Home » इंडिया » 2015: How Modi lost his charm this year
 

2015: धुंधली पड़ रही मोदी की चमकार

भारत भूषण | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
QUICK PILL
  • नरेंद्र मोदी ने अपार लोकप्रियता के रथ पर सवार होकर लोक सभा में प्रचंड बहुमत प्राप्त किया था लेकिन इस साल उनकी छवि काफ़ी धूमिल हुई है.
  • विदेश नीति के मोर्चे पर मोदी सरकार को सफलता मिलती दिख रही है लेकिन घरेलू मोर्चे पर वह लगभग हर जगह विफल सिद्ध हो रहे हैं.

बिहार चुनाव में मिली हार के बाद एक ट्विवटर यूजर्स ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना पंचतंत्र की कहानियों के उस रंगे सियार से कर दी जो राजा होने का ढोंग करता है. इस भद्दे ट्टवीट से जाहिर है कि आम भारतीय वोटर उन नेताओं के संग उदारता दिखाने के मूड में नहीं है जो उसकी उम्मीदों पर खरे नहीं उतर रहे हैं.

नरेंद्र मोदी जिस लोकप्रियता के रथ पर चढ़कर लोक सभा चुनावों में प्रचंड बहुमत लाए थे वो संसद की बाहरी और अंदरूनी राजनीति, सुस्त आर्थिक विकास दर और सांप्रादायिक वैमनस्य को रोकने में उनकी विफलता के गड्डे में फंस गया है. विदेश नीति के मुद्दे पर उनकी सरकार ने सराहनीय काम किया है. उन्होंने अभूतपूर्व तरीके से दुनिया के नक्शे पर भारत को आगे बढ़ाने की कोशिश की लेकिन देश के अंदर उनका कामकाज संतोषजनक नही रहा है.

मोदी सरकार विपक्षी दलों से सहयोगी संबंध बनाने में विफल रही है. अप्रैल में बज़ट पारित होने के बाद से ही संसद में इस साल के अंत तक कोई महत्वपूर्ण कामकाज नहीं हुआ है. प्रधानमंत्री और उनके सहयोगियों ने विपक्ष को इस हद तक ज़लील किया कि जब सरकार को कुछ महत्वपूर्ण कानून पारित कराने के लिए विपक्ष के सहयोग की ज़रूरत पड़ी तो कोई दल उनसे बात करने को तैयार नहीं था. सरकार ने बातचीत के सारे रास्ते पहले ही बंद कर दिये थे.

बिहार में 26 चुनावी रैलियां करने के अलावा मोदी ने हर पैंतरा अपनाया फिर भी उनकी पार्टी बुरी तरह हार गयी

मोदी के अहंकार की बात मीडिया में अक्सर की जाती है. दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के हाथों मिली करारी हार को स्वीकार करना उनके लिए बहुत कठिन रहा होगा. बिहार में मिली हार के बाद उनका दर्द दोगुना हो गया.

बिहार में 26 चुनावी रैलियों को संबोधित करने के अलावा उन्होंने हर राजनीतिक पैंतरा अपनाया फिर भी उनकी पार्टी बुरी तरह हार गयी. इस बार उन्हें नीतीश कुमार और लालू यादव ने चुनावी पटकनी दी.

लोक सभा चुनाव से पहले बनी उनकी महामानव जैसी छवि को गहरा धक्का लगने के बाद उन्होंने विपक्ष से संवाद की पहल की. लेकिन तब तक सरकार और विपक्ष के बीच कड़वाहट इतनी बढ़ चुकी थी कि उनकी पहल का कोई ठोस नतीजा नहीं निकला.

पढ़ेंः अमेरिका से बेहतर रिश्तों के बावजूद भारत-रूस संबंध गाढ़ा बना रहेगा

विपक्ष ही नहीं पार्टी और सरकार के अंदर भी मोदी ने अपने सहयोगियों के संग जिस तरह का बरताव किया उससे उनकी छवि को नुकसान हुआ है. पिछले साल गृह मंत्री राजनाथ सिंह के बेटे से जुड़ी एक अफ़वाह के बाद उनके पर कतर दिये गये. इस साल यही हाल विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और वित्त मंत्री अरुण जेटली का हुआ. स्वराज ललित मोदी मामले को लेकर आरोपों में घिर गई थीं. वहीं जेटली दिल्ली डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन घोटाले में घिर हुए हैं.

मोदी इनमें से किसी भी नेता के बचाव में तुरंत सामने नहीं आए. मोदी को अच्छी तरह पता था कि उनकी सरकार के एक मंत्री ने ललित मोदी को उनकी बीमार पत्नी को देखने के लिए इमरजेंसी पासपोर्ट उपलब्ध कराने की अनुमति दी है फिर भी वो इस पूरे विवाद पर चुप ही रहे.

नरेंद्र मोदी अपने वरिष्ठ साथियों के बचाव के लिए आगे नहीं आए. अरुण जेटली के बचाव में भी वो देर से सामने आए

जेटली के मामले में मोदी ने उनका बचाव देर से दिए गये एक दोधारी बयान से किया. उन्होंने कहा कि जेटली उसी तरह इससे पाक-साफ बाहर आएंगे जिस तरह जैन हवाला मामले से लालकृष्ण आडवाणी आए थे. याद रहे कि आडवाणी को हवाला घोटाले के बाद इस्तीफ़ा देना पड़ा था और वो तब तक सरकार से बाहर रहे जब तक कि अदालत ने उन्हें बरी नहीं कर दिया. उनके बयान के बाद विपक्ष ने ज्यादा जोर-शोर से जेटली के इस्तीफ़े की मांग शुरू कर दी.

अपने दो वरिष्ठ मंत्रियों की छवि को सार्वजनिक रूप से धूमिल होने देना मोदी की भूल थी. मोदी ने राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के साथ भी यही किया.

अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को निपटाने के मामले में उन्होंने कांग्रेसी तरीका ही अपनाया. नतीजन जिस तरह आज कांग्रेस एक परिवार के ईर्दगिर्द सिमटी पार्टी बनकर रह गयी है उसी तरह भाजपा भी नरेंद्र मोदी और अमित शाह तक सिमटती नज़र आ रही है.

पिछले कुछ सालों में भाजपा में नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व का अतिशय महिमामंडन किया गया. उन्हें पार्टी के एकमात्र तारणहार नेता के रूप में पेश किया गया. ऐसे में उनके चुनाव जिताने की क्षमता पर सवाल उठने के बाद पार्टी पर उसका नकारात्मक असर पड़ना स्वाभाविक है. जबकि साल 2019 तक कुल नौ राज्यों में विधान सभा होने वाले हैं.

मोदी की छवि धूमिल होने के पीछे दूसरा बड़ा कारण है आर्थिक विकास के मोर्चे पर अपने वादों के अनुरूप प्रदर्शन न कर पाना. चुनाव से पहले मोदी ने बेसब्र वोटरों के सामने बड़े बड़े वादे किए. वो भी तब जब उनके सामने कोई सशक्त प्रतिद्वंद्वी नहीं था. अब जनता उनका ये तर्क स्वीकार नहीं कर पा रही है कि आर्थिक सुधारों में वक़्त लगता है

निर्यात दर में कोई ठोस बढ़ोतरी नहीं होने पर देश के आर्थिक विकास दर में कोई दीर्घकालीन सुधार होने की गुंजाइश नहीं है

कुल मिलाकर जब तक निर्यात दर में कोई ठोस बढ़ोतरी नहीं होती है देश की आर्थिक विकास दर में कोई दीर्घकालीन सुधार होने की गुंजाइश नहीं है. मोदी सरकार पब्लिक सेक्टर बैंकों को हालात सुधारने में भी कोई ठोस पहल नहीं कर सकी है. जबकि भारत के घरेलू कर्ज का तीन-चौथाई हिस्सा इन बैंकों से लिया गया है. इन सभी बैंकों पर नॉन-पर्फॉार्मिंग एसेट्स का बोझ भी काफ़ी अधिक है.

मोदी सरकार ने कारोबारी सूहलियतों बढ़ाने के मामले में भी कुछ उल्लेखनीय काम नहीं किया है. सरकार ने जब महत्वपूर्ण सेवा एवं उत्पाद कर (जीएसटी) विधेयक पारित कराने की कगार पर थी उसके एक नेता डॉक्टर सुब्रामण्यम स्वामी ने मुख्य विपक्षी पार्टी के नेताओं की गिरफ़्तारी की ज़मीन तैयार कर दी थी. नतीजन जीएसटी विधेयक अधर में अटक गया.

पढ़ेंः दुश्मनी बहुत हुई, अब शांति को मौका देना चाहिए

चुनाव से पहले कारोबारी जगत के लोगों को लग रहा था कि मोदी भारत के रोनाल्ड रीगन साबित होंगे लेकिन मोदी के अब तक के कामकाज से कारोबार जगत भी निराश है. देश में महंगाई बढ़ी है. निर्यात और निर्माण सेक्टर में गिरावट आयी है. ऊर्जा और बिजली सेक्टर में भी कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं दिखी है.

कारोबारियों के अलावा देश के ग़रीब और हाशिये के लोग भी मौजूदा सरकार से ख़ुश नहीं हैं. मोदी सरकार ने सामाजिक कल्याण की योजनाओं पर की जाने वाली राशि में कटौती की है. इन योजनाओं में इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट स्कीम, इंटीग्रेटेड चाइल्ड प्रोटेक्शन प्रोग्राम, सर्व शिक्षा अभियान, मिडडे मील स्कीम, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना और नेशनल ड्रिंकिंग वाटर प्रोग्राम इत्यादि योजनाएं शामिल हैं. इस सरकार में सबसे बुरा झटका बाल शिक्षा और स्वास्थ्य सेक्टर को लगा है. ऊपर से तुर्रा ये है कि ये सबकुछ 'सुशासन'के नाम पर किया जा रहा है.

नरेंद्र मोदी की छवि को तीसरा बड़ा झटका सामाजिक समरसता को बनाए रखने में उनकी विफलता से लगा है

ख़ुद को 'राष्ट्रवादी हिंदू' बताने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने थल सेना, नौसेना और वायु सेना के हथियारों और उपकरणों के नवीनीकरण के बज़ट में कटौती कर दी. उन्होंने इस पैसे को वेतन और पेंशन देने के लिए प्रयोग करने की बात कही. 'वन रैंक वन पेंशन' योजना को मंजूरी देने के बाद सरकार का रक्षा बज़ट पहले ही लड़खड़ा रहा था कि पैरामिलिट्री बलों में इसे लागू करने की मांग उठने लगी है.

नरेंद्र मोदी की छवि को तीसरा बड़ा झटका उनके अब तक के कार्यकाल में सामाजिक समरसता को बनाए रखने में उनकी विफलता से लगा है. भारत हमेशा से बहुजातीय और बहुभाषी, धार्मिक बहुलता वाला देश रहा है. पिछले कुछ समय से सांप्रदायिक शक्तियां जिस तरह से देश में खुलकर कहर ढा रही हैं उससे देश की पारंपरिक छवि को धक्का लगा है. लोग इन मामलों को लेकर ज्यादा चिंतित इसलिए भी हुए कि कई बार ऐसा लगा कि ऐसी विभाजनकारी शक्तियों को सत्ताधारी नेताओं का  प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन प्राप्त है.

पढ़ेंः मोदी-शरीफ मुलाकात: जिंदल, स्टील और व्यापार

साल 2015 को 'अहिष्णुता का साल' का कहना पूरी तरह सही है. मोदी सरकार सामाजिक समरसता को बनाए रखने में जिस तरह विफल रही है उसे देखते हुए उदारवादी लेखक, कलाकार और बुद्धिजीवी तबका सरकार से निराश हो गया. मोदी अपनी पार्टी के उन बड़बोले नेताओं पर लगाम लगाने में भी पूरी तरह विफल रहे जो सभी सेकुलर बुद्धिजीवियों को वनवे टिकट पर पाकिस्तान भेजने के बातें करते हैं. (इस्लामी राष्ट्र पाकिस्तान उन्हें लेकर क्या करेगा?)

एक प्रशासक के रूप में मोदी ये समझने में विफल रहे कि अल्पसंख्यकों को निशाना बनाए जाने से इन समुदायों के कुछ नौजवानों में भारत जैसी धार्मिक बहुलता वाले समाज के प्रति नकारात्मक सोच पैदा हो रही है. ये ध्यान देने की जरूरत है कि ऐसे ही माहौल में चरमपंथ पनपता है.

नरेंद्र मोदी ये नहीं समझ पा रहे हैं कि देश में शांति नहीं रहेगी तो उनका आर्थिक एजेंडा लड़खड़ाता ही रहेगा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ये नहीं समझ पाए कि वो जिस आर्थिक विकास की बात करते हैं उसके लिए सामाजिक सहिष्णुता और समरसता जरूरी है. ये शर्मनाक था कि भारत को उसके समावेशी संविधान की याद अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने दिलायी. ओबामा गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि थे. अमेरिका जाने से एक दिन पहले उन्होंने एक सार्वजनिक भाषण में ये बात कही थी.

नरेंद्र मोदी ये नहीं समझ पा रहे हैं कि देश में शांति नहीं रहेगी तो उनका आर्थिक एजेंडा लड़खड़ाता ही रहेगा.

नरेंद्र मोदी को इस साल सफलता केवल विदेश नीति के मोर्चे पर मिली है. उनकी विदेश नीति डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया और स्टार्ट अप जैसी घरेलू योजनाओं से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है. इन योजनाओं के लिए भारत को बड़ी मात्रा में विदेशी पूंजी, तकनीकी और प्रबंधकीय कुशलता की जरूरत होगी.

पढ़ेंः तापी गैस पाइपलाइन से बदल सकता है कि पश्चिम एशिया और भारत का गणित

मोदी सरकार ने अमेरिका, चीन और जापान के संबंधों में नई ऊष्मा भरी है. पूर्वी एशियाई और दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के संग सहयोग बढ़ाने की पहल की है. अफ़्रीकी देशों के संग भी संबंध मजबूत करने की दिशा में कोशिशें की गई हैं.

हालांकि अपने पड़ोसी देशों नेपाल और पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते इस साल तल्ख हुए हैं. पाकिस्तान के संग दोबारा बातचीत पिछले महीने शुरू हो पायी. लेकिन नेपाल की राजधानी काठमांडु में जिस तरह भारतीय प्रधानमंत्री का पुतला जलाया गया वो हमारी नेपाल नीति के लिए शुभ संकेत नहीं है.

नरेंद्र मोदी के पास अब भी अपनी छवि सुधारने के लिए काफ़ी वक़्त है लेकिन सवाल ये है कि क्या वो समझ पाएंगे कि उनसे क्या भूल हुई है और क्या वो अपनी भूल सुधारने का साहस रखते हैं.

पढ़ेंः भारत-जापानः वाजपेयी-मोरी के सपनों को पूरा करेंगे मोदी-अबे?

First published: 30 December 2015, 4:50 IST
 
भारत भूषण @Bharatitis

एडिटर, कैच न्यूज़. पत्रकारिता में 25 से ज्यादा सालों का अनुभव. इस दौरान मेल टुडे के संस्थापक संपादक, हिन्दुस्तान टाइम्स के कार्यकारी संपादक, द टेलीग्राफ, दिल्ली के संपादक, एक्सप्रेस न्यूज़ सर्विस के संपादक, इंडियन एक्सप्रेस के वॉशिंगटन संवाददाता, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सहायक संपादक के रूप में काम किया.

पिछली कहानी
अगली कहानी