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डी राजा: यह 1964 नहीं है, वाम दलों का एकीकरण अस्तित्व के लिए जरूरी है

मोनोबिना गुप्ता | Updated on: 2 June 2016, 23:16 IST
(प्रकाश सिंह/एएफपी)

वामपंथ की राजनीति देश में अपने सबसे खराब दौर से गुजर रही है. इन हालात में सीपीआई महासचिव और सांसद डी राजा का मानना है कि लेफ्ट को अपनी राजनीति में एक बड़े बदलाव की जरूरत है.

मोनोबिना गुप्ता से बात करते हुए राजा ने कहा कि सीपीआईएम को बाकी लेफ्ट पार्टियों के लिए ज्यादा लचीला रुख अपनाने की जरूरत है. आज 1964 जैसी परिस्थितियां नहीं हैं जिनकी वजह से यूनाइटेड कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन हुआ था, वो अब अस्तित्व में नहीं हैं.

बंगाल में लेफ्ट और कांग्रेस के विफल गठबंधन पर फैल रहे भ्रम पर राजा ने कहा कि लेफ़्ट के लिए बंगाल और केरल का गवर्नेंस मॉडल अलग-अलग है.

लेफ़्ट पार्टियों के लिए अब आगे की रणनीति क्या होगी?

भारतीय दक्षिणपंथ इस समय सत्ता में हैं. असम में जीत के बाद बीजेपी दावा कर रही है कि भारतीय राजनीति अब एकध्रुवीय है, और वो अखिल भारतीय पार्टी है. कांग्रेस और लेफ्ट को खारिज कर दिया गया हैं. 

क्षेत्रीय पार्टियां ख़ुद को संगठित करने में लगी हैं. लेफ्ट के लिए ये बहुत चुनौतीपूर्ण समय है और हमें अपनी राजनीति में बदलाव के लिए ठोस कदम उठाने जरूरत है.

ठोस कदम से आपका क्या अर्थ है?

लेफ़्ट पार्टियों को संगठित होने की ज़रूरत है. पहले भी राष्ट्रीय स्तर पर चारों लेफ़्ट पार्टियों का समन्वय हो चुका है. बाद में सीपीआई (एमएल) और सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर भी इस गठबंधन का हिस्सा रह चुकी है. 

लेकिन इसी वक्त रेवोलुशनरी सोशलिस्ट पार्टी में विभाजन के बाद केरल में फॉरवर्ड ब्लॉक ने लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट से दूरी बढ़ा ली थी.

क्या आपका संकेत सीपीआई और सीपीआईएम के विलय की ओर है?

हमें दोनों पार्टियों के बीच रिश्ते को समझना चाहिए, क्योंकि हमारा रिश्ता बेहद खास है. हम एक ही पार्टी थे जो बाद में अलग हुए. जिन कारणों से ये अलगाव हुआ वो कारण अब अस्तित्व में ही नहीं हैं तो फिर अलग रहने की क्या जरूरत है. 

कामरेड सुरजीत (हरकिशन सिंह सुरजीत) दोनों पार्टियों के बीच कार्यक्रम आधारित मतभेदों की बात करते थे. मैं अक्सर पूछता था कि वो मतभेद क्या हैं. अब कामरेड प्रकाश करात उन कार्यक्रम आधारित मतभेदों की बात करते हैं.

वौ कौन से मुद्दे हैं जिनकी बात कामरेड सुरजीत या करात कर रहे हैं?

वही तो मुझे आश्चर्य है, सीपीआईएम को इन मुद्दों को सामने रखकर इन पर बात करनी चाहिए. दोनों पार्टियां लेफ्ट एकता की बात करती हैं लेकिन...

क्या आपको लगता है कि माकपा को और लचीला रुख़ अपनाने की ज़रूरत है?

माकपा को और भी ज़्यादा समायोजन वाला और लचीला रुख़ अपनाने की ज़रूरत है. उसे बाकी लेफ्ट पार्टियों की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाना चाहिए. 

अगर ये एकता मज़बूत होती है तो हम आगे उन क्षेत्रीय पार्टियों से अपनी निकटता बढ़ा सकते हैं जो लेफ्ट और राइट के बीच फंसे हुए हैं. हमारी स्थिति इतनी प्रभावी होनी चाहिए कि हम उनको राइट विंग की तरफ झुकने से रोक सकें.

आपके हिसाब से बंगाल की चुनावी रणनीति में कहां कमी रह गयी?

इसकी चर्चा हम राष्ट्रीय और राज्य कार्यकारणी की बैठक में करेंगे. मायने ये नहीं रखता कि माकपा और कांग्रेस के बीच क्या छुपा या खुला समझौता हुआ, मायने ये रखता है कि जनता ये चाहती थी कि हम साथ आएं ताकि तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से हटा सकें.

इसके विफ़ल होने के क्या कारण हो सकते हैं?

सीपीमएम नेताओं में बहुत असमंजस था और ये संदेश जनता तक भी गया. कामरेड बिमान बोस (लेफ़्ट फ्रंट के चेयरपर्सन) ने कांग्रेस के साथ गठबंधन के लिए मना किया था, तब सूर्य कान्त मिश्रा (सीपीएम स्टेट सेक्रेटरी) ने इसको जारी रखने का सुझाव दिया था. 

वहीं, कामरेड बुद्धदेव, राहुल गांधी के साथ मंच साझा कर रहे थे . कहीं कोई एकता दिखती थी इन सब नेताओं में .

क्या आपको लगता है कि लेफ्ट को कांग्रेस के साथ गठबंधन न करते हुए विपक्ष का मोर्चा संभालना चाहिए था?

जो मुझे समझ आता है वो ये है कि तृणमूल कांग्रेस के शासन में हिंसा का स्तर बहुत बढ़ा है. हमारे सामने सीपीएम कामरेड्स की हत्या के उदाहरण हैं जिसने काफ़ी डर का माहौल पैदा कर दिया था. 

इस हिंसा के माहौल को खत्म करने के लिए पार्टी ने उतावलेपन में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था . लोकतंत्र में हमें जनता की इच्छा के अनुसार चलना होता है और इस बार जनता लेफ़्ट के समर्थन में नहीं थी.

आज के संदर्भ को देखते हुए क्या आपको लगता है कि सीपीएम सत्ता से बाहर नहीं रहना चाहती?

मुद्दा सिर्फ सत्ता में आने का नहीं है. जो बात मायने रखती है वो है एक के बाद एक हो रही कामरेड्स की हत्या. तो मेरे विचार में ये डर बड़ा मसला था, न कि सत्ता में आना.

लेकिन बंगाल की जनता के बीच ये आम धारणा है कि तृणमूल कांग्रेस गुटों में आपसी हिंसा है ना कि लेफ्ट के खिलाफ?

हिंसा को एकमात्र मुद्दा न बनाते हुए, लेफ़्ट द्वारा विपक्ष का अपना रोल, जनता की समस्याओं को उजागर करके काफ़ी प्रभावशाली तरीक़े से निभाया जाता तो अच्छा होता. जनता को उसकी ज़रूरतों और मुद्दों के लिए संगठित करके इस हिंसा को रोका जा सकता था.

केरल और बंगाल में लेफ़्ट पार्टी ने सरकार अलग-अलग रास्ते से चलाई है. आप इस फर्क को कैसे देखते हैं?

बंगाल में लेफ़्ट की सरकार ने भूमि सुधार और पंचायती राज लागू करवाया था. खेती की पैदावार और घरेलू उत्पादों की खपत बढ़ाई. इसके साथ ही लेफ़्ट के सत्ता में रहते हुए, कृषि उत्पाद और घरेलू उपभोग की दरों में इज़ाफ़ा हुआ. 

लेकिन लेफ्ट को शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दों पर भी ध्यान देना चाहिए था, जनता को बेहतर सुविधा चाहिए . लेफ़्ट इन क्षेत्रों में बहुत कुछ अच्छा कर सकता था.

वहीं दूसरी तरफ केरल में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट ने कृषि के साथ-साथ शिक्षा और स्वास्थ पर बराबर ध्यान दिया. पार्टी द्वारा कोऑपरेटिव हेल्थ और इकनोमिक सेक्टर के रूप में अपनाया गया कोऑपरेटिव गवर्नेंस का प्रयोग भी काफ़ी सफ़ल रहा. आज केरल के सबसे अच्छे अस्पताल कोऑपरेटिव के द्वारा संचालित किये जाते हैं.

क्या केरल में लेफ़्ट एक सफल वैकल्पिक इकॉनॉमिक मॉडल बना पाया है?

बिल्कुल... और हम जानते हैं कि वैकल्पिक मॉडल को सिर्फ सिद्धांत रूप में नहीं बल्कि प्रयोग में लाना पड़ता है. मुझे संदेह है कि बंगाल में इस तरह का कोई वैकल्पिक मॉडल सुचारु रूप से चलाने में लेफ़्ट पार्टियां सफ़ल रही हैं.

लेफ़्ट ने काफ़ी वक़्त तक बंगाल में अपना शासन कायम रखा. इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?

जी बिल्कुल... उन्होंने बंगाल में 34 वर्ष राज किया, वो भी मजबूत विपक्ष के होते हुए. मुझे लगता है कि सीपीएम को आत्मविश्लेषण करने की ज़रूरत है. उनको इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि केरल में बंगाल के इतने प्रवासी मज़दूर क्यों काम कर रहे हैं? 

साथ ही इस सवाल का जवाब भी कि बंगाल से इतनी बड़ी संख्या में लड़कियों की अवैध तस्करी पर रोक क्यों नहीं लगी? मैं इस बात को मानता हूं कि हम बंगाल में एक मजबूत और कारगर गवर्नेंस मॉडल बनाने में नाकाम रहे हैं.

First published: 2 June 2016, 23:16 IST
 
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