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मोदी के ढाई साल और भारतीय मुसलमान

आदित्य मेनन | Updated on: 11 February 2017, 5:45 IST
QUICK PILL
  • नरेंद्र मोदी ने जब प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली थी, तभी मुसलमानों  को लग गया था कि अगले कुछ साल देश में उसके लिए मुश्किल भरे हैं. 
  • मोदी के ढाई साल के कार्यकाल में देशभर में धार्मिक घृणा के कई वीभत्स मामले हुए हैं जिससे मुसलमानों की आशंका सही साबित हुई है. 
  •  अगले कुछ साल मुसलमानों के लिए फिर परेशानी पैदा करने वाले हैं क्योंकि उत्तर प्रदेश में चुनाव होने हैं और दो साल आम चुनाव की \'तैयारी\' भी शुरू हो जाएगी.  

16 मई 2014 को आम चुनावों के नतीजे आए थे और दिन था जुमा (शुक्रवार). दोपहर तक यह साफ़ हो गया था कि नरेंद्र मोदी और भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए ने भारी बहुमत से जीत हासिल कर ली है.

उस वक़्त दिल्ली के प्रेसिंडेंट एस्टेट में मौजूद छोटी-सी मस्जिद में लोग जुमे की नमाज़ के लिए इकट्ठा हो रहे थे. माहौल में बेचैन करने वाली ख़ामोशी थी. नमाज़ के पहले या बाद में किसी ने भी चुनावी नतीजों पर खुले मन से बात नहीं की. नमाज़ के बाद इमाम ने दुआ मांगी, 'या अल्लाह, हमारे मुल्क़-ओ-मिल्लत में अमन और भाईचारा फरमा.' मस्जिद में जमा लोग फिक्र में डूबे थे और शायद देश के 17 करोड़ मुसलमान भी उस दिन यही बेचैनी महसूस कर रहे थे.

मुसलमान इसलिए नहीं परेशान थे कि अब अगले ही दिन देश में दंगे शुरू हो जाएंगे. उन्हें डर यह था कि मोदी के उभार से मुसलमानों पर जानबूझकर हमले किए जाएंगे और यह डर अभी भी बना हुआ है. मगर 16 मई 2014 को बहुत सारे मुसलमानों ने महसूस किया कि हिन्दुस्तान बदल गया है. यह भी कि इस मुल्क़ में अब हम उस तरह के नागरिक नहीं रहे, जैसे पहले हुआ करते थे.

पहली बार यह हुआ कि मुसलिम राजनीति की धुरी माने जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश से एक भी मुसलमान सांसद नहीं बना

उस दिन मुसलमानों में बेचैनी सिर्फ़ इसलिए नहीं थी कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री की कुर्सी की तरफ बढ़ रहे हैं या भाजपा इतने बड़े अंतर से जीती है. वो परेशान इसलिए भी थे कि नरेंद्र मोदी के कुछ ख़ास समर्थकों ने उन्हें सिर्फ़ इसलिए वोट दिया क्योंकि उनकी हुक़ूमत में तकरीबन 2000 मुसलमानों का क़त्ले आम किया गया था.

परेशानी की वजह यह भी थी कि 'सेकुलर' पार्टियां आम चुनाव में बुरी तरह हार गई थीं. साफ़ शब्दों में कहा जाए तो अभी तक मुसलमान अपनी सुरक्षा के लिए 'बुरे हिंदू' की बजाय 'अच्छे हिंदू' को चुनता था. इसकी राजनीतिक व्याख्या यह है कि मुसलमान भाजपा की बजाय कांग्रेस, जाति आधारित पार्टियां समाजवादी और राष्ट्रीय जनता दल को वोट देता था लेकिन इस चुनाव में उसका भी कोई मतलब नहीं रह गया.

पहली बार इतिहास में यह हुआ कि अल्पसंख्यकों की राजनीति की धुरी माने जाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश से एक भी मुसलमान सांसद नहीं हो सका.

वतनपरस्ती पर सवाल

बेशक मोदी का आधा कार्यकाल निकल चुका है और देश में कोई भीषण दंगा नहीं हुआ लेकिन ऐसा करने की कोशिशें कई बार हो चुकी हैं. बार-बार भाजपा के नेता और भगवाधारी कहते हैं कि अब ये मुसलमानों वाला देश नहीं है.

इन्होंने अभियान चलाकर मुस्लिम नाम वाली हस्तियों पर हमला किया है. उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी, सानिया मिर्ज़ा, शाहरूख़ ख़ान, आमिर ख़ान की देशभक्ति पर सवाल उठाया है. हमला सिर्फ़ दक्षिणपंथी ट्रॉल्स ने नहीं किया है, बल्कि इसमें भाजपा के नेता और कई बार मंत्री भी शामिल हुए हैं.

अगर पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम जैसे मुसलमान की तारीफ़ की जा रही है, तो भाजपा के एक मंत्री यह जोड़ना नहीं भूलते कि 'मुसलमान होने के बावजूद' वह एक सच्चे राष्ट्रवादी थे. ऐसे बयानों का मतलब स्पष्ट होता है कि फर्क़ नहीं पड़ता आपने अपने क्षेत्र में कितना नाम कमाया है. अगर आप मुसलमान हैं तो आपकी देशभक्ति सवालों के घेरे में रहेगी. चाहे आप भारत के उप राष्ट्रपति ही क्यों ना हों.

महाराष्ट्र में भाजपा की सहयोगी पार्टी शिवसेना के प्रवक्ता संजय राऊत ने यहां तक कहा कि मुसलमानों का वोट देने का अधिकार छीन लेना चाहिए ताकि देश में 'वोट बैंक की पॉलिटिक्स को ख़त्म किया जा सके.'

हिंदू महासभा की अध्यक्ष साध्वी देवा ठाकुर ने एक अनोखा सुझाव दिया कि मोदी को देश में आपातकाल की घोषणा करके मुसलमानों और ईसाइयों की जबरन नसबंदी करवानी चाहिए ताकि उनकी आबादी रोकी जा सके.

इसी तरह योगी आदित्यनाथ के समर्थक ने मंच से खुलेआम कहा कि मुसलमान औरतों को कब्र से निकालकर बलात्कार करना चाहिए. मुसलमानों के खिलाफ़ इस तरह के नफ़रत भरे बयान कभी बंद नहीं हुए.

आसान शिकार

देखा जाए तो पिछले 30 महीने मुसलमानों के लिए दिल तोड़ने वाले रहे हैं. मुहम्मद अख़लाक़ को बीफ खाने की अफ़वाह फ़ैलाने के बाद पीट-पीटकर मार डाला गया और मौत के बाद भी उनपर मुक़दमा दर्ज किया गया. दूसरी तरफ़ अख़लाक़ की हत्या में शामिल एक कथित हत्यारे का अंतिम संस्कार हीरो की तरह किया गया. उनकी लाश तिरंगे में लपेटी गई और भाजपा के केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचे.

मार्च में गौरक्षकों ने झारखंड के लातेहर में एक मुसलमान मज़लूम अंसारी और उनके 12 साल के बेटे इम्तियाज़ अंसारी को मारकर पेड़ से लटका दिया. महेश शर्मा की श्रद्धांजलि की तरह आरएसएस ने भी गौरक्षकों का गुणगान किया.

इस तरह की वारदात और फिर आरएसएस भाजपा की शह से मुसलमान सिकुड़ते चले गए हैं. प्रधानमंत्री ना सिर्फ़ इनपर चुप्पी साधे हुए हैं बल्कि जिस तरह गुजरात दंगों के बावजूद वह आगे बढ़े हैं, दूसरे नेता भी इसी फॉर्मूले को अपनाकर भाजपा में आगे बढ़ने में लगे हुए हैं. मुसलमान आसान शिकार हो गए हैं. कोई भी नेता उन्हें भला बुरा कहकर निकल जा रहा है क्योंकि ऐसा करने से उनके करियर का ग्राफ़ बढ़ेगा.

नाउम्मीदी के बीच उम्मीद

इन हमलों का असर यह है कि मुसलमानों में राजनीतिक चेतना आई है. पढ़े-लिखे मुसलमान सोशल मीडिया पर अपने राजनीतिक विचार रख रहे हैं. वो मोदी सरकार की कारगुज़ारियों का विरोध कर रहे हैं. वो इंसाफ़ और बराबरी की मांग उठा रहे हैं और हिंदुत्ववादी ट्रॉल्स के ख़िलाफ खड़े हो रहे हैं.

मुसलमानों में आई इस जागरूकता की वजह से मोदी सरकार ने उनके बीच दरार पैदा करने की कोशिश की लेकिन ऐसा हुआ नहीं. सरकार ने देवबंदी और सलफ़ी विचारधारा वाले मुसलमानों के खिलाफ सूफी मुस्लिमों को संरक्षण देने का ढोंग रचा. तीन तलाक जैसे मुद्दे को उठाकर मुस्लिम औरतों और पुरुषों के बीच भी गहरा गड्ढा खोदने की कोशिश की गई जिसमें थोड़ी बहुत कामयाबी भी मिली.

दूसरा महत्वपूर्ण ट्रेंड भी देखने को मिल रहा है जिसमें सताए गए दलित और मुसलमान एकजुट होते नज़र आते दिख रहे हैं. इसी साल की शुरुआत में गुजरात के उना में दलितों की पिटाई के बाद उनके आंदोलन में मुसलमानों ने भी हिस्सा लिया.

मुसलमानों के एक वर्ग ने महाराष्ट्र में मराठा समाज के साथ भी अपनी एकजुटता दिखाई है जो पिछले कई महीने से आरक्षण की मांग लेकर सड़कों पर हैं. महाराष्ट्र में मुस्लिम भी आरक्षण के लिए आवाज़ उठा रहे हैं. इस तरह की कोशिशें इस मायने में अहम हैं कि दूसरे समुदायों से मुसलमानों को अलग-थलग करने की साज़िशें कमज़ोर होंगी.

ओवैसी का उदय और आप

पिछले ढाई सालों में राजनीतिक विकल्प भी उभरकर आए हैं. दो राजनीतिक शक्तियां ख़ासतौर पर आगे बढ़ी हैं. एक असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-एत्तेहादुल मुस्लिमीन है और दूसरी आम आदमी पार्टी. पिछले 50 साल में ओवैसी भारत में एक मात्र मुस्लिम नेता के रूप में उभरे हैं. वह अपनी बात साफगोई से रखते हैं. सपा नेता आजम खान और जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुख़ारी के साथ ही जनता से दूर हो चुके सलमान खुर्शीद के मुकाबले वह नए तरह का बदलाव ला रहे हैं.

मुसलमान नौजवानों को ओवैसी का यह अंदाज़ बेहद पसंद आ रहा है कि तमाम बड़े मुद्दों पर वह कितने सधे और तार्किक अंदाज़ में अपनी बात रखते हैं. चाहे वह इस्लामिक स्टेट का तीखा विरोध हो या फिर भारत माता की काल्पनिक छवि के बरक्स राष्ट्रवाद पर उनके विचार.

आम आदमी पार्टी की भी लोकप्रियता मुसलमानों में बढ़ी है, हालांकि वजह दूसरी है. अरविन्द केजरीवाल को मुसलमानों का एक धड़ा इसलिए पसंद करता है क्योंकि वह मोदी की तीखी आलोचना करते हैं. बहुत सारे भाजपा विरोधी, मुस्लिम, गैर मुस्लिम यह कहते हुए नज़र आते हैं कि नरेंद्र मोदी को सिर्फ केजरीवाल टक्कर दे सकते हैं.

ये दोनों पार्टियों राष्ट्रीय राजनीति के फलक़ पर ढंग से तभी आ सकती हैं जब मुख्यधारा की सेकुलर पार्टियां पूरी तरह फेल हो जाएं. बिहार में महागठबंधन की जीत से ऐसा लगता है कि सेकुलर पार्टियों में भाजपा को हराने का दम-खम अभी बाकी है. हालांकि यह समीकरण भी पलट जाएगा अगर भाजपा उत्तर प्रदेश में जीत गई तो.

चुनौती

अगले ढाई साल मुसलमानों के लिए बेहद कठिन हैं. जैसे-जैसे चुनाव होंगे, सांप्रदायिकता बढ़ती जाएगी. भाजपा उत्तर प्रदेश चुनाव के मद्देनज़र अपनी सांप्रदायिक रणनीति की मंशा पहले ही साफ़ कर चुकी है. मुसलमानों की सबसे बड़ी चुनौती फिलहाल अपने लिए रास्ता निकलना है. बार-बार होने वाले हमलों और भाजपा के बीच से.
First published: 3 December 2016, 8:22 IST
 
आदित्य मेनन @adiytamenon22

एसोसिएट एडिटर, कैच न्यूज़. इंडिया टुडे ग्रुप के लिए पाँच सालों तक राजनीति और पब्लिक पॉलिसी कवर करते रहे.

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