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यमुना फिर खतरे में: पवित्रता ही प्रदूषित करेगी पवित्र नदी को

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 19 February 2016, 20:05 IST

पद्म भूषण सम्मान प्राप्त और आध्यामिक गुरु श्री श्री रवि शंकर (वे इसी उपाधि से आमजन में प्रसिद्ध हैं) का आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन 11 से 13 मार्च तक तीन दिवसीय वर्ल्ड कल्चरल फेस्टिवल का आयोजन करेगा.

फाउंडेशन की इस फेस्टिवल के सहारे गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने की योजना है. इसके तहत सात एकड़ पर बनाई जा रही रंगभूमि में 25,000 कलाकार और 8,000 संगीतकार प्रस्तुति देंगे, जिसके गवाह बनेंगे 35 लाख लोग. यह आयोजन फाउंडेशन की 35वीं वर्षगांठ के रूप में किया जा रहा है.

यह बहस का विषय हो सकता है कि इस तरह का आयोजन आध्यात्मिक जागरुकता में कोई सहायता करेगा या नहीं, उससे भी रहस्यपूर्ण तथ्य यह है कि आयोजन एक पर्यावरणीय संवेदनशील क्षेत्र (इको सेंसिटिव जोन) में किया जा रहा है. दिल्ली में यमुना के ठीक किनारे.

जब से उस क्षेत्र में आयोजन के लिए निर्माण कार्य शुरू हुआ है, पर्यावरण को होने वाली अपूर्णीय क्षति की दुहाई देकर पर्यावरणविद् लगातार आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन से अनुरोध कर रहे हैं कि आयोजन का स्थान बदल देना चाहिए.

एनजीटी ने दिल्ली सरकार, दिल्ली विकास प्राधिकरण और आर्ट ऑफ लिविंग को नोटिस जारी किया है

जब फाउंडेशन ने आयोजन स्थल बदलने के इन अनुरोधों की लगातार अनदेखी की तो पर्यावरणविद और यमुना जिए अभियान के संयोजक मनोज मिश्रा ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में याचिका दाखिल की कि प्रस्तावित आयोजन स्थल पर निर्माण कार्यों पर रोक लगाई जाए.

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने गुरुवार को दिल्ली सरकार, दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) और आर्ट ऑफ लिविंग को नोटिस जारी किया है. इसमें वे सब दस्तावेज एनजीटी में पेश करने को कहा गया है जिनके आधार पर आयोजन की अनुमति दी गई थी. साथ ही एनजीटी ने आईआईटी को प्रस्तावित आयोजन स्थल का दौरा करने और एक स्टेटस रिपोर्ट पेश करने काे कहा है.

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अदालत ने आज फिर मामले की सुनवाई की और 19 फरवरी को फिर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है.

आर्ट ऑफ लिविंग के प्रतिनिधियों के अनुसार, वे किसी भी तरह का निर्माण शुरू करने से पहले सब जरूरी अथॉरिटीज से अनुमति ले चुके हैं.

अपनी याचिका में मिश्रा ने मुद्दा उठाया है कि नदी के तल पर 25 एकड़ क्षेत्र में अतिरिक्त मलबा डालकर निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया है और यह एनजीटी के कई आदेशों का उल्लंघन है.

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मिश्रा ने ट्रिब्यूनल को बताया है कि वृहद स्तर पर सफाई, समतलीकरण, मलबा डालना और निर्माण कार्य चल रहा है जो क्षेत्र के पर्यावरणीय और वनस्पतीय संवेदनशील परिदृश्य पर बहुत बुरा प्रभाव डालेगा.

देश की सबसे प्रदूषित नदी होने का दंश झेल रही यमुना को लेकर पर्यावरणविदों ने निम्न मुद्दे उठाए हैं:

1. इसका कोई अध्ययन नहीं किया गया है कि नदी के बाढ़ प्रभाव वाले क्षेत्र में मात्र ढाई दिन में 35 लाख लोगों के आने से क्या पर्यावरणीय और जैविक प्रभाव पड़ेगा?

2. आयोजन के लिए चयनित क्षेत्र और वहां तक पहुंचने के लिए बनाए गए पहुंच मार्ग दोनों ही नदी के बाढ़ प्रभाव वाले क्षेत्र में हैं और जब भी नदी में अतिरिक्त पानी आता है, यह क्षेत्र भी बाढ में डूब जाता है. यह सम्पूर्ण जलजन्तु सिस्टम, भूमिगत जलस्तर और पर्यावरण के मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

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3. नदी के बहाव क्षेत्र के आसपास मलबा डालने और जमीन ऊंची करने तो पर्यावरण को नुकसान होगा ही, आयोजन स्थल के आसपास से हरियाली और वनस्पति हटाने के कारण पारिस्थितिकीय नुकसान (ecological damage) बहुत बढ़ जाएगा.

4. नदी में किसी भी तरह का निर्माण सीधे तौर पर एनजीटी के उन आदेशों का खुला उल्लंघन है, जो नदी की तलहटी और बाढ या बहाव क्षेत्र में किसी भी तरह के अस्थाई या स्थाई निर्माण पर प्रतिबंध लगाता है. दिल्ली में यमुना नदी के बाढ प्रभाव वाले क्षेत्र वर्तमान में एनजीटी के निर्देश पर बनी पुनरुद्धार योजना का हिस्सा हैं और इसके बाढ़ प्रभाव वाले क्षेत्रों में किसी भी तरह के निर्माण को लेकर कानूनी निषेधाज्ञा है.

5. ट्रिब्यूनल ने देखा कि नदी क्षेत्र में लगातार हो रहा निर्माण "न सिर्फ नदी के प्राकृतिक बहाव को प्रभावित करेगा, बल्कि पर्यावरणीय समस्याओं का कारण भी बनता है जिनसे मानव जीवन और संपत्ति को खतरा पैदा हो जाता है.”

आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन का कहना है कि इस आयोजन से किसी भी तरह का पर्यावरणीय नुकसान नहीं होगा

आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के प्रतिनिधि गौतम गिर कहते हैं, “ये आरोप निराधार हैं कि इससे पर्यावरणीय या पारिस्थितिकीय असंतुलन होगा. हम तो पर्यावरण मंत्रालय से भी विमर्श कर चुके हैं, जिसने जानकारी दी कि उसकी अनुमति की आवश्यकता नहीं है. दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए), उत्तर प्रदेश सिंचाई प्राधिकरण और अन्य हमें अनापत्ति प्रमाण पत्र दे चुके हैं.”

गिर इस बात पर डटे रहते हैं कि वे यह सुनिश्चित कर चुके हैं कि इस आयोजन से किसी भी तरह का पर्यावरणीय नुकसान नहीं होगा. वे दोहराते हैं, "पर्यावरण सुरक्षा पहले ही आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के प्रमुख मुद्दों में से एक है.”

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साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपुल (South Asia Network on Dams, Rivers and People) के संयोजक हिमांशु ठक्कर कहते हैं, “नदी के मैदान जैव विविधता को जोड़ने वाले नदी के अंदरूनी हिस्से होते हैं. यह बेकार बंजर भूमि नहीं होती, जिस पर अतिक्रमण या अवैध निर्माण कर लिया जाए. इस आयोजन के कारण मिट्टी एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित हुई है, यहां तक कि नदी के बहाव क्षेत्र में भी."

लगातार चल रहे निर्माण को लेकर भी ठक्कर चिंतित हैं. वे आगे कहते हैं, “इस तरह के विशालकाय मंच की नींव ही पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुंचा चुकी होगी.”

यमुना नदी दिल्ली क्षेत्र की जरूरत के 60 प्रतिशत जल की आपूर्ति करती है

यमुना जिए अभियान कई महत्वपूर्ण सवाल उठाता है. देश की सबसे प्रदूषित नदी की तलहटी में ही क्यों एक अंतरराष्ट्रीय फेस्टिवल का आयोजन किया जा रहा है? संस्कृति मंत्रालय, जिसे इस आयोजन के समर्थक के रूप में पेश किया जा रहा है, उसने इस आयोजन के पर्यावरणीय नुकसान पर संज्ञान क्यों नहीं लिया?

यह विडंबना ही है कि आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन कथित रूप से उसी जगह पर यह आयोजन कर रहा है, जहां पांच साल पहले श्री रवि शंकर ने खुद क्लीन यमुना अभियान की शुरुआत की थी. तब श्री रवि शंकर ने खुद कहा था, “हैरान कर देने वाली बात है कि 3.6 बिलियन टन असंधारित सीवेज हर रोज यमुना में डाला जा रहा है और यही नदी दिल्ली क्षेत्र की जरूरत के 60 प्रतिशत जल की आपूर्ति करती है. यह स्थिति बहुत भयानक है.”

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इससे भी बड़ी बात यह है कि आर्ट ऑफ लिविंग का जल जागृति अभियान महाराष्ट्र में जलाशयों आदि के पुनरुद्धार और उनके तलछट (तली में जमी मिट्टी) निकालने का काम कर रहा है.

कैच ने आयोजन स्थल का दौरा किया, जहां बड़े स्तर पर सड़कों और भारी-भरकम पार्किंग के साथ-साथ कई भीमकाय ढांचों का निर्माण कार्य जोरों पर है.

मिश्रा उग्रता से इशारा करते हैं, “बाढ़ प्रभाव वाले क्षेत्रों की क्षति अपूरणीय है.”

नदियों को बचाने और उन्हें संरक्षित करने का महत्व बताते हुए स्वयं श्री रवि शंकर ने कहा था, “गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियों का जल हम खुद को शुद्ध करने के लिए सदा से उपयोग करते आ रहे हैं, लेकिन आज हम उस पड़ाव पर पहुंच गए हैं जहां हमें इस पानी को शुद्ध करना होगा. इसलिए हम यमुना में प्रदूषण के खिलाफ एक जंग छेड़ रहे हैं.”

उम्मीद है कि श्री रवि शंकर की ये बातें महज धार्मिक उपदेश साबित न हों.

First published: 19 February 2016, 20:05 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @sparksofvishdom

A graduate of the Asian College of Journalism, Vishakh tracks stories on public policy, environment and culture. Previously at Mint, he enjoys bringing in a touch of humour to the darkest of times and hardest of stories. One word self-description: Quipster

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