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अब चोट सही होने के बाद नहीं पड़ेंगे घाव के निशान

कैच ब्यूरो | Updated on: 7 January 2017, 14:22 IST

शरीर में चोट लगने पर दर्द तो होता ही है लेकिन बाद में चोट का निशान स्थायी हो जाने के बाद इसे देखकर और बुरा लगता है. अधिकांश लोगों को यह किसी दाग से कम नहीं लगता. लेकिन अब शोधकर्ताओं ने एक तरीका खोजा है जिससे घाव भरने के बाद वहां पर निशान नहीं पड़ेगा.

अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिलवेनिया के शोधकर्ताओं ने इसके लिए तरीका खोजा है. इन वैज्ञानिकों ने इसके लिए फैट सेल्स (एडिपोसाइट्स) का इस्तेमाल किया है. यह त्वचा में पाए जाते हैं लेकिन जब घाव भर जाता है तो ये खत्म हो जाते हैं और निशान छोड़ जाते हैं. 

माना जा रहा है कि घाव भरने के लिए सबसे प्रमुख भूमिका माइयोफाइब्रोब्लास्ट्स सेल्स (कोशिकाओं) की होती है और यही वे कोशिकाएं होती हैं जो स्कार (निशान) डालती हैं.

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इसके अलावा स्कार टिश्यूज में कोई हेयर फॉलीकल्स (बालों से जुड़ी कोशिकाएं) भी नहीं होते जिससे बाकी त्वचा की तुलना में यह अजीब सी नजर आती है. वैज्ञानिकों ने इन्हीं गुणों को अपने काम का आधार बनाया और पहले से ही मौजूद होने वाले माइयोफाइब्रोब्लास्ट्स को फैट सेल्स (वसा कोशिकाओं) में बदल दिया जिससे त्वचा में कोई निशान न पड़े. 

पेंसिलवेनिया यूनिवर्सिटी के जॉर्ज काट्सारेलिस ने कहा, "वास्तव में हम घाव भरने की प्रक्रिया में बदलाव कर सकते हैं जिससे यह निशान बनाने की बजाए फिर से नई त्वचा का निर्माण करे. इसका रहस्य यह है कि सबसे पहले हेयर फॉलिकल्स को फिर से पैदा किया जाए. इसके बाद इन फॉलिकल्स से मिलने वाले सिग्नल की प्रतिक्रिया में फैट (वसा) फिर से पैदा हो जाता है."

यह शोध दिखाती है कि बालों और फैट का अलग-अलग विकास होता है लेकिन स्वतंत्र रूप से नहीं. जॉर्ज ने प्रयोगशाला में पहले यह हेयर फॉलिकल्स के निर्माण के लिए जरूरी तत्वों-कारणों खोज की थी क्योंकि यह पहले बनते हैं. 

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अब उन्होंने अन्य कारणों की भी खोज कर ली है जो वास्तव में हेयर फॉलिकल्स के पुनर्निर्माण के दौरान उत्पादित होते हैं. यह आसपास के माइयोफाइब्रोब्लास्ट्स को निशान बनाने की जगह फैट के रूप में पुनर्निर्माण करने देते हैं.

यह फैट बिना नए बालों के नहीं बन सकता, लेकिन अगर एक बार बन गया तो यह नई कोशिकाएं पहले से मौजूद फैट सेल्स (वसा कोशिकाओं) से बिल्कुल अलग नहीं दिखतीं, जिससे घाव भरने के बाद वहां की त्वचा बिल्कुल प्राकृतिक दिखाई देती है और कोई  निशान नहीं रहता. 

इस दौरान वैज्ञानिकों ने बालों से फैट सेल्स को भेजे जाने वाले सिग्नल के पीछे की वजह का भी पता लगाया जिसे बोन मॉर्फोजेनेटिक प्रोटीन (बीएमपी) कहते हैं. यही बीएमपी माइयोफाइब्रोप्लास्ट्स को वसा में तब्दील होने का निर्देश देता है. यह सिग्नलिंग (निर्देश देने की प्रक्रिया) अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसने माइयोफाइब्रोब्लास्ट् के बारे में पुराने तथ्यों को बदल दिया है. 

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जार्ज के मुताबिक, "सामान्यता माइयोफाइब्रोब्लास्ट्स के बारे में माना जाता था कि यह किसी अन्य प्रकार की कोशिका बनने की क्षमता नहीं रखते हैं. हालांकि हमारे शोध ने दिखाया कि हममें वो क्षमता है कि हम इन कोशिकाओं को प्रभावित कर दें और यह स्थायी रूप से और दक्षता से एडिपोसाइट्स में बदल सकती हैं."

इस शोध के नतीजे चूहों और इंसानों के केलॉयड सेल्स में दिखाई दिए. त्वचा विज्ञान के क्षेत्र में यह खोज आंदोलनकारी प्रभाव डालने की क्षमता रखती है. अन्य स्थितियों में एडिपोसाइट्स की कमी होना एक सामान्य समस्या है. विशेषरूप से एचआईवी के इलाज में और फिलहाल इसके इलाज की कोई कारगर रणनीति नहीं है. 

उम्र बढ़ने पर यह कोशिकाएं प्राकृतिक रूप से कम होती जाती है. विशेषरूप से चेहरे में जिससे इसमें गहरी झुर्रियां पड़ जाती है और एंटी-एजिंट ट्रीटमेंट इस मामले में संतोषजनक परिणाम नहीं देते हैं. यह शोध जर्नल ऑफ साइंस में प्रकाशित हुई है. 

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First published: 7 January 2017, 14:22 IST
 
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