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सख्ती से बढ़ी एनजीओ की मुश्किलें

अभिषेक पराशर | Updated on: 30 July 2016, 7:31 IST
QUICK PILL
  • नरेंद्र मोदी सरकार का पहला दो साल का कार्यकाल देश में काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) पर भारी पड़ता नजर आ रहा है. 
  • 2014-15 में देश में काम करने वाले एनजीओ को 2013-14  के मुकाबले दोगुना विदेशी चंदा मिला था.
  • सरकार ने 2015 में करीब 10,000 से अधिक एनजीओ के रजिस्ट्रेशन को रद्द किया था. इसकी वजह से विदेशी चंदे की रकम में भारी कमी आ गई है.
  • पिछले महीने ही सरकार ने वरिष्ठ एडवोकेट इंदिरा जयसिंह के एनजीओ के एफसीआरए रजिस्ट्रेशन को छह महीने के लिए निलंबित कर दिया है.

नरेंद्र मोदी सरकार का पहला दो साल का कार्यकाल देश में काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) पर भारी पड़ता नजर आ रहा है. 

2014-15 में देश में काम करने वाले एनजीओ को 2013-14  के मुकाबले दोगुना विदेशी चंदा मिला था. लेकिन सरकार ने जिस तरह से 2015 में करीब 10,000 से अधिक एनजीओ के रजिस्ट्रेशन को रद्द किया है, उसे देखते हुए आने वाले दिनों में विदेशी चंदे की रकम में भारी कमी आने का अनुमान है.

26 जुलाई 2016 को लोकसभा को उपलब्ध कराए गए आंकड़ोंं के मुताबिक दिल्ली, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल को भारत मे आने वाले कुल विदेशी चंदे का 65 फीसदी हिस्सा मिलता है. इंडिया स्पेंड की एनालिसिस बताती है कि 2011-12 से 2014-15  के बीच दिल्ली और अन्य चार राज्यों में काम करने वाले एनजीओ को 45,300 करोड़ रुपये का विदेशी चंदा मिला. 

दिल्ली में काम करने वाली गैर सरकारी संस्थाओं को 10,500 करोड़ रुपये मिले जबकि बाकी के पांच राज्यों   तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और महाराष्ट्र को इन चार सालों में 5,000 करोड़ रुपये मिले. गृह मंत्रालय की तरफ से 10,000 एनजीओ का एफसीआर रजिस्ट्रेशन रद्द किए जाने के बाद विदेशी चंदा लेने वाले एनजीओ की संख्या 33,901 रह गई है. 

सरकार का कहना है कि इन एनजीओ ने आयकर  रिटर्न दाखिल नहीं किया और साथ ही इन्होंने उन कार्यों के लिए चंदा लिया जिसे करने की मनाही है. इसमें जमानत की फंडिंग से लेकर अदालत में दाखिल की जाने वाली याचिका तक का खर्च शामिल है. 

2015 में सरकार ने पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले गैर सरकारी संगठन ग्रीनपीस का लाइसेंस रद्द कर दिया था

देश में अंतरराष्ट्रीय संस्थानों या फिर उनकी फंडिंग से मदद चलने वाले एनजीओ को लेकर मोदी सरकार की टेढी नजर रही है. पिछले महीने ही सरकार ने वरिष्ठ एडवोकेट इंदिरा जयसिंह के एनजीओ के एफसीआरए रजिस्ट्रेशन को छह महीने के लिए लंबित करने का फैसला लिया है. एफसीआरए रजिस्ट्रेशन रद्द होने के बाद कोई एनजीओ विदेशी दानदाताओं से चंदा नहीं ले पाएगा.

2015 में सरकार ने पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले गैर सरकारी संगठन ग्रीनपीस के फॉरेन कंट्रीब्यूशन रजिस्ट्रेशन एक्ट (एफसीआरए) लाइसेंस को रद्द कर दिया था. सरकार का कहना था कि ग्रीनपीस की गतिविधियां कथित तौर पर देश की आर्थिक तरक्की के खिलाफ है.

सरकार इससे पहले ग्रीनपीस के सात बैंक खाते को यह कहते हुए जब्त कर चुकी है कि संस्था देश की आर्थिक तरक्की और सार्वजनिक हित के खिलाफ काम कर रही है.

अहमदाबाद में काम करने वाले एनजीओ के एक अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया, 'मोदी सरकार प्रतिरोध की हर उस आवाज को दबा देना चाहती है जो वाजिब हकों के मांग में तेज होती है. सरकार देश में लोकतांत्रिक विरोध की परंपरा को ही खत्म कर देना चाहती है और इसके लिए राष्ट्र की सुरक्षा औरर आर्थिक तरक्की से बेहतर कोई तर्क नहीं हो सकता.'

अधिकारी ने कहा, 'सरकार की मंशा उन सभी एनजीओ को पंगु बना देने की है जो पर्यावरण और हाशिए पर पड़े लोगों के लिए काम करते हैं. आर्थिक तरक्की में बाधा बस बहाना भर है. जिन इलाकों में खनन का काम चल रहा है वहां सरकार झटके में लोगों को उनके घर से  विस्थापित कर देती और जो इसका विरोध करते हैं उन्हें गलत धाराओं में जेल में बंद कर दिया जाता है. ऐसे में उनकी लड़ाई देश का नागरिक समाज ही तो लड़ेगा. क्या उन्हें ऐसे ही जेल में सड़ने के लिए छोड़ दिया जाए?'

विदेशी चंदे पर बढ़ी सख्ती

एनजीओ को मिलने वाले विदेशी चंदे पर भले ही पिछले दो सालों के दौरान बड़े पैमाने पर कार्रवाई की गई, हालांकि यह सिलसिला पिछले चार सालों से जारी है.

पिछले चार सालों के दौरान नियमों के उल्लंघन के मामले को आधार बनाते हुए करीब 14,222 से अधिक एनजीओ को विदेशी चंदा लेने से रोक दिया गया.

लोकसभा को दी गई लिखित जानकारी में गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने बताया कि सबसे अधिक संख्या में एनजीओ पर पिछले साल प्रतिबंध लगाया गया.  उन्होंने बताया कि पिछले साल 10,220 एनजीओ पर प्रतिबंध लगाया गया. 2012, 2013 और 2014 में क्रमश: 4,158, 4 और 59 एनजीओ को विदेशी चंदा लेने से प्रतिबंधित किया गया. 

पिछले महीने ही केंद्र ने सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ के एनजीओ के एफसीआरए लाइसेंस को अस्थायी तौर पर निलंबित कर दिया था. सीतलवाड़ पर एनजीओ को मिले पैसे के साथ हेरफेर करने का आरोप है.

सीतलवाड़ और उनका एनजीओ गुजरात में 2002 में हुए दंगा पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए काम करते रहे हैं.

स्वास्थ्य, शिक्षा और बाल कल्याण जैसे कार्यों के लिए भारत में 2011-12 के दौरान 12,000 करोड़ रुपये आए.

अधिकारी ने बताया कि भारत में काम करने वाले एनजीओ को मिलने वाली फंडिंग का इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य और बाल कल्याण जैसे कल्याणकारी कार्यक्रमों को पूरा करने में किया जाता है.

एफसीआरए  की 2011-12 की सालाना रिपोर्ट से भी इसकी पुष्टि होती है. स्वास्थ्य, शिक्षा और बाल कल्याण जैसे कार्यों के लिए भारत में 2011-12 के दौरान 12,000 करोड़ रुपये आए. वहीं धार्मिक क्षेत्र में काम करने वाले एनजीओ को इस दौरान 870 करोड़ रुपये जबकि शोध के क्षेत्र में लगी ऐसी संस्थाओं को 539 करोड़ रुपये मिले.

First published: 30 July 2016, 7:31 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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