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अमित शाह के दो सालः शाह की शाहंशाही में भाजपा में आए 7 बड़े बदलाव

चारू कार्तिकेय | Updated on: 10 August 2016, 7:33 IST
(सज्जाद हुसैन/एएफपी)

अमित शाह के 9 जुलाई 2014 को भारतीय जनता पार्टी का 13वां अध्यक्ष बनने की घोषणा के बाद से पार्टी के भीतर बहुत कुछ बदल चुका है. 9 अगस्त यानी आज पार्टी उनकी अध्यक्षता के दो साल का जश्न मना रही है. इसी दिन 2014 को पार्टी ने आधिकारिक रूप से उनके 'चयन' को मुहर लगाई थी. इन दो वर्षों में गुजरात के नारायनपुरा के इस विधायक ने अपनी पार्टी को न केवल अभूतपूर्व बल्कि इसके मूल स्वरूप में चर्चा करने लायक बदलाव कर दिए.

इतना तो तय है कि शाह के योगदान का आभार पार्टी के सबसे बड़े नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी जताते हैं. भाजपा में शाह का उदय मोदी के समानांतर ही रहा और उन्हें पार्टी की रणनीति तय करने वाला चाणक्य और मोदी का सबसे खास भी माना जाता है. फिलहाल शाह का भाजपा के मुखिया के रूप में दूसरा कार्यकाल चल रहा है. 2014 में उन्होंने यह पद उस वक्त हासिल किया था जब राजनाथ सिंह के केंद्रीय गृहमंत्री बनने के बाद यह रिक्त हो गया था.

भारतीय राजनीति के इतिहास में अमित शाह एक अद्भुत व्यक्तित्व हैं और उनकी विरासत को सबसे चतुर राजनीतिक रणनीतिकार के साथ ही बेहद विवादास्पद चरित्र वाले व्यक्ति के साथ भी जोड़ा जाएगा. जानिए वो सात बातें जिनके लिए अमित शाह का कार्यकाल सर्वाधिक याद किया जाएगा.

1. भारी चुनावी जीत

शाह के नेतृत्व में भाजपा ने कई विधानसभा चुनाव जीते और कुछेक गठबंधन के रूप में ही सही पांच राज्यों में सरकार का गठन किया. इन राज्यों में हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड, असम और जम्मू-कश्मीर भी शामिल हैं. इन पांच में से हरियाणा, असम और जम्मू-कश्मीर जैसे तीन राज्यों में भाजपा पहली बार सत्ता में आई.

2. भारी हार

इन जीतों के जश्न को दिल्ली, बिहार और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में मिली भारी हार ने कम कर दिया. इनमें से भी दिल्ली और बिहार भाजपा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण राज्य थे क्योंकि 2014 लोकसभा चुनाव में पार्टी ने इन राज्यों में बेहतरीन प्रदर्शन किया था. इनमें भाजपा को शिकस्त देने वाली पार्टियों के मुख्यमंत्री यानी दिल्ली में आप के अरविंद केजरीवाल और बिहार में जेडीयू के नीतीश कुमार अब भाजपा के सबसे मुखर विरोधी बने हुए हैं.

3. दक्षिण भारत में नाममात्र का प्रभाव

शाह ने तमिलनाडु के साथ ही केरल में भी विधानसभा चुनाव में पार्टी के प्रचार अभियान का नेतृत्व किया. यद्यपि पार्टी ने पहली बार केरल विधानसभा चुनाव में अपना खाता खोलने में सफलता पाई, लेकिन इसे केवल एक ही सीट से संतोष करना पड़ा. तमिलनाडु में पार्टी ने 168 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी.

4. अपने क्षेत्र में भी फिसली

एक तरफ शाह ने पार्टी के तेजी से फैलते क्षेत्र में कई नए राज्यों को शामिल किया तो दूसरी तरफ उनके और मोदी के गृह राज्य गुजरात में पार्टी की पकड़ कमजोर होती दिखी. इस दौरान कम से कम दो भारी प्रदर्शनों ने राज्य और भाजपा सरकार को हिला दिया. अंत में मोदी की विश्वासपात्र मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को इस्तीफा देना पड़ा. कहा जाता है कि राज्य को अकेले अपने नियंत्रण में लेने के फेर में शाह ने पटेल का जीवन मुश्किल कर दिया था.

हालांकि उनकी गणना धराशायी हो गई और तमाम लोगों का कहना है कि अगर गुजरात में अभी चुनाव करा लिए जाएं तो भाजपा के अच्छे प्रदर्शन की कोई संभावना नहीं है.

5. पार्टी का आकार बढ़ा

शाह ने सावधानीपूर्वक एक विशाल सदस्यता अभियान चलाया और करीब 11 करोड़ सदस्यों के बल पर पार्टी अब दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक दल होने का दावा करती है. 2014 चुनाव के पहले और बाद में पार्टी की लोकप्रियता में जबर्दस्त उछाल आया और लोकसभा के बाद हुए विधानसभा चुनाव में इसके खाते में आई सीटों में भी यह दिखा. लेकिन मुख्यरूप से विपक्षी कांग्रेस पार्टी द्वारा सदस्यता के इन आंकड़ों को आंकड़ों की कारीगरी बताया जा रहा है.

6. लेकिन पार्टी का केंद्रीकरण भी हुआ

आज भाजपा के अधिकांश पर्यवेक्षकों की राय है कि अब पार्टी में फैसला लेने वालों का बिल्कुल केंद्रीकरण हो चुका है. कहा जाता है कि अब सभी प्रमुख फैसले मोदी-शाह द्वारा लिए जाते हैं और अन्य सभी नेता, भले ही उनका पार्टी या सरकार में वे किसी भी कद के हों, फैसले की घोषणा तक अंधेरे में ही रहते हैं.

पार्टी के संसदीय बोर्ड की बैठक में की जाने वाली बैठने की व्यवस्था इस संदर्भ में पूरी तस्वीर साफ करती है. इसमें मोदी और शाह सबसे आगे बैठे होते हैं और सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह और वेंकैया नायडू जैसे अन्य वरिष्ठ नेता इनके साथ की कतार में बैठे होते हैं.

7. पार्टी में भी होने लगा टकराव

एक इकाई के रूप में आज की भाजपा सबसे ज्यादा अंदरूनी टकराव और अंतरविरोधों से भरी नजर आती है. अगर इसकी तुलना पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पहली बार बनी भाजपा की सरकार से करें तो आज यह ज्यादा विरोधाभासी और आक्रामक है. पार्टी कार्यकर्ता, नेता और यहां तक की मंत्री भी अपने राजनैतिक विरोधियों से बातचीत में बेहद उग्र तेवरों का प्रदर्शन करते हैं. यह उग्रता न केवल संसद भवन में विपक्षी नेताओं के साथ बातचीत में नजर आती है बल्कि तमाम प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों के साथ भी उनका यही रवैया दिखता है. 

इन स्थितियों के मद्देनजर यह जानना दिलचस्प है कि हाल ही में अमित शाह ने खुद भी कहा था कि वो देश में 67 सालों से चली आ रही राजनीतिक संस्कृति को बदलना चाहते हैं, इस लिहाज से यह पार्टी की सोची समझी रणनीति का एक हिस्सा प्रतीत होता है.

First published: 10 August 2016, 7:33 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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