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गुजरात: विजयदशमी के मौके पर दो सौ दलितों ने अपनाया बौद्ध धर्म

रथिन दास | Updated on: 11 February 2017, 5:47 IST

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत विजयदशमी के मौक़े पर जब गौरक्षकों को क्लीन चिट दे रहे थे, ठीक उसी वक़्त ‘विकसित’ गुजरात में तकरीबन दो सौ दलितों ने बौद्ध धर्म अपना लिया. हिंदू धर्म छोड़ने का यह समारोह गुजरात के साथ-साथ केंद्र सरकार के भी लिए कई मायनों में शर्मिंदगी का सबब है.

संघ परिवार जिन गौरक्षकों को आदर के भाव से देखता है, इस बार हुए धर्मांतरण के लिए सीधे तौर पर वही ज़िम्मेदार हैं. गुजरात में दलित पहले भी बौद्ध धर्म अपनाते रहे हैं लेकिन इस बार उन्होंने उना में 11 जुलाई को हुई घटना के विरोध ऐसा किया है.

गुजरात में दलितों ने हज़ारों की संख्या में 2003 से 2010 के बीच हिंदू धर्म छोड़ दिया था लेकिन तब वजहें उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़ी शिक़ायतें थीं. तब दलित बौद्ध धर्म इसलिए अपना रहे थे क्योंकि उच्च जाति के हिंदू दैनिक जीवन में उनके साथ हिंसा और भेदभाव कर रहे थे.

मगर इस बार 11 जुलाई की घटना के विरोध में जब दलित नेताओं ने अहमदाबाद से उना तक मार्च निकाला, तो उन्होंने साफ़ कहा था कि अगर इंसाफ़ में देरी की गई तो वे हिंदू धर्म छोड़ देंगे. मगर इस अल्टीमेटम के बावजूद उन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया.

अब जब विजयदशमी का मौक़ा आया तो उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाते हुए कह दिया कि उना में दलितों पर हुई हिंसा के विरोध में ऐसा कर रहे हैं. धर्मांतरण के समारोह कार्यक्रम अहमदाबाद, सुंदरनगर और कलोल में आयोजित किए गए लेकिन ये तीनों जगह उना से काफ़ी दूर हैं.

गौरक्षकों के अत्याचार के अलावा इस बार दलितों ने धर्मांतरण की कई और वजहें भी गिनाई हैं. इनमें हिंदू धर्म में व्याप्त  अंधविश्वास, जाति आधारित गैर-बराबरी और भेदभाव शामिल हैं.

बौद्ध धर्म अपनाते हुए दलितों ने कह दिया कि उना में दलितों पर हुई हिंसा के विरोध में ऐसा कर रहे हैं

दलितों का यह धर्मांतरण ऐसे समय में हो रहा है जब इन शिक़ायतों से इतर एक नई मुसीबत उन पर आ पड़ी है. उना घटना के बाद दलितों ने ऐलान किया था कि अब वे ऊंची जातियों के घर से मरे हुए जानवर नहीं उठाएंगे. मगर मरी गायों को नहीं उठाने के नाते ऊंची जातियां अब उनका उत्पीड़न कर रही हैं. गुजरात के सुदूर इलाक़ों से हर दिन ऐसी ख़बरें आ रही हैं जब मरे जानवरों को नहीं उठाने की वजह से दलित पीटे जा रहे हैं या फ़िर उनका सामाजिक बहिष्कार किया जा रहा है.

गुजरात में दलितों के धर्मांतरण की कहानी नई नहीं है लेकिन ऐसे मामलों को हमेशा छिपाया या दबाया गया है. उलटा  गुजरात को एक ऐसे राज्य के रूप में पेश किया गया जो कारोबार और निवेश के लिए सबसे उम्दा जगह है.

दलितों को सबसे ज़्यादा कठिनाई तब होती है, जब सामान्य कैटगरी वाली सोसायटी में वह फ्लैट ख़रीदने या किराए पर लेने की कोशिश करते हैं. बिल्डर साफ़ मना कर देते हैं कि वे दलित या अन्य अनुसूचित जातियों को फ्लैट नहीं देंगे.

बहुत सारे दलितों ने इसे धर्मांतरण की एक वजह बताया है. दलितों में यह एक किस्म का विरोध है जो उन्हें अपने आध्यात्मिक गुरू डॉक्टर भीमराव आंबेडकर से विरासत में मिला है. 2010 में पूरे गुजरात से तकरीबन 11 हज़ार दलित बौद्ध हो गए थे. तब उन्होंने कहा था कि वे हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था से मुक्ति पाने के लिए ऐसा कर रहे हैं.

एंटी कनवर्जन कानून 2003

2003 में लागू हुआ गुजरात का एंटी कनवर्ज़न कानून कहता है कि किसी भी व्यक्ति को धर्मांतरण से पहले इसकी लिखित सूचना ज़िलाधिकारी को देनी होगी. मगर मज़े की बात है कि बौद्ध, जैन या सिख धर्म अपनाने वालों को नोटिस नहीं देने की छूट है.

इस छूट से साफ़ है कि गुजरात के एंटी कनवर्ज़न कानून का असली मक़सद लोगों को इस्लाम या ईसाई धर्म में जाने से रोकना है न कि उन धर्मों को अपनाने से जिनकी जड़ें भारत में हैं.

मगर भारतीय मिट्टी से निकले धर्मों को अपनाने की यह छूट बीजेपी और संघ परिवार के लिए प्रेत साबित हो रही है जो स्वघोषित गौरक्षकों की हरक़तों पर अपनी गलती मानने के लिए तैयार नहीं हैं.

हालांकि कानून लागू होने के महज़ छह महीने के भीतर ही धर्म परिवर्तन करने वाले हज़ारों दलितों ने संघ परिवार के इस 'खेल' को उजागर कर दिया था जिन्होंने अपने छिपे मक़सद के तहत 2002 के दंगों में निचली जातियों का इस्तेमाल किया था.

2003 में विजयदश्मी के मौक़े पर धर्म परिवर्तन करने वाले कम से कम 5 हज़ार दलितों ने कहा था कि वह ऊंची जातियों की दोहरी नीति के विरोध में ऐसा कर रहे हैं. जो हमें दंगों में मुसलमानों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करने के बाद अलग-थलग छोड़ देते हैं.

आमतौर पर दलित विजयदश्मी के दिन धर्मांतरण इसलिए करते हैं क्योंकि 1956 में इसी दिन डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने भेदभाव आधारित जाति व्यवस्था का विरोध करते हुए हिंदू धर्म छोड़ दिया था.

First published: 13 October 2016, 7:44 IST
 
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