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नरेंद्र मोदी: दो साल से मीडिया से दो हाथ की दूरी

संदीप भूषण | Updated on: 26 May 2016, 23:15 IST
(कैच)

मुझे केंद्र में मोदी सरकार के दो वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित होने वाले समारोहों के संबंध में देश के दो अग्रणी मीडिया समूहों - इंडिया टुडे और एनडीटीवी में दिखाई गई हालिया रिपोर्ट से आगे जाने की जरूरत नहीं है.

जहां एक तरफ इंडिया टुडे की खबरों में चुनावों के मुहाने पर खड़े उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में 26 मई, केंद्र में सरकार गठन के दो वर्ष पूर्ण होने की वर्षगांठ के मौके, को लेकर कोई खबर ही नहीं है जबकि यह खबर एनडीटीवी की प्रमुख खबरों में से एक है. हालांकि एनडीटीवी की खबर में मोदी के सहारनपुर में रैली को संबोधित करने को लेकर अनिश्चितता दिखाई गई है.

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समाचार मूल्यों के लिहाज से यह यह शायद ही एक विशेष जानकारी है. इसके बावजूद इस खबर को ‘‘सूत्रों’’ के हवाले से लिखा गया है. बीजेपी का एक भी नेता रिकॉर्ड पर आने को तैयार नहीं है.

मीडिया के लिये, विशेष रूप से बीट संवाददाता के लिये यही समस्या की मुख्य जड़ है. प्रधानमंत्री से जुड़ी तमाम जानकारी सिर्फ प्रधानमंत्री द्वारा विशेष रूप से साउथ ब्लॉक स्थित तकनीकी विशेषज्ञों की एक टीम की मदद से ट्वीट की जाती है.

ट्विटर से देते हैं खबर

प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने केवल दो बार पत्रकारों से सार्वजनिक रूप से बात की है

बात चाहे मोदी की औचक पाकिस्तान यात्रा की हो या फिर एक वर्ष पहले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ मुलाकात की या फिर सत्ता में आने के दो वर्ष पूर्ण होने को लेकर हाल ही में रिलीज किये गए एक गाने की, पीएम द्वारा स्वयं ट्वीट किए जाने से पहले किसी को भी इसकी भनक तक नहीं थी. 

यहां तक कि उनके सबसे ताकतवर मंत्री अरुण जेटली को भी नहीं. 17 मिलियन ट्विटर फॉलोवर्स के साथ प्रधामंत्री मोदी ने पीएमओ के लिये विशेष बीट संवाददाता की आवश्यकता को ही लगभग समाप्त कर दिया है.

ट्विटर ने प्रधानमंत्री को जानकारी देने के समय और यहां तक कि उसे देने के लिये चुने जाने वाले शब्दों तक का चयन करने की सहूलियत दे दी है और वह भी एक परेशान करने वाले जवाबी सवाल पूछने वाले पत्रकारों से भी दूर रखता है.

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वे अबतक सिर्फ दो ही बार मीडिया से रूबरू हुए हैं - पहली बार 2014 में दीपावली के समय और दूसरी बार वित्त मंत्री अरुण जेटली के घर पर जब उन्होंने दिल्ली मीडिया कॉर्प की मेजबानी की थी.

जैसा कि बीते दो दशकों से बीजेपी को रिपोर्ट करने वाले एक दिग्गज पत्रकार नाम न छापनेकी शर्त पर मुझे बताते हैं, ‘‘पीएमओ के पास संजय बारू या एचके दुआ जैसा कोई मीडिया एडवाइजर नहीं है. इसके स्थान पर पीएमओ में मीडिया को जानकारी देने वाले इकलौते व्यक्ति जगदीश ठक्कर को जनसंपर्क अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया है. बहरहाल पहले तो वे उपलब्ध ही नहीं होते हैं और कम से कम 10 से 20 मैसेज भेजने या फिर कई बार फोन करने के बाद ही उनकी तरफ से कोई जवाब आता है.’’

वे आगे बताते हैं, ‘‘ठक्कर के खुद के पास ही अधिक जानकारी नहीं होती है. आखिर उन्हें पता कैसे रहेगा जब वरिष्ठ मंत्रियों तक को प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों के बारे में कुछ पता नहीं होता है.’’

शाह भी मोदी की राह पर

एक प्रमुख समाचार चैनल से जुड़े बीजेपी के एक और बीट रिपोर्टर कहते हैं कि बिहार में पार्टी की हार के बाद स्थितियों में बदलाव के कुछ संकेत मिले थे. 

वास्तव में उस वक्त तो पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने बीट रिपोर्टरों से यहां तक कहा था कि भविष्य में वे महीने में कम से कम एक बार दिल्ली की मीडिया से जरूर रूबरू हुआ करेंगे. लेकिन कुछ महीनों बाद उन्होंने भी ऐसा करना बंद कर दिया. 

यह संवाददाता शिकायती लहजे में कहता है, ‘‘वास्तव में शाह से मुलाकात के लिये समय पाना लगभग असंभव है. अधिकांश मौकों पर वह आपसे अनौपचारिक रूप से बात कर सकते हैं. रिकार्ड पर कुछ भी नहीं.’’ 

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शायद यही मोदी की शैली है. हमेशा हमलावर रहने वाले खोजी पत्रकारों से अब दूरी बनाई जा रही है. पटियाला हाउस कोर्ट में कुछ बीजेपी समर्थक कुछ गुंडे वकीलों ने पत्रकारों पर हमला किया तब पार्टी ने इसकी औपचारिक निंदा तक नहीं की. 

सिर्फ अरुण जेटली ने निंदा का बयान दिया जबकि एक और मंत्री रविशंकर प्रसाद पहले ही जेएनयू परिसर से उठने वाली ‘‘वैकल्पिक आवाजों को सुनने’’ की बात कह चुके थे. 

एक तरफ जहां जी-टीवी जैसे चैनलों को छेड़छाड़ किये हुए वीडियो चलाने की आजादी दी मिली हुई थी वहीं दूसरी तरफ जेएनयू कार्रवाई को कवर करने वाले पत्रकारों के धर पर पुलिस ने आधी रात को भी दस्तक देने में देर नहीं की.

माओवाद से जबर्दस्त तरीके से प्रभावित छत्तीसगढ़ में भारी पुलिस बल की तैनाती के बीच खबरों को जुटाने वाले कई पत्रकार स्थानीय प्रशासन के हाथों उत्पीड़ित होने के बाद क्षेत्र छोड़ने के लिये मजबूर हो चुके हैं. और इसके कई उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं.

पसंदीदा चैनल पर मेहरबानी

वर्तमान समय में मीडिया घरानों के राजनीतिक पक्षपात के चलते मीडिया का भी ध्रुवीकरण हो चुका है. जी-न्यूज, जिसके मालिक सुभाष चंद्रा खुलकर आरएसएस के प्रति अपनी निष्ठा और जुड़ाव को स्वीकारते हैं, को सरकार के साथ अपनी निकटता के लिये जाना जाता है.

इसके संपादक सुधीर चौधरी वह इकलौते पत्रकार हैं जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ट्विटर पर फॉलो करते हैं. 

अंग्रेजी समाचारों की दुनिया के अग्रणी टाइम्स नाऊ की बहसों में नियमित रूप से भाग लेने वाले मेहमान हरतोष सिंह बल ने चैनल पर डीडीसीए मामले में अरुण जेटली पर हमला न करने के लिए दबाव डालने का आरोप लगया है.

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ऐसा करने से मना करने पर हरतोष को कार्यक्रम में भाग नहीं लेने दिया गया. इसके बाद से उन्हें टाइम्स नाऊ पर नहीं देखा गया है.

पार्टी ने एनडीटीवी और एबीपी न्यूज जैसे झुकने से मना करने वाले चैनलों का बहिष्कार कर रखा है. इन दिनों इन दोनों ही समाचार नेटवर्कों पर शायद ही बीजेपी का कोई प्रवक्ता देखने को मिलता हो.

सोशल मीडिया ट्रॉल

बीजेपी के शस्त्रागार में सबसे खतरनाक हथियार हैं उसके सोशल मिडिया के ट्रॉल

बीजेपी के शस्त्रागार में सबसे खतरनाक हथियार हैं उसके सोशल मिडिया के ट्रॉल. एक तरफ जहां बीजेपी उन्हें अपना मानने से मना करती आई है, वहीं विरोधियों का आरोप है कि पार्टी उन्हें भुगतान करती है. इनमें से कुछ को तो पीएम मोदी तक स्वयं ट्विटर पर फॉलो करते हैं.

कुछ दिन पूर्व ही बीजेपी के आईटी प्रकोष्ठ के अरविंद गुप्ता और वरिष्ठ पत्रकार सागरिका घोष के बीच तल्ख बहस देखने को मिली.

घोष का आरोप था कि बीजेपी इन ट्रॉल्स को भुगतान करती है जबकि गुप्ता ने उनपर ही आरोप लगाते हुए कहा कि मुख्यधारा की मीडिया बीजेपी विरोधियों की तनख्वाह पर पल रही है.

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बीजेपी में जिम्मेदार पदों पर बैठे पदाधिकारियों द्वारा पत्रकारों के साथ इस प्रकार के व्यवहार के मामले पहले देखने और सुनने को नहीं मिलते थे.

हाल के दिनों में रवीश कुमार और यहां तक कि राजदीप सरदेसाई जैसे वरिष्ठ एंकर विभिन्न सोशल मीडिया मंचों पर ट्रॉल द्वारा किये जा रहे विषवमन और फैलाये जा रहे द्वेष के चलते कुछ समय के लिये ट्विटर को अलविदा कह दिया. 

महिला पत्रकारों के लिए तो स्थिति और भी गंभीर है. हाल के दिनों में नीता कोल्हटकर और बरखा दत्त ने कई मौकों पर बलात्कार की धमकियां मिलने के बाद पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है. 

हालांकि पुलिस इन मामलों में अबतक कोई गिरफ्तारी करने में नाकाम ही रही है.

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मोदी की अबतक की मीडिया संबंधी नीति सूचना प्रवाह की गति को नियंत्रित रखते हुए एक एजेंडा तय करने और मीडिया से एक कदम की दूरी रखकर चलने की रही है. 

मुख्यतः मीडिया के साथ अपनी शर्तों पर संलग्न होने की. हालांकि अब मोदी सरकार के अपने तीसरे वर्ष में प्रवेश करने के साथ ही यह तय करना जनता के हाथ में है कि बुद्धिमत्ता की लड़ाई में कौन जीता.

First published: 26 May 2016, 23:15 IST
 
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