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भटकी हुई मिसाइल: सुब्रमण्यम स्वामी की 10 खासियतें

चारू कार्तिकेय | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST

सुब्रमण्यम स्वामी ने खुद को दी गई भूमिका का निर्वहन बहुत ही शानदार तरीके से किया है. राज्यसभा के सदस्य के रूप में अपने कार्यकाल के पहले ही दिन उन्होंने उन्होंने वह कारनामा किया जिसके लिए उन्हें जाना जाता है- गांधी परिवार और कांग्रेस पार्टी पर सीधा हमला. 

अपने संबोधन में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का नाम ले-लेकर उन्होंने कांग्रेसियों को इतना उत्तेजित कर दिया कि सारा कांग्रेसी विपक्ष एकसाथ उठकर खड़ा हो गया और सत्तापक्ष के साथ लगभग धक्कामुक्की करने की स्थिति में आ गया.

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जीवन के 70 वसंत देख चुके इस वरिष्ठ नेता का संसद में छठा कार्यकाल है जो 17 वर्ष लंबे राजनीतिक वनवास के बाद लौटा है. हालांकि इस दौरन उन्होंने खुद को न्यायिक सक्रियता के जरिए व्यस्त और प्रासंगिक बनाए रखा और 2जी स्पेक्ट्रम, नेशनल हेरल्ड और मानहानि सहित कई बड़े मामलों में शामिल रखा.

राजनीतिक मुख्यधारा में वापस लौटने की कवायद में उन्होंने 2013 में अपने एक सदस्यीय जनता पार्टी का विलय बीजेपी में कर दिया जिसके बदले आखिरकार उन्हें इसी सप्ताह राज्यसभा की सदस्यता से नवाजा गया.

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दिल्ली के लुटियन जोन में ऐसी अफवाहें हैं कि उन्हें इनाम स्वरूप सिर्फ यह सीट ही नहीं मिली है बल्कि अभी तो उनके लिये और भी बहुत कुछ है और हो सकता है कि निकट भविष्य में उन्हें मंत्रीपद से भी नवाजा जाए.

अब जब उनका राजनीतिक वनवास समाप्त हो चुका है तो ऐसे में उनके राजनीतिक जीवन और करियर पर एक नजर डालना बेहतर रहेगा. अगर हम सुब्रमण्यम स्वामी को 10 बिंदुओं में समेट कर देखें तो वे कुछ ऐसे होंगे:

1. कांग्रेस विरोधी

स्वामी गांधी परिवार के पुराने दुश्मन हैं. वे सोनिया गांधी के इतावली मूल को लेकर हमेशा हमला करते रहे हैं और उन्हें भ्रष्टाचार के मूलस्रोत के रूप में देखते हैं. उन्होंने सोनिया पर हमला करने के लिये हमेशा कुछ विशेष संबोधनों का सहारा लिया है. हालांकि उन्होंने कभी भी सोनिया के पति स्व. राजीव गांधी पर हमला नहीं किया है. वे हमेशा खुद को राजीव का मित्र होने का दावा करते आए हैं.

वे हमेशा से यह मानते आए हैं कि बोफोर्स की दलाली का पैसा राजीव गांधी को नहीं बल्कि इटली में रहने वाले सोनिया के परिवार को मिला. वो वीवीआईपी हेलीकाॅप्टर सौदे में भी इसी बिंदु को सामने लाने का प्रयास कर रहे हैं.

2. वामपंथी डीएनए

स्वामी के पिता सीतारमण सुब्रमण्यम भारतीय सांख्यिकी सेवा के नौकरशाह थे और उन्हें वामपंथी विचारधारा से प्रेरित माना जाता था. हालांकि उनकी माता पद्मावती सुब्रमण्यम का झुकाव आरएसएस की तरफ था और शायद यही उनके दक्षिपंथी व्यक्तित्व का प्रारंभिक कारण भी है.

3. परिवार में धार्मिक विविधता

स्वामी की पत्नी रोक्सना पारसी समुदाय से आती है और ऐसा माना जाता है कि दोनों की मुलाकात हावर्ड में युवा छात्रों के रूप में हुई थी. उनकी छोटी बेटी सुहासिनी हैदर, जो पत्रकार हैं, का विवाह एक मुस्लिम नदीम हैदर से हुआ है. नदीम पूर्व विदेश सचिव सलमान हैदर के पुत्र हैं. 

स्वामी का दावा है कि उनके बहनोई एक यहूदी हैं और और भाभी एक ईसाई. इनमें से कुछ भी हिंदू बहुसंख्यकवाद की उनकी व्यक्तिगत विचारधारा से नहीं टकराता है.

4. अथक मुकदमेबाज

स्वामी एक सफल वादी और मुकदमेबाज हैं जिन्होंने विभिन्न अदालतों में कई मामले दर्ज करवा रखे हैं. लेकिन एक भटकी हुई मिसाइल की तरह काम करने के कारण कई मामलों में उन्हें मुंह की भी खानी पड़ी है. 

हाल ही में आईआईटी दिल्ली से अपने निष्कासन के खिलाफ उन्होंने सफलतापूर्वक कानूनी लड़ाई लड़ी. उनकी न्यायिक उपलब्धियों में यह सबसे ताजा मामला है.

यूपीए के कार्यकाल के दौरान हुए 2जी घोटाले से जुड़े निर्णयों में भी उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी. इसके अलावा सोनिया और राहुल गांधी के खिलाफ हालिया नेशनल हेरल्ड मामले में भी उनकी सक्रिय भूमिका है. इसके अलावा स्वामी मानहानि से जुड़े कानूनों को खत्म करने के लिये भी एक केस लड़ रहे हैं.

5. जेपी के नाममात्र के उत्तराधिकारी

स्वामी, जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाले उस महागठबंधन का भी एक हिस्सा रहे हैं जो इंदिरा गांधी के विरोधियों को इकट्ठा कर तैयार किया गया था. 

इस गठबंधन को 1977 के चुनावों से पहले जनता पार्टी के नाम से जाना गया और 1988 में जनता दल में विलय तक यह अस्तित्व में रहा. स्वामी ने इसके नाम और चिन्ह को बनाए रखा और 2013 तक वे इसके अध्यक्ष बने रहे.

6. निष्कासित सांसद और आपातकाल का नायक

स्वामी उन चंद सांसदों में से हैं जिन्हें संसदीय इतिहास में संसद से निष्कासित किया गया है. हालांकि ऐसा आपातकाल के दौरान हुआ था. तब उनके वैश्विक आपातकाल विरोधी अभियान को भारत विरोधी करार देते हुए तत्कालीन सरकार ने उन्हें संसद से निष्कासित कर दिया था.

7. सरकार गिराने वाला

स्वामी अपने कारनामों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर दो केंद्र सरकारों (पहले 1990 में वीपी सिंह के नेतृत्व वाली और फिर 1998 में वाजपेयी की 13 महीने पुरानी सरकार) के पतन का कारण बनने के अलावा दो राज्यों के मुख्यमंत्रियों (1996 में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता और 1988 में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े) की सरकार गिरा चुके हैं.

8. हिंदु कट्टरपंथी

वर्तमान दौर में जब बीजेपी भी हिंदुत्व वाले अपने मूल मुद्दों पर खुलकर बात करना पसंद नहीं करती है तब स्वामी खुलकर जनता के बीच राम मंदिर, धारा 370 और समान नागरिक संहिता जैसे विषयों को उठाते रहते हैं.

उनकी भविष्यवाणी थी कि मोदी सरकार सितंबर 2015 तक धारा 370 को हटा देगी. अपनी कट्टरपंथी छवि को बनाए रखने के लिये वे कई बार चरम इस्लामोफोबिया प्रदर्शित करने से भी नहीं चूकते हैं. 2011 में डीएनए अखबार में भारतीय मुसलमानों को मताधिकार से वंचित करने संबंधी एक लेख लिखने को लेकर उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा था.

9. भुलाए हुए अर्थशास्त्री

स्वामी मूल रूप से एक अर्थशास्त्री हैं और उन्होंने मात्र 24 वर्ष की उम्र में हावर्ड से पीएचडी की डिग्री प्राप्त कर ली थी. उनका दावा है कि वे पाॅल सैमुअल्सन और नोबेल पुरस्कार विजेता साइमन कुज्नेट जैसे प्रख्यात अथशास्त्रियों के सानिध्य में काम कर चुके हैं. 

हालांकि उनके विवादित सार्वजनिक जीवन के चलते उनका शैक्षणिक ज्ञान और उपलब्धियां काफी पीछे रह जाती हैं.

10. सोशल मीडिया के महारथी

स्वामी एक मशहूर ट्वीटर हैं और इस सोशल मीडिया मंच पर उनके 2.5 मिलियन फाॅलोवर हैं. उन्होंने अपने मन की बात खुलकर कहने के लिये अपनी एक अलग ही शब्दावली भी तैयार कर रखी है. 

उनकी शब्दावली को समझाने वाली और उन शब्दों के माध्यम से वे क्या कहना चाहते हैं यह बताने वाली विस्तृत गाइडें भी इंटरनेट पर मौजूद हैं.

First published: 29 April 2016, 10:02 IST
 
चारू कार्तिकेय @charukeya

असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़, राजनीतिक पत्रकारिता में एक दशक लंबा अनुभव. इस दौरान छह साल तक लोकसभा टीवी के लिए संसद और सांसदों को कवर किया. दूरदर्शन में तीन साल तक बतौर एंकर काम किया.

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