Home » इंडिया » 2005 Delhi blast case & acquittals: Why the Special Cell deserves to b
 

2005 दिल्ली सीरियल ब्लास्ट: स्पेशल सेल पर कार्रवाई क्यों होनी चाहिए

आदिल मेहदी | Updated on: 21 February 2017, 8:56 IST

बेगुनाह मुस्लिम युवाओं को आतंकवाद के मामलों में फंसाने की गलत परम्परा और फिर कुछ सालों बाद अदालत द्वारा उन्हें बरी करने संबंधी किस्सों में 16 फरवरी को इस फेहरिस्त में एक और मामला जुड़ गया. दिल्ली के एक सत्र न्यायालय ने 2005 में दिल्ली में हुए सीरीयल बम धमाकों के मामले में आरोपी तीन लोगों को बरी कर दिया. इन धमाकों में 67 लोग मारे गए थे और 200 घायल हुए.

मामले में 11 साल तक चली सुनवाई के बाद सत्र न्यायाधीश रीतेश सिंह ने मामले में आरोपी मोहम्मद रफीक शाह और मोहम्मद हुसैन फजलि को सारे आरोपों से बरी कर दिया और तीसरा अभियुक्त तारिक अहमद डार किसी अन्य मामले में दोषी पाया. डार को दस साल की कैद की सजा सुनाई गई है लेकिन वह पहले ही 11 साल जेल में बिता चुका है;इसलिए उसे भी रिहा कर दिया जाएगा.

फर्जीवाड़ा?

इन तीनों अभियुक्तों के खिलाफ स्पेशल सेल के कैदियों की तरह मुकदमा चलाया गया जैसे कि उन्हें मोबाइल कॉल रिकॉर्ड के आधार पर किसी फिल्मी सीन की तरह कश्मीर से सीधे उठाया गया हो. रफीक शाह पर डीटीसी की एक बस में बम फिट करने का आरोप लगाया गया था. कश्मीर यूनिवर्सिटी में एम.ए. की पढ़ाई कर रहे शाह बम विस्फोट वाले दिन अपनी क्लास में थे. अदालत के अनुसार यूनिवर्सिटी के उपस्थिति रजिस्टर और प्रत्यक्ष दर्शी गवाहों के बयानों से भी यह सच साबित होता है कि रफीक क्लास में थे. उस पर मोबाइल फोन के जरिये हमलों की साजिश करने और उन्हें अंजाम देने का आरोप है.

अदालत ने कहा,ऐसे कोई सबूत नहीं मिले जिनके आधार पर कहा जा सके कि उसने वाकई वही मोबाइल नंबर का इस्तेमाल करके साजिश रची होंगी, जो कि पुलिस ने दिया है. टेलीकॉम सेवा प्रदाता कम्पनी के रिकॉर्ड भी कुछ साबित नहीं कर सके. न्यायाधीश ने कहा,चूंकि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि ‘‘डीटीपी बस में बम उसने ही रखा था.’’ इसलिए उनका बरी किया जाना लाजमी है.

दूसरे आरोपी हुसैन फजली को भी बिना वजह इसी तरह मामले में अभियुक्त बना दिया गया. इसके लिए भी पुलिस द्वारा दिया गया मोबाइल नंबर ही एकमात्र साक्ष्य बताया गया. पुलिस का दावा है कि यह मोबाइल नंबर हमले की साजिश
करने के लिए इस्तेमाल हुआ था. अदालत का कहना है कि पुलिस के दावे में कई खामियां मिलीं. कॉल रिकॉर्ड और
उनकी अवधि पुलिस के दावों से मेल नहीं खाते. हुसैन फजलि ने धमाके वाले दिन मात्र दो बार ही मोबाइल फोन का इस्तेमाल किया था. वह भी बैलेंस के बारे में पता करने वाले नंबर 123 पर.

फैसले में साफ-साफ कहा गया है कि ‘‘केवल एक मात्र सबूत के आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती क्योंकि इस एक सबूत से यह साबित नहीं हो जाता कि फाजलि इन धमाकों की साजिश में शामिल था.’’

तीसरे आरोपी तारिक डार को लेकर भी कुछ ऐसे ही संशय थे. उसे इस हमले का मास्टरमाइंड बताते हुए आरोप लगाया गया था कि उसे इसके लिए पैसा मिला और उसने यह पैसा आतंकियों को बांट दिया. पुलिस ने एक बार फिर मोबाइल फोन कॉल पर भरोसा किया और पैसे के लेन-देन के रिकॉर्ड को देखते हुए उस पर बड़े पैमाने पर हवाला लेन-देन का आरोप लगा दिया.

उसे पैसों के अवैध लेन-देन का दोषी ठहराते हुए जज ने कहा ऐसा कोई साक्ष्य पेश नहीं किया गया है, जिससे साबित हो कि हवाला का यह पैसा आतंकियों की फंडिंग में इस्तेमाल हुआ है. साथ ही उन्होंने यह आरोप भी खारिज कर दिया कि ये तीनों एक दूसरे को जानते थे. अभियोजन पक्ष फाजिलि और शाह के बीच किसी तरह का लिंक साबित नहीं कर पाया और न ही डार का इन दोनों से.’’ इसलिए इन टेलीफोनिक रिकॉर्ड के आधार पर अदालत ऐसा कोई भी निर्णय लेने में नाकाम रही है कि डार का इन विस्फोटों की साजिश रचने में कोई हाथ रहा होगा.

अपना फैसला सुनाते हुए जज ने कहा ‘‘ऐसा कोई आधार नहीं मिला जिससे यह साबित किया जा सके कि ये आरोपी किसी भी रूप में इन हमलों की साजिश से जड़े थे और अभियोग पक्ष इसमें बुरी तरह नाकाम रहा.

यूं चला घटनाक्रम

दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा द्वारा निर्दोष लोगों को आतंकी मामलों में इस तरह नामजद करने का यह अकेला मामला नहीं है, जिसे मामूली लापरवाही समझ कर नजरंदाज कर दिया जाए. अगर हम इस विशेष शाखा का रिकॉर्ड खंगालें तो पता चलता है कि निर्दोष युवाओं को आरोपी बनाने का एक पैटर्न ही चला आ रहा है. खास तौर पर जांच में लापरवाही और साक्ष्यों को पेश करने की प्रकिया में अत्यधिक समानता दिखाई देती है.

इनमें से कुछ तो ‘किस्मत वाले’ हैं, जो बच जाते हैं जो 10-12 साल जेल में गुजारने के बाद बरी कर दिए जाते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो जेल जाने के बाद कानूनी उलझनों और दांव पेंच में फंस जाते हैं. जामिया टीचर सॉलिडेटरी एसोसिएशन (जेटीएसए) ने अपनी रिपोर्ट ‘‘फ्रेम्ड, डैम्ड, अक्विटेडः डोजियर्स ऑफ ए वेरी स्पेशल सैल’’ के अनुसार, 24 मामले ऐसे पाए गए जिनमें विशेष शाखा द्वारा आतंकी मामलों में नामजद किए गए युवाओं को अदालतों ने तब बरी किया जब उनके खिलाफ मामले खत्म हो गए. न्याय के साथ इतने बड़े पैमाने पर खिलवाड़ तभी संभव है, जब पुलिस को मनमानी करने की खुली छूट हो.

अगर भारत दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्था बनने की ख्वाहिश रखता है तो पहले इसे दुनिया भर के बड़े लोकतांत्रिक देशों की तरह निष्पक्ष और आधुनिक कानून व्यवस्था लागू करनी होगी. एक सभ्य समाज की पंक्ति में खड़ा होने के लिए भारत को पुलिस या अन्य सुरक्षा एजेंसियों की गलती की वजह से नामजद किए गए लोगों के बरी होने पर अच्छा खासा मुआवजा देने की व्यवस्था करनी होगी. आखिर इस गलती की वजह से इन लोगों की पूरी जिंदगी बर्बाद हो जाती है और प्रतिष्ठा धूमिल हो चुकी होती है.

First published: 21 February 2017, 8:56 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी