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विश्व एड्स दिवसः लोगों को नहीं पता एचआईवी और एड्स का अंतर

कैच ब्यूरो | Updated on: 1 December 2017, 20:27 IST

अगर लोगों से पूछा जाए कि एचआईवी और एड्स में क्या अंतर है, तो अधिकांश शायद इसका जवाब नहीं जानते होंगे. जो जानते भी होंगे वो बताएंगे कि एचआईवी वायरस है और एड्स इससे होने वाली बीमारी. लेकिन हर एचआईवी संक्रमित एड्स मरीज हो ऐसा जरूरी नहीं. यूं तो दुनिया 1 दिसंबर को विश्व एड्स दिवस मना रही है लेकिन अभी भी इसके बारे में जागरूकता की काफी कमी है.

दूसरी तरफ देश में एड्स और एचआईवी के खिलाफ लड़ाई पर बढ़ते ध्यान के बीच चिकित्सकों का मानना है कि इन दोनों ही पहलुओं को लेकर जागरूकता की जररूत है. एचआईवी का इलाज करने वाले कोलकाता के एक प्रमुख चिकित्सक डॉ. इंद्रजीत कुमार तिवारी की मानें तो, "एचआईवी एक वायरस है और एड्स ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति एचआईवी से संक्रमित हो जाता है. एचआईवी और एड्स इन दोनों शब्दों को एक दूसरे के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और इसकी वजह इनकी जांच और इलाज दोनों में ही भिन्नता है."

उन्होंने आगे कहा, "कोई व्यक्ति एचआईवी से संक्रमित हो सकता है और इसके बावजूद वो एड्स बीमारी से बचते हुए लंबा जीवन जी सकता है. एचआईवी जब पूरी तरह विकसित हो जाता है तब यह एड्स का स्वरूप धारण कर लेता है. अगर एचआईवी की शुरुआत में ही जांच और इलाज कराया जाए तो इससे बचा जा सकता है. ऐसे वक्त में लोगों के बीच एचआईवी के विषय में शिक्षा और जागरूकता की जरूरत सबसे ज्यादा हो जाती है.”

अगर बात करें इससे संबंधित जानकारी तो एचआईवी का मतलब ह्युमन इम्यूनोडेफिसिएंसी वायरस (Human Immunodeficiency Virus-HIV) होता है. जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है कि जब एचआईवी वायरस शरीर की इम्यूनिटी (प्रतिरोधक क्षमता) को बर्बाद कर देता है और शरीर को मजबूर कर देता है कि वो आसपास के परजीवियों से लड़ने की क्षमता खो दे, संक्रमित व्यक्ति एड्स का शिकार हो जाता है. इन संक्रमणों में कई कुछ चुनिंदा कैंसर के प्रकार, तपेदिक, निमोनिया और अन्य संक्रमण जैसे रोग शामिल हैं.

कानपुर स्थित जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. एससी गुप्ता कहते हैं, "महिला एड्स रोगियों की तादाद में भी बढ़ोतरी हुई है. महिलाओं में इसके ज्यादा होने की संभावना का कारण जागरूकता का अभाव, कम चिकित्सीय देखभाल, जांच में देरी और अन्य जोखिम हैं. इसको लेकर सबसे बड़ी परेशानी बीमारी से जुड़ा कलंक है. वो बताते हैं कि हो सकता है कि एक व्यक्ति को एचआईवी हो, लेकिन इसका यह मतलब निकलना जरूरी नहीं कि यह एड्स में बदल जाए. एचआईवी वायरस आने के प्राथमिक कारणों में यौन संपर्क, खुले घावों या प्रभावित मसूड़ों के संपर्क में खून का आना या फिर नसों के जरिये ड्रग्स लेना, आदि शामिल है.”

आमतौर पर एचआईवी का अंतिम चरण एड्स होता है. एड्स बीमारी की पहचान करने की अपेक्षा एचआईवी की जांच आसान और कम कठिन है. एड्स को निर्धारित करने के लिए उन अवसरों पर होने वाले संक्रमण भी देखे जाते हैं जिनके जरिये कई परजीवी प्रतिरक्षा तंत्र को अपेक्षाकृत कमजोर बना देते हैं.

एचआईवी एक पुरानी बीमारी है लेकिन चिकित्सा विज्ञान और इस बीमारी से जुड़ी शोध में हुई अत्याधुनिक प्रगति के चलते, एचआईवी मरीजों का लंबा जीवन जीना सुनिश्चित हो रहा है. शुरुआत में एचआईवी का पता चलने को मौत की सजा माना जाता था. लेकिन एंटीरेट्रोवायरल इलाज-दवाओं जैसे उपचारों से दुनिया भर के संगठन इस महामारी को फैलाने वाले वायरस को नष्ट करने में महत्वपूर्ण प्रगति कर रहे हैं.

करीब 25 लाख एचआईवी मरीजों के साथ भारत कथितरूप से दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा एचआईवी संक्रमित देश हो गया है, ऐसे में लागत प्रभावी उपायों, बीमारी के बारे में जागरूकता, गर्भ निरोधक के अवरोध के तरीकों को बढ़ावा देने, स्कूलों में सेक्स शिक्षा और महिलाओं की बेहतर देखभाल जैसे कुछ तरीके अपनाकर इस बीमारी से लड़ा जा सकता है.

एचआईवी के खिलाफ उपलब्ध उपचार के नए विकल्पों के बारे में बताते हुए डॉ. गुप्ता कहते हैं, “एचआईवी का इलाज छोड़ने वाले मरीजों की बढ़ती तादाद का कारण मौजूदा दवाओं के तमाम दुष्प्रभाव भी हैं. एचआईवी के प्रभावी प्रबंधन के लिए इलाज की दृढ़ता एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. एचआईवी की दवाओं से होने वाले कुछ दुष्प्रभावों में लिवर-किडनी की अनियमित कार्यप्रणाली, बोन-मैरो में कमी, हड्डियों का कमजोर होना, अवसाद, आत्मघाती विचारधारा जैसी प्रमुख परेशानियां हैं. अच्छे संयोजन के साथ अत्यधिक सक्रिय एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (हार्ट) बढ़ते वायरल प्रभाव और बीमारी को रोक सकती है. कम दुष्प्रभावों और उसी ताकत के साथ नई एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी वाली दवाएं अब सस्ते दाम में उपलब्ध हैं, जो मरीजों के बीच इलाज की दृढ़ता को सुनिश्चित करने में मददगार हो रही हैं.”

First published: 1 December 2017, 20:27 IST
 
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