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वनाधिकार कानून के 10 साल: कुछ आदिवासी खुश, ज़्यादातर दर्द में

आकाश बिष्ट | Updated on: 11 February 2017, 5:46 IST
(मनप्रीत रमोना/एएफ़पी)

धनेश्वर मोहन्ता खुश हैं कि अब उनका गांव ज्यादा समय तक माओवाद के प्रभाव में नहीं रहेगा और तरक्की की राह पर चल निकलेगा. इसका श्रेय वह ओडिशा सरकार को देते हुए कहते हैं कि सरकार ने सिमलीपाल टाइगर रिजर्व (एसटीआर) के महत्वपूर्ण और घने इलाके में स्थित 43 गांवों को कम्युनिटी फॉरेस्ट राइट्स (सीएफआर) के तहत मान्यता दे दी है. मोहन्ता कहते हैं कि अब लम्बे समय तक वन विभाग और ग्रामीणों के बीच तनावपूर्ण सम्बंध नहीं रह सकेंगे जिसका फायदा माओवादी अब तक उठाते रहे हैं.

मोहन्ता का गांव उन 43 गांवों में से एक है जिसे अप्रैल 2015 में अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परम्परागत वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम-2006 के तहत मान्यता दी गई थी. जनजातियों को यह अधिकार वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) के नाम से ज्यादा जाना जाता है.

ओडिशा के मयूरभंज जिले के इटामुंडी गांव के रहने वाले लोग दिल्ली में वन अधिकार अधिनियम की 10वीं सालगिरह पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने नई दिल्ली आए हुए हैं. इटामुंडी गांव भी एसटीआर के क्षेत्र में पड़ता है.

मोहन्ता कहते हैं कि सरकार ने अब जाकर महसूस किया है कि किस तरह से माओवादी गांव वालों का शोषण कर रहे थे, लोगों का वन अधिकारों को लेकर वन विभाग पर गुस्सा किस तरह था. सरकार ने इस मुद्दे पर कुछ ठोस करने का निश्चय किया है. सरकार ने अप्रैल 2015 में सीएफआर और वन सम्पदा पर हर आदिवासी के अधिकार को मान्यता दी थी जिसका जनजातीय लोगों ने स्वागत किया था.

मोहन्ता के विचारों को ही दोहराते हुए एक एनजीओ का कहना है कि सरकार ने एफआरए के तहत आदिवासियों को वन और उसके संसाधनों पर अधिकार देते हुए नक्सलियों से मिलने वाली चुनौतियों का अवसर दिया है. माओवाद 10 राज्यों के 106 जिलों में फैला हुआ है.

कमजोर क्रियान्वयन

ऐसे समय जब 43 गांवों के लोग अपनी नई आजादी का जश्र मना रहे हैं तो इसी समय 'वन अधिकारों के 10 साल, वादा और कार्य सम्पादन' शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की गई है. रिपोर्ट में पूरे देश में एफआरए का किस तरह से क्रियान्वयन हुआ है, उसकी भयावह तस्वीर पेश की गई है. रिपोर्ट में उन चीजों को रेखांकित किया गया है कि किस तरह से 3 करोड़ हेक्टेयर से ज्यादा वन भूमि पर से एक करोड़ नब्बे लाख लोगों को उनके अधिकार से दूर रखा गया है. 

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के वन अधिकार अधिनियम के तहत 200 मिलियन से ज्यादा अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परम्परागत वनवासियों में से 5 फीसदी से भी कम लोगों को, उनके अधिकारों को मान्यता मिल सकी है.

एफआरए के क्रियान्वयन में ओडिशा, गुजरात, महाराष्ट्र और केरल जैसे राज्य अग्रणी रहे हैं जबकि अन्य राज्य जैसे कि असम, बिहार, गोवा, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड एफआरए को लागू करने में विफल रहे हैं. इस अधिनियम का उद्देश्य यही था कि भारत के इन जनजातीय समुदायों के अधिकारों का संरक्षण किया जाए.

यहां तक कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी एफआरए के अप्रभावी क्रियान्वयन को लेकर अपना रोष जताया है. पीएमओ ने 27 नवम्बर को सात राज्यों को लिखे पत्र में भी लिखा है कि सदियों से जंगलों में रहते आ रहे आदिवासियों के अधिकारों को बहाल किया जाए.

एफआरए को लागू करने में सात राज्य काफी पीछे रह गए हैं. इन राज्यों में असम, बिहार, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और झारखंड शामिल हैं.

कल्पवृक्ष संस्था से जुड़ी नीमा पाठक ब्रूमी कहती हैं कि एफआरए वनों और जैव-विविधिता का संरक्षण करने, स्थानीय लोगों का जीवनस्तर बढ़ाने और विकास और पर्यावरण बदलावों को लेकर भारत द्वारा की गई अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबद्धता को पूरा करने में सम्भावित रूप से समर्थ है. दुर्भाग्य से राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव और कानूनों को अनदेखा करने के चलते वनों के गवर्नेन्स की इस लोकतांत्रिक ताकत को महसूस ही नहीं किया जा सका है.

स्टाफ और राजनातिक इच्छाशक्ति का अभाव

हालांकि, इस रिपोर्ट में जनजातीय मंत्रालय द्वारा एफआरए के लिए बनाई गई नोडल एजेंसी का स्वागत किया गया है, पर साथ ही मंत्रालय तथा राज्यों में जनजातीय कल्याण विभागों में स्टाफ की कमी के कारण उनका कम समर्थन मिलने की भी आलोचना की गई है. 

इस राष्ट्रव्यापी अध्ययन में रेखांकित किया गया है कि किस तरह से एक सचिव, दो संयुक्त सचिव, एक उप महानिदेशक और एक आर्थिक सलाहकार न केवल एफआए से जुड़े कार्यों को संभाल रहे हैं जबकि उनके पास अन्य कई भारी-भकरकम कामों का उत्तरदायित्व पहले से ही है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वैसे तो स्वीकृत कर्मचारियों की संख्या 137 हैं जबकि वास्तव में केवल 101 कर्मचारी ही काम पर हैं। इससे अधिक, एफआरए को लागू करने के लिए अलग से अतिरिक्त बजट का भी कोई प्रावधान नहीं है. इसकी वजह यह है कि मंत्रालय भी इन चुनौतियों से जूझने में उदास है.

यहां तक कि राज्य स्तर की नोडल एजेंसियों में भी बेहतर क्रियान्वन के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति को सुनिश्चित करने का अभाव है.

इन जनजातियों के हितों के लिए अभियान चलाने वाले एक संगठन के सदस्य मधु सरीन कहते हैं कि वन विभागों के अवरोधों, असहयोग, मंत्रालयों के बीच समन्वय आदि का अभाव आदि वह वजहें हैं जिसके चलते एफआरए के प्रावधानों को अमल में नहीं लाया जा सका है. अब यह ज़रूरी हो गया है कि जिला स्तर से लेकर राज्य स्तर तक की नोडल एजेंसियों को मजबूत बनाया जाए और वन सम्बंधित सभी कानूनों और नीतियों को एफआरए से सुसंगत बनाया जाए.

यूपीए के कार्यकाल के दौरान व्यापक विचार-विमर्श करने के बाद यह महत्वपूर्ण विधेयक पारित किया गया था ताकि अंग्रेज कालीन और बाद के आजाद भारत के कानूनों से उन्हें छुटकारा दिलाया जा सके. इसका उद्देश्य यही था कि सदियों से जंगलों में जो रह रहे हैं, उन्हें संरक्षित किया जा सके.

एफआरए से उम्मीद की एक किरण दिखी थी कि सालों से चले आ रहे अन्याय का खात्मा होगा लेकिन इसके घटिया क्रियान्वयन और राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में गरीब आदिवासी कहीं अपने पुराने दिन देखने को मजबूर न हो जाएं.

First published: 15 December 2016, 8:07 IST
 
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