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जलियांवाला बाग हत्याकांड: प्रथम विश्व युद्ध के साथ ही लिख गयी थी इस नरसंहार की भूमिका

कैच ब्यूरो | Updated on: 13 April 2018, 13:06 IST

आज ही के दिन भारत के इतिहास की सबसे खूनी बैसाखी हुई थी. हजारों की संख्या में लोग अमृतसर के जलियांवाला बाग में अपने नववर्ष का जश्न मनाने के लिए इकट्ठे हुए थे. और अचानक ही अंग्रेज जनरल डायर अपने सिपाहियों के साथ पहुंचा और बिना बिना किसी चेतावनी के उसने वहां मौजूद निहत्थे लोगों पर गोलियां बरसाने का हुक्म दे डाला.

स्वर्ण मंदिर से कुछ दूर जलियांवाला बाग़ की बनावट कुछ ऐसी थी कि वहां से आने और जाने का सिर्फ एक ही गेट था. चारों और ऊंची दीवारें पीछे बन्दूकलिये अंग्रेज, बचने का कोई तरीका न था, एक कुआं जरूर था, पर जान वो भी नहीं बचा पाया. इस कुएं ने लोगों की जान बचाने से ज्यादा उनकी जान ले ली.

 

लोग वहां एक-दूसरे को कुचलकर लोग उन दीवारों पर चढ़ने की कोशिश करने लगे. यह गोलियां करीब 10 मिनट तक बिन रुके चलती रहीं. जब गोलियां खत्म हुईं, हर तरफ लाशें ही लाशें थीं. हुकूमत के रिकॉर्ड के हिसाब से 379 लोगों की मौत हुई थी, लेकिन हकीकत में 1000 से ज्यादा लोग मारे गए थे और 2000 से ज्यादा घायल हुए थे. मानव इतिहास में हुए सबसे भयानक जनसंहारों में एक नाम जलियांवाला बाग जनसंहार का भी है.

प्रथम विश्व युद्ध के साथ ही लिखी गई थी जलियांवाला बाग की पृष्ठभूमि
पहला विश्व युद्ध खत्म हुए 4 महीने हो चुके थे. इस विश्व युद्ध में करीब 13 लाख भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजी हुकूमत ही तरफ से यूरोप, अफ्रीका और मिडिल ईस्ट में लड़ाइयां लड़ी थीं. लाखों से अपनी जान भी गवाई थी. इस युद्ध में भारतीय नेताओं ने अंग्रेजों की हर तरह से मदद की थी. लेकिन बंगाल और पंजाब में अभी भी अंग्रेजों के खिलाफ प्रदर्शन जारी थे. अंग्रेज बंगाल और पंजाब में होने वाले इन विद्रोहों पर अपनी पकड़ बनाने की कोशिश में थे.

अंग्रेजी हुकूमत से आजादी पाने की इच्छाएं 1857 में पूरी नहीं हो पाई थीं और अब एकबार फिर कुलबुलाने लगी थीं. युद्ध की शुरुआत से ही अमेरिका, कनाडा और जर्मनी में रहने वाले भारतीय भी अब बर्लिन कमेटी और गदर पार्टी से जुड़कर 1857 जैसा संगठित विद्रोह करने की तैयारी करने में लग गए थे.

भारत की जनता में अविश्वास बढ़ रहा था और 1919 में उन्हें दबाने के लिए अंग्रेजी हुकूमत ने 'रोलेट एक्ट' प्रस्तावित कर दिया. यह एक्ट पंजाब और बंगाल के क्रांतिकारियों को दबाने के लिए बनाया गया था. इस एक्ट के चलते वाइसराय को बहुत ताकत मिल गई थी. प्रेस को चुप करवाना, किसी भी राजनेता को बिना पेशी के जेल में बंद कर देना और बिना वार्रेंट के किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार कर लेना अब वाइसराय की ताकत का हिस्सा था.

हंटर कमीशन

इस हत्याकांड की विश्वव्यापी निंदा हुई जिसके दबाव में सेक्रेटरी ऑफ स्टेट एडविन मॉंटेग्यू ने 1919 के अंत में इसकी जांच के लिए हंटर कमीशन नियुक्त किया. कमीशन के सामने ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर ने स्वीकार किया कि वह गोली चलाने का निर्णय पहले से ही ले चुका था और वह उन लोगों पर चलाने के लिए दो तोपें भी ले गया था, जो कि उस संकरे रास्ते से नहीं जा पाई थीं.

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हंटर कमीशन की रिपोर्ट आने पर 1920 में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को पदावनत कर कर्नल बना दिया गया और उसे भारत में पोस्ट न देने का निर्णय लिया गया. भारत में डायर के खिलाफ बढ़ते गुस्से के चलते उसे स्वास्थ्य कारणों के आधार पर ब्रिटेन वापस भेज दिया गया.

ब्रिटेन में हाउस ऑफ कॉमंस ने डायर के खिलाफ निंदा का प्रस्ताव पारित किया, परंतु हाउस ऑफ लॉर्ड ने इस हत्याकांड की प्रशंसा करते हुए उसका प्रशस्ति प्रस्ताव पारित किया. विश्वव्यापी निंदा के दबाव में बाद में ब्रिटिश सरकार को उसका निंदा प्रस्ताव पारित करना पड़ा और 1920 में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को इस्तीफा देना पड़ा.

First published: 13 April 2018, 13:06 IST
 
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