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षडयंत्र की परिकल्पना और न्यायिक अतिवाद

सौरव दत्ता | Updated on: 22 January 2016, 19:24 IST

अरविंद केजरीवाल पर स्याही फेंकने वाली भावना अरोड़ा की न्यायिक हिरासत हर लिहाज से अस्वीकार्य है. कोई अदालत कानून का राज कायम करने के लिये अपनी आंखों पर पट्टी कैसे बांध सकती है? घटनाओं को उसके व्यापक परिप्रेक्ष्य में न देखकर उसके लोकलुभावन पक्ष पर ध्यान देना कहां तक उचित है? अदालतों को नेताओं के आरोपों पर किस हद तक भरोसा करना चाहिए?

ये कुछ बेहद जरूरी सवाल हैं. इनके उठने के पीछे एक खास वजह है. दिल्ली के एक जिला मजिस्ट्रेट ने कुछ दिनों पूर्व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों पर सीएनजी घोटाले का आरोप लगाने वाली एक असंतुष्ट युवती को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है.

भावना अरोड़ा नाम की लड़की आप से अलग होकर बने धड़े आमआदमी सेना की एक सक्रिय सदस्य है. संभवतः इसी कारण दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने बिना समय गंवाए लड़की पर यह आयोप लगा दिया कि वह केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के खिलाफ किसी गहरे षडयंत्र का हिस्सा हो सकती है.

विरोध का अलोकतांत्रिक तरीका

स्याही फेंकना या फिर किसी के चेहरे को काले रंग से पोत देना कभी भी विरोध का लोकतांत्रिक तरीका न तो रहा है और न ही होना चाहिये. यह ऐसा तरीका है जिसका इस्तेमाल अक्सर शिवसेना जैसे समूह अपनी जोर-जबर्दस्ती थोपने के लिए करते रहे हैं. हाल के दिनों में उन्होंने सुधींद्र कुलकर्णी पर हमला करके इसका प्रदर्शन भी किया था.

लेकिन इस अपराध में जिस तरीके से न्यायालय ने अरोड़ा के खिलाफ प्रतिक्रिया दिखाई है वह क्या वाजिब ठहरायी जा सकती है? हम यहां उस फैसले के औचित्य पर इसलिए सवाल उठा रहे हैं क्योंकि अरोड़ा को जिन धाराओं के तहत आरोपी बनाया गया है (आईपीसी की धारा 186, 353 और 355) वेे सभी धाराएं किसी व्यक्ति का ‘अपमान’ करने और एक लोकसेवक को उसके सरकारी कर्तव्यों के निर्वहन से रोकने संबंधी हैं. उससे भी अहम बात यह है कि ये सभी धाराएं जमानती अपराध की श्रेणी में आती हैं.

मनीष सिसोदिया भूल गए कि पी चिदंबरम पर जूता उछालने वाले जरनैल सिंह आज उनकी पार्टी के विधायक हैं

यह मानने का कोई कारण नहीं है कि भावना अरोड़ा ने अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यों के निर्वहन में कोई बाधा पैदा की थी. अरोड़ा के खिलाफ दर्ज रिपोर्ट से भी यही साबित होता है कि जैसे ही उन्होंने केजरीवाल के ऊपर स्याही फेंकी उसी पल आप कार्यकर्ताओं और पुलिसकर्मियों ने उन्हें वहां से दूर धकेल दिया. खुद केजरीवाल ने भी मंच से यह अपील की कि अरोड़ा के साथ नम्रता से व्यवहार किया जाना चाहिये.

ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है जब अरविंद केजरीवाल या फिर किसी अन्य नेता से सवाल-जवाब किया गया हो. केजरीवाल को तो जनता के बीच थप्पड़ तक मारा गया है, उनके ऊपर चप्पल और अंडे भी फेंके गए हैं. इस तरह की घटनाओं की लंबी श्रृंखला है. तो फिर क्यों ‘स्याही फेंकने’ जैसी छोटी घटना को तिल का ताड़ बनाया जा रहा है?

षड़यंत्र की परिकल्पना और न्यायिक अतिसक्रियता

केजरीवाल के दाहिने हाथ और सबसे विश्वस्त सहयोगी मनीष सिसोदिया जिन्हें अवसर का लाभ उठाने में माहिर माना जाता है, वे यहां भी बिना वक्त गंवाए सामने आए. मौके का फायदा उठाते हुए उन्होंने बयान दिया कि स्याही फेंकने की घटना दरअसल केजरीवाल के खिलाफ के एक गहरी साजिश है और अरोड़ा इस साजिश का एक हिस्सा भर हैं.

यह सब बोलते समय मनीष सिसोदिया भूल गए कि कांग्रेसी नेता और पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम पर जूता उछालने वाले पूर्व पत्रकार जरनैल सिंह आज उनकी पार्टी के टिकट पर विधायक बन चुके हैं.

इन बातों से एक सवाल उठता है कि आम तौर पर कोई भी अपनी बात को साबित करने के लिए सच-झूठ का सहारा ले सकता है लेकिन, क्या अदालतों को इसकी सलाहियत नहीं होनी चाहिए? क्या उसे भी भावनाओं में बह जाना चाहिए?

अदालतें अगर नेताओं की बातों पर विश्वास करना शुरू कर देंगी तो कानून से लोगों का भरोसा उठने का खतरा पैदा हो जाएगा

ऐसा लगता है कि मेट्रोपाॅलिटन मजिस्ट्रेट सुनील कुमार, मनीष सिसोदिया से पूरी तरह इत्तेफाक रखते हैं जिसके मुताबिक केजरीवाल पर स्याही फेंकने के पीछे एक राज्य के निर्वाचित मुखिया के खिलाफ एक बड़ी साजिश है. लेकिन इस तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता.

कानूनी तौर पर देखें तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. नेता अपने हितों की पूर्ति के लिये किसी भी तरह के तर्क गढ़ते रहते हैं. लेकिन अदालतें भी उनकी इन मनगढ़ंत बातों पर विश्वास करना शुरू कर देंगी तो कानून से ही लोगों का भरोसा उठने का खतरा पैदा हो जाएगा.

आरोड़ा के मामले में बिल्कुल यही हुआ है. मजिस्ट्रेट का कहना है कि इस तथ्य की जांच करवाने की आवश्यकता है कि कहीं अरोड़ा के खिलाफ कोई आपराधिक आरोप तो नहीं हैं हालांकि आप इस बारे में कोई ठोस सबूत देने में नाकाम रही है.

हो सकता है कि निचली अदालतों पर अपनी शक्तियों के दुरुपयोग का आरोप लगाना अवमानना की श्रेणी में आए लेकिन इसमें एक हद तक सत्यता के आरोपों से इनकार नहीं किया जा सकता.

इन्हीं वजहों के चलते शायद वह समय आ गया है जब केजरीवाल और अदालतों को लोगों के मन में पैदा हो रही आशंकाओं को दूर करने का प्रयास करना चाहिये?

First published: 22 January 2016, 19:24 IST
 
सौरव दत्ता @SauravDatta29

Saurav Datta works in the fields of media law and criminal justice reform in Mumbai and Delhi.

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