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40 लाख से कम आबादी वाले 20 शहरों पर बोझ बन सकती है मेट्रो

स्कंद विवेक धर | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • शहरी परिवहन के कुछ विशेषज्ञों के अनुसार 40 लाख से कम आबादी वाले शहर नहीं उठा पाएंगे मेट्रो का बोझ. मेट्रो की लागत और मेंटनेंस के लिए जरूरी यात्री नहीं मिलेंगे ऐसे शहरों में.
  • आंकड़ों जो भी कहें शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडु दे चुके हैं 10 लाख से कम आबादी वाले शहरों में मेट्रो चलाने का आश्वासन. 

गगनचुंबी इमारतों की तरह अब मेट्रो रेल महानगरों की पहचान बनती जा रही है. कोलकाता, दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों की देखादेखी देश के कई दूसरे शहरों को लगने लगा है कि मेट्रो उनकी सभी यातायात समस्याओं का रामबाण इलाज है. पिछले कुछ सालों में कई शहरों में मेट्रो परियोजना की घोषणा की जा चुकी है.

कुछ शहरों में मेट्रो सेवा शुरू हो चुकी है. कुछ में काम चल रहा है. कुछ में शुरू करने की योजना है. कई शहरी परिवहन विशेषज्ञ इस रवैये को लेकर चिंतित हैं. उनका मानना है कि 40 लाख से कम आबादी वाले शहरों में मेट्रो बोझ बन जाएगी. 

इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रांसपोर्टेशन एंड डेवलपमेंट पॉलिसी के क्षेत्रीय निदेशक श्रेया गडेपल्ली कहती हैं, "राज्य सरकारों के लिए मेट्रो स्टेटस सिंबल बन गई है. सरकारें अपने शहरों की जरूरत और उनकी क्षमता का आकलन किए बगैर मेट्रो परियोजनाओं पर जोर दे रही हैं." 

राज्यों में मेट्रो को लेकर यह होड़ केंद्र सरकार की 'नेशनल अर्बन ट्रांसपोर्ट पॉलिसी 2006' के बाद शुरु हुई, जिसमें 20 लाख से अधिक आबादी वाले सभी शहरों में मेट्रो बनाने को मंजूरी दे दी गई थी.  इतना ही नहीं, इस नीति में भोपाल, चंडीगढ़ और लुधियाना जैसे 20 लाख से कम आबादी वाले कुछ शहरों को भी शामिल किया गया था .

विशेषज्ञों के अनुसार जिन शहरों की आबादी 40 लाख से कम है, उनमें मेट्रो की इतनी आमदनी नहीं होगी कि वह अपने निर्माण की लागत और रोजाना के संचालन खर्च निकाल सके. ऐसे में सरकार कब तब उसका घाटा अपने कंधों पर ढोती रहेगी.

दिल्ली मेट्रो में भारत में सबसे अधिक 25 लाख यात्री रोजाना सफर करते हैं

किसी भी मेट्रो में दो तरह की लागत लगती है. एक उसे बनाने का खर्च जिसे कैपिटल कॉस्ट कहते हैं और फिर उसके बाद उसे चलाने का खर्च, यानी ऑपरेटिंग कॉस्ट.

जमशेदपुर स्थित विख्यात मैनेजमेंट संस्थान एक्सएलआरआई में प्रोफेसर डॉक्टर गौरव वल्लभ कहते हैं, "मेट्रो के सुचारू रूप से चलने के लिए जरूरी है कि वह अपनी आमदनी से दोनों तरह के खर्च निकाल सके. भारत के 20 से 40 लाख आबादी वाले शहरों में इनमें से एक भी लागत निकालना मुश्किल होगा." 

मेट्रो में सफर

मौजूदा आंकड़े भी इन विशेषज्ञों की बात की पुष्टि करते हैं. सफल मानी जाने वाली दिल्ली मेट्रो भी फिलहाल घाटे में है. वह भी तब जबकि वो रोजाना के खर्च से अधिक कमाई करने वाले दुनिया के 5-6चुनिंदा मेट्रो में शामिल है.  

दिल्ली मेट्रो में भारत में सबसे अधिक 25 लाख यात्री रोजाना सफर करते हैं. दिल्ली मेट्रो की निर्माण लागत क़रीब 70 हज़ार करोड़ है. इसके अलावा मेट्रो की संचालन लागत अलग है. दिल्ली मेट्रो की आमदनी का बड़ा हिस्सा ब्याज चुकाने में खर्च हो रहा है. 

अगर निर्माण लागत को बचाने के लिए मेट्रो नेटवर्क को छोटा कर दिया जाए तो भी इस समस्या का हल नहीं निकल सकता

श्रेया गडेपल्ली कहती हैं, "मेट्रो की संचालन लागत हासिल करने के लिए एक तरफ़ की यात्रा में प्रति घंटे न्यूनतम 25 हजार यात्री होने जरूरी हैं.” 

विशेषज्ञों के अनुसार 20 से 40 लाख आबादी वाले शहरों में इतने यात्री मिलना टेढ़ी खीर होगा. अगर किराया बढ़ाकर लागत वसूलने की कोशिश की गई तो आम लोग मेट्रो पर यातायात के दूसरे साधनों को तरजीह दे सकते हैं. 

अगर निर्माण लागत को बचाने के लिए मेट्रो नेटवर्क को छोटा कर दिया जाए तो भी इस समस्या का हल नहीं निकल सकता. 

दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर के पूर्व निदेशक श्रीकांत गुप्ता कहते हैं, "किसी भी शहर में कोई भी लोकल ट्रांसपोर्ट तभी सफल हो सकता है जब उससे शहर के हर कोने में पहुंचा जा सके." 

अगर मेट्रो नेटवर्क छोटा होगा तो दैनिक यात्रियों की जरूरत पूरी नहीं होगी. ऐसे में मेट्रो को पर्याप्त यात्री नहीं मिलेंगे. नतीजन मेट्रो का राजस्व घट जाएगा. 

विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी स्थिति में 40 लाख से कम आबादी वाले शहरों में मेट्रो अपना संचालन लागत भी नहीं निकाल पाएगी. 

जयपुर मेट्रो का राजस्व जून महीने के 1.83 करोड़ के मुकाबले अक्टूबर में महज 73 लाख रुपए रह गया

राजस्थान की राजधानी जयपुर मेट्रो की सुविधा वाला ऐसा पहला शहर है. इसकी आबादी करीब 30 लाख है. इस साल जून में शुरू हुई जयपुर मेट्रो पर पहले महीने 14 लाख यात्रियों ने सफर किया था. उसके बाद से यात्रियों की संख्या में लगातार कमी आ रही है. जुलाई में यह संख्या घटकर 9 लाख और अगस्त में 7 लाख हो गई. सितंबर के मुकाबले अक्टूबर महीने में फिर तीस हजार यात्री कम हो गए. 

जयपुर मेट्रो का राजस्व भी जून महीने के 1.83 करोड़ के मुकाबले अक्टूबर में महज 73 लाख रुपए रह गया. 

जयपुर मेट्रो रेल कॉरपोरेशन का अनुमान है कि 10 सालों में उसे 41 करोड़ रुपए का संचालन घाटा होगा. वह भी तब जब उसकी क्षमता के 60 फीसदी यात्री मिलें. इससे कम यात्री मिलने पर यह घाटा और बढ़ सकता है. 

गुप्ता कहते हैं, "9.63 किलोमीटर लंबी जयपुर मेट्रो इसी समस्या से जूझ रही है. इंदौर, भोपाल, लखनऊ, नागपुर जैसे शहरों की मेट्रो परियोजनाओं के सामने भी यही चुनौती रहेगी." 

मेट्रो में सफर

क़रीब 21 लाख आबादी वाले इंदौर में मेट्रो के विस्तृत परियोजना रिपोर्ट(डीपीआर) में 108 किमी के नेटवर्क पर 22 हजार करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान लगाया गया है. अगर केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर 50 फीसदी पूंजी दे दें तो भी 50 फीसदी राशि कर्ज के जरिए जुटानी होगी. यानी इसके लिए कम से कम 11 हजार करोड़ रुपए कर्ज लेना होगा. 

इस कर्ज पर न्यूनतम पांच फ़ीसदी की दर से 550 करोड़ रुपए ब्याज देना होगा.  यानी इंदौर मेट्रो को संचालन लागत के अलावा ब्याज चुकाने के लिए कम से कम 550 करोड़ रुपए कमाना होगा. इसका अलावा मूल लागत की वापसी अलग है. 

मेट्रो से कई फायदे हैं, इसलिए अगर थोड़ा आर्थिक नुकसान हो भी रहा है तो सरकार को उसे चलाना चाहिए

जयपुर और इंदौर शहरों के उदाहरण से अनुमान लगाया जा सकता है कि वाराणसी(क़रीब 14 लाख), आगरा(क़रीब 17 लाख), पटना (क़रीब 20 लाख), मेरठ(क़रीब 14 लाख) और गुवाहाटी(क़रीब 9 लाख) जैसे कम आबादी वाले शहरों में मेट्रो का बोझ उठाना कितना मुश्किल होगा. 

वहीं डीएमआरसी के वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि मेट्रो को एक कारोबारी निवेश के तौर पर देखना सही नहीं है. उन्होंने कहा, "मेट्रो एक सामाजिक-आर्थिक निवेश है. इससे लोगों का जीवन आसान हो जाता है. सड़क दुर्घटनाओं में कमी आती है. हजारों लीटर पेट्रोल-डीजल की बचत होती है. पर्यावरण को साफ रखने में मदद मिलती है." 

कुछ दूसरे विशेषज्ञ भी मानते हैं कि मेट्रो से कई फायदे हैं, इसलिए अगर थोड़ा आर्थिक नुकसान हो भी रहा है तो सरकार को उसे चलाना चाहिए. 

केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू ने 10 लाख की आबादी वाले शहरों में भी मेट्रो चलाने का मौखिक आवश्वासन दे दिया है

डीएमआरसी के वरिष्ठ अधिकारी मानते हैं कि मेट्रो चाहने वाले ऐसे शहरों को आय के दूसरे स्रोत खोजने होंगे. 

उन्होंने कहा, "दिल्ली मेट्रो भी लगातार आय के अन्य स्रोत भी तलाश रही है. आज दिल्ली मेट्रो की 25 फीसदी आमदनी गैर-किराए से आती है. 40 लाख से कम आबादी शहरों को भी मेट्रो से आय के दूसरे स्रोत ढूंढने होंगे." 

बहरहाल आंकड़े जो भी कहते हों मौजूदा सरकार की सोच अलग प्रतीत होती है. इसी साल बेंगलुुरु मेट्रो के उद्घाटन के मौके पर केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू ने 10 लाख की आबादी वाले शहरों में भी मेट्रो चलाने का मौखिक आवश्वासन दे दिया है.

First published: 3 December 2015, 2:23 IST
 
स्कंद विवेक धर @skandvivek

प्रधान संवाददाता, दिल्ली ब्यूरो, राजस्थान पत्रिका. वित्त मंत्रालय और शहरी विकास मंत्रालय कवर करते हैं. तम्बाकू और बीड़ी उद्योग में होने वाले शोषण को उजागर करना शगल है. नेशनल प्रेस फाउंडेशन, न्यूयॉर्क की लंग हेल्थ फेलोशिप और पैनोस साउथ एशिया मीडिया फेलोशिप सहित कई अन्य प्रमुख फ़ेलोशिप मिल चुकी हैं.

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