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पैसे के बदले में सवाल: 11 साल बाद संसद को आई अपने पूर्व सांसद रामसेवक सिंह की सुध

शैलेंद्र तिवारी | Updated on: 11 August 2016, 7:33 IST

आखिरकार 11 साल बाद लोकसभा सचिवालय को पूर्व सांसद रामसवेक सिंह बाबूजी के सवालों का जवाब देने की सुध आ गई. हालांकि जवाब में भी सिर्फ इतना ही कहा गया कि अगर लोकसभा सचिवालय के भीतर सांसद के साथ कुछ गलत हो रहा था तो वह पुलिस के पास क्यों नहीं गए.

रामसेवक सिंह बाबूजी वही पूर्व सांसद हैं, जिन्हें 2005 में पैसे लेकर सवाल पूछने के मामले में अपनी लोकसभा की सदस्यता से हाथ धोना पड़ा था. रामसेवक सिंह के साथ 11 और सांसदों को लोकसभा से बाहर किया गया था. हालांकि रामसेवक सिंह लगातार यही सवाल उठाते रहे हैं कि उन्होंने वह सवाल पूछा ही नहीं था, जिसको लेकर उन्हें लोकसभा में आरोपी बनाया गया.

उस सवाल पर उनके दस्तखत तक नहीं थे, इसके सबूत भी उन्होंने 13 दिसंबर 2005 को ही दे दिए थे. लेकिन न उन सवालों के जवाब मिले और न ही लोकसभा ने उनके तर्कों पर कुछ कहा.

रामसेवक सिंह को 2005 में पैसे लेकर सवाल पूछने के मामले में लोकसभा की सदस्यता से हाथ धोना पड़ा था

11 साल बाद अचानक से एक बार फिर मामले ने तूल पकड़ा है. सचिवालय ने मुख्य सूचना आयुक्त की फटकार के बाद जवाब दिया है और जवाब में भी सवाल रामसेवक सिंह पर ही उठा दिया है. 

लिहाजा सवाल यही खड़ा होता है कि जो बात लोकसभा सचिवालय 11 साल बाद कह रहा है, उस समय उसने यह बात क्यों नहीं कही? फिर खुद उसने क्यों नहीं अपने यहां हो रही गड़बड़ी की जांच कराई?

दरअसल, लोकसभा से अपनी बात अनसुनी होने के बाद रामसेवक सिंह निराश हो गए और उन्होंने आगे की लड़ाई लड़ने का मन ही छोड़ दिया. लेकिन उनके बेटे धर्मवीर सिंह ने इसे मुद्दा बना लिया और यूपीए सरकार के दौरान लोकसभा अध्यक्ष रहे सोमनाथ चटर्जी और मीरा कुमार से मुलाकात की और न्याय की मांग की. हालांकि उन्हें ज्यादा उम्मीद नहीं थी. 

रामसेवक सिंह के खिलाफ कार्रवाई भी यूपीए सरकार के दौर में हुई थी. ऐसे में भाजपा सरकार आने के बाद उम्मीद बनी और धर्मवीर ने फरवरी 2015 में लोकसभा अध्यक्ष को एक बार फिर से पत्र लिखा और उसमें उन सभी तथ्यों को शामिल किया जो उन्होंने और उनके पिता रामसेवक सिंह ने लोकसभा सचिवालय के सामने दिए थे.

धर्मवीर सिंह बताते हैं, '12 दिसंबर 2005 को कोबरापोस्ट का ऑपरेशन दुर्योधन रिलीज हुआ था. 13 दिसंबर, 2005 को ही बाबूजी ने लोकसभा सचिवालय को लिखकर बता दिया कि उन्होंने वो सवाल पूछे ही नहीं हैं, जिनके लिए उन्हें बदनाम किया जा रहा है. इतना ही नहीं, उन्होंने सचिवालय को उस साजिश के बारे में भी बताया कि किस तरह उनके फर्जी दस्तखत कर सवाल लोकसभा सचिवालय को भेजे जा रहे हैं. उन्होंने सबूत के तौर पर लोकसभा सचिवालय के उन पत्रों का हवाला भी दिया, जिनमें उनके सवालों पर दस्तखत का मिलान नहीं होने की बात कही गई थी.

धर्मवीर कहते हैं, 'इतना सब करने के बाद भी लोकसभा की जांच कमेटी ने कोई बात नहीं सुनी. मेरे पिताजी को लोकसभा से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. यह हमारे खिलाफ एक बड़ी साजिश थी. बाबूजी ने उसके बाद हार मान ली, पीछे हट गए. लेकिन मैंने सोचा कि सच को तो सामने लाना है. तत्कालीन लोकसभा अध्यक्षों से मिला, लेकिन सभी ने असमर्थता जाहिर कर दी. दरअसल, कार्रवाई यूपीए सरकार के दौरान हुई थी. ऐसे में उस सरकार का लोकसभा अध्यक्ष इस मामले में दखल देने को ही तैयार नहीं था. भाजपा की सरकार आई तो कुछ उम्मीद बनी. मैंने लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन से मुलाकात की, उन्होंने भरोसा दिलाया कि बात सुनी जाएगी. तुरंत फरवरी 2015 में पत्र लिखकर लोकसभा अध्यक्ष को पूरी जानकारी दी.'

कोबरापोस्ट के ऑपरेशन दुर्योधन रिलीज होने के बाद 11 सांसदों को अपनी सदस्यता गंवानी पड़ी थी

लोकसभा सचिवालय ने बाबूजी के नाम पर फर्जी दस्तखत कर छह सवाल पूछने के मामले पकड़े थे. जिसकी जानकारी सचिवालय ने बाबूजी को दी थी, हमने उसकी भी जानकारी दी. लेकिन कुछ नहीं हुआ. सचिवालय की ओर से भी कोई जवाब नहीं आया. आखिर में आरटीआई लगाई. आरटीआई का भी जवाब नहीं मिला तो मुख्य सूचना आयुक्त तक पहुंच गए. चार जुलाई को मुख्य सूचना आयुक्त ने सुनवाई के दौरान लोकसभा सचिवालय को इस मसले पर पूरी जानकारी देने के आदेश दिया.

लोकसभा सचिवालय ने एक अगस्त को अपना जवाब दिया. जिसमें सीधे तौर पर स्वीकार किया कि रामसेवक सिंह ने 13 दिसंबर 2005 को पत्र लिखकर बताया था कि उनके फर्जी दस्तखत से लोकसभा सचिवालय में सवाल भेजे गए हैं. सचिवालय का दावा है कि इसकी जानकारी तत्कालीन जांच कमेटी को दे दी गई थी. पत्र भी जांच कमेटी को भेज दिया गया था. 

सचिवालय ने यह भी माना कि फरवरी 2015 से अब तक रामसेवक सिंह की ओर से चार बात इस मामले में शिकायत की गई है. हालांकि इन पर सचिवालय ने क्या किया, यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है. सबसे बड़ी बात यह है कि सचिवालय ने यह भी माना कि 12 अगस्त 2005 को रामसेवक सिंह को सचिवालय ने छह ऐसे सवाल वापस किए थे, जिन पर उनके दस्तखत का मिलान नहीं हो रहा था. इसकी जानकारी भी जांच कमेटी को दे दी गई थी. 

हालांकि सचिवालय ने यहां एक बात और कही है कि जब फर्जी दस्तखत से रामसेवक सिंह के सवाल आ रहे थे तो वह इसके लिए पुलिस के पास क्यों नहीं गए? इस पर धर्मवीर का कहना है कि सबसे पहले तो यह बड़ी बात है कि लोकसभा सचिवालय में फर्जी दस्तखत से सवाल पहुंचे कैसे? उन्होंने इसे हास्यास्पद बताया कि बाबूजी ने इसकी शिकायत पुलिस से क्यों नहीं की? धर्मवीर का कहना है कि अगर बाबूजी ने इसकी शिकायत नहीं की तो लोकसभा सचिवालय ने खुद संज्ञान लेकर इस पर कार्रवाई क्यों नहीं की? आखिर लोकसभा सचिवालय के भीतर कोई किसी सांसद के फर्जी दस्तखत से सवाल भेज दे और सचिवालय खामोश बना रहे, यह तो खुद में एक बड़ा सवाल है. 

First published: 11 August 2016, 7:33 IST
 
शैलेंद्र तिवारी @catchhindi

लेखक पत्रिका मध्यप्रदेश के स्टेट ब्यूरो चीफ हैं.

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