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दूसरों को जिंदगी देने वाले डॉक्टरों की आम लोगों से पहले हो जाती है मौत! हैरान करने वाली है वजह

कैच ब्यूरो | Updated on: 13 October 2018, 1:31 IST

दुनियाभर में डॉक्टरों को धरती पर भगवान के रूप में देखा जाता है. ऐसा माना जाता है कि जो डॉक्टर मरीजों को नई जिंदगी देते हैं उन्हें कोई बीमारी नहीं होती होगी और वो लंबी उम्र तक जीते होंगे, लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि आम लोगों की तुलना में डॉक्टरों की मौत जल्द हो जाती हैं. ऐसा हम नहीं कर रहे बल्कि एक रिसर्च में ये खुलासा हुआ है.

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) ने कुछ साल पहले केरल में डॉक्टरों पर एक अध्ययन किया था. अध्ययन से प्राप्त आंकड़ों से जब देशभर के डॉक्टरों की तुलना की गई तो चौंकाने वाले नतीजे सामने आए. इस अध्ययन में बताया गया कि देश के डॉक्टर आम इंसान के मुकाबले औसतन 10-12 साल कम जीते हैं. इस सबके पीछे सबसे बड़ी वजह तनाव है. वहीं, डॉक्टरों में आत्महत्या के मामले सामने आने की घटनाएं इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम हैं.

बता दें कि IMA ने डॉक्टरों की आत्महत्या को सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट घोषित किया हुआ है. IMA के पूर्व अध्यक्ष डॉ. केके अग्रवाल के मुताबिक, साल 2018 की शुरुआत में लगभग छह डॉक्टर एक ही समय में एम्स के मनोचिकित्सा वार्ड में भर्ती किए गए थे. क्योंकि भर्ती किए गए डॉक्टर तनावपूर्ण स्थिति से गुजर रहे थे.

डॉक्टरों तनाव बढ़ने की ये हैं वजह

अध्ययन में ये भी बताया गया कि डॉक्टरों में तनाव क्यों बढ़ता है. इसकी मुख्य वजह डॉक्टरों के काम के समय को लेकर हैं. क्योंकि अधिकांश डॉक्टर 12 घंटे की शिफ्ट में ड्यूटी करते हैं. इनमें शिक्षण, परामर्श, मरीजों को देखना और शोध कार्य आदि शामिल हैं. इसके साथ ही बुनियादी सुविधाओं की कमी के बावजूद भारी संख्या में मरीजों को देखते का भी उनके ऊपर दबाव होता हैइसीलिए अधिकांश डॉक्टरों पर थकान, अकेलापन, बीमारियां और डिप्रेशन हावी हो जाता है.

पढ़ाई के दौरान ही शुरु हो जाता है डॉक्टरों में तनाव का सिलसिला

अध्ययन में बताया गया है कि करीब 15 से 30 प्रतिशत चिकित्सा छात्रों और मेडिकल रेजिडेंट्स में डिप्रेशन एक समस्या के तौर पर पाई जाती है. तनाव का स्तर इस कदर होता है कि आत्महत्या की प्रवृत्ति हावी होने लगती है. इससे निपटने के लिए कई छात्र बिना डॉक्टर के पर्चे के खुद ही पेन-किलर या एंटी-डिप्रेसेंट लेने लगते हैं. इसकी वजह से वरिष्ठ डॉक्टरों के लिए काम का तनाव, प्रतिष्ठा पर आंच और अवसाद या थकान के लक्षणों को पहचान पाना मुश्किल हो जाता है.

लेडी डॉक्टरों हो रहीं बर्न आउट की शिकार

इस तरह की परेशानी सिर्फ पुरुष डॉक्टरों में देखने को नहीं मिल रही, बल्कि लेडी डॉक्टर भी इसका शिकार हो रही हैं. तनाव की समस्या महिला डॉक्टरों पर इस कदर हावी है कि वो वर्क प्लेस और घर, दोनों जगह दबाव की स्थिति रहने लगती हैं. इस वजह से महिला डॉक्टरों में बर्न आउट के मामले अधिक होने का जोखिम बना रहता है. वहीं महिला विशेषज्ञों की कम संख्या और उनके काम के अधिक घंटे भी इस समस्या को बढ़ा देते हैं.

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First published: 13 October 2018, 1:26 IST
 
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