाघों बल्कि सभी जंगली जीवों के लिए महत्वपूर्ण हैं. इनकी मदद से विभिन्न समूहों के बीच प्रजनन संभव हो पाता है.

इन संपर्क मार्गों से किशोर बाघों को छिपने और अपना क्षेत्र बनाने में मदद मिलती है. इससे उनका मानव आबादी से भी सामना नहीं होता.

वन विभाग की दिक्कतें

कई बाघ अभ्यारण्यों में कई सालों से नए कर्मचारियों की नियुक्ति नहीं हुई है. जिसकी वजह से वन विभाग की क्षमता कुंद हो गई है. वन विभाग के मौजूदा कर्मचारियों में पिछली पीढ़ी की तरह बाघों के बचाव का नैतिक दायित्वबोध भी नहीं दिखता है.

वन्यकर्मियों के पास वन्यजीव तस्करों से निपटने के लिए संसाधनों का भी अभाव है. आज भी फॉरेस्ट गॉर्ड लाठी से जंगल की रखवाली करते हैं. बाघ संरक्षण मुख्य रूप से पैदल सैनिकों के ऊपर निर्भर करता है. पैदल सैनिक वे फॉरेस्ट गार्ड और रेंजर्स होते हैं जो लगातार जंगलों में पेट्रोलिंग करते हैं.

वाइल्डलाइफ ट्र्स्ट ऑफ इंडिया से जुड़े डॉक्टर मयुख चटर्जी लंबे समय से बाघ संरक्षण के क्षेत्र में काम करते रहे हैं. चटर्जी कहते हैं कि तस्कर वन्यकर्मियों से बहुत ज्यादा तेज होते हैं.

चटर्जी कहते हैं, "तस्कर कुछ घंटों में बाघ की टोह ले लेते हैं जबकि वन विभाग को स्थानीय बाघ को खोजने में कई दिन लग जाता है... हालांकि अब कई एनजीओ वन्यकर्मियों को प्रशिक्षित कर रहे हैं लेकिन अभी इस दिशा में काफी काम किया जाना है."

विकास की मार

बाघों के अस्तित्व के लिए विकास कार्य भी बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं. एनएच-7 के चौड़ीकरण से प्रभावित कान्हा-पेंच बाघ अभ्यारण्य, नागजीरा नावेगांव और तड़ोबा बाघ अभ्यारण्य इसका उदाहरण है. डब्ल्यूआईआई और कई एनजीओ ने इसका विरोध किया लेकिन सरकार ने नहीं सुना. इसी तरह केन-बेतवा नदी लिंकिंग परियोजना को हरी झंडी देने से भी मध्य प्रदेश के पन्ना बाघ अभयारण्य पर नकारात्मक असर होगा.

अरुणाचल प्रदेश में बनाए जा रहे बड़े बांधों से भी वन्यजीवन को खतरा है. इससे असम का काजीरंगा बाघ अभ्यारण्य भी प्रभावित होगा. बाघ अभ्यारण्यों के निकट पनपने वाली टूरिस्ट गतिविधियों से भी बाघों के प्राकृतिक निवास को खतरा पहुंच रहा है. अंधाधुंध विकास और बाघ संरक्षण दोनों एक साथ शायद मुश्किल होगा.

बाघों की हत्या के मामले बढ़े

भारत में इस साल अब तक 70 बाघों की मौत की सूचना है जबकि पिछले साल कुल 78 बाघों के मरने की जानकारी मिली है. इनमें तस्करों द्वारा मारने के 14 मामले शामिल हैं.

उत्तराखंड के जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के आसपास के जंगलों में सिर्फ इस साल पांच बाघों की हत्या कर दी गई. यह हालिया वर्षों में अभ्यारण्य में अवैध शिकार के सबसे बड़े मामलों में से एक है.

दुःख की बात यह है कि उत्तराखंड वन विभाग को पहले ही चेतावनी दे दी गई थी कि वहां बाघों का शिकार किया जा सकता है. वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया के प्रोग्राम मैनेजर टीटो जोसेफ कहते हैं, "पिछले तीन से चार महीनों के दौरान हम कई मौकों पर उत्तराखंड वन विभाग को सूचना दे चुके हैं. समय रहते कार्रवाई कर बाघों की हत्या को रोका जा सकता था.”

वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया द्वारा जुटाए गए आंकड़े पुष्टि करते हैं कि वर्ष 2016 में कॉर्बेट नेशनल पार्क में अवैध शिकार किए गए (या जब्त किए गए) बाघों की संख्या 19 है. यह वर्ष 2015 में अवैध शिकार के कुल मामलों के तीन चौथाई के बराबर है. अवैध शिकार के 19 में से 9 मामले तो अकेले जनवरी में ही सामने आ गए थे.

नेशनल बोर्ड ऑफ वाइल्डलाइफ के एक पूर्व सदस्य कहते हैं, “कॉर्बेट देश के प्रमुख बाघ अभ्यारण्यों में से एक है. यदि कॉर्बेट जैसे प्रमुख अभ्यारण्य से भी इतने बाघों का अवैध शिकार हो सकता है तो मैं हैरान हूं कि देश के बाकी संरक्षित अभ्यारण्यों में बाघों की सुरक्षा का क्या हाल होगा? इस मामले की सीबीआई जांच होनी चाहिए.” 

यह सर्वविदित तथ्य है कि बाघों का अवैध शिकार एक संगठित अपराध है, जिसे संगठित गिरोह सीमा पार के गिरोहों के साथ मिलकर अंजाम देते हैं.

First published: 29 July 2016, 7:58 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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