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चुनाव लड़ने वाली महिलाएं तो बढ़ रही है पर जीतने वाली नहीं

अभिषेक पराशर | Updated on: 23 May 2016, 23:49 IST
(कैच हिंदी)
QUICK PILL
  • पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में महिला मुख्यमंत्रियों की वापसी के बावजूद महिला विधायकों की संख्या में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हो पाई है लेकिन महिला उम्मीदवारों की संख्या में जरूरत बढ़ोतरी हुई है.
  • 2011 के तमिलनाडु विधानसभा में 16 विधायक महिलाएं थी जिनकी संख्या मौजूदा विधानसभा में बढ़कर 17 हो गई. वहीं 2011 में असम विधानसभा में 14 महिला विधायक थीं जिनकी संख्या नए विधानसभा में कम होकर 8 हो गई है.
  • 2016 के बंगाल विधानसभा में 39 महिलाएं विधायक बनी हैं जबकि पिछले विधानसभा में इनकी संख्या 33 थी. तृणमूल कांग्रेस ने इस बार 16 फीसदी महिलाओं को अपना उम्मीदवार बनाया था.

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे दो बड़े कारणों से खास रहे. तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता 1984 के बाद राज्य की पहली वैसी महिला मुख्यमंत्री बनने में सफल रहीं जिन्हें मतदाताओं ने लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए चुना. तमिलनाडु में पिछले चार दशकों के दौरान किसी भी सरकार को लगातार दूसरा कार्यकाल नहीं मिला है. 

वहीं पूर्वी भारत के पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को भी मतदाताओं ने दूसरे कार्यकाल के लिए चुन लिया है. ममता बनर्जी पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार दो तिहाई से अधिक बहुमत से वापसी करने में सफल रही. 2015 के चुनावी नतीजों ने जे जयललिता और ममता बनर्जी को और अधिक ताकतवर बनाया है. 

विधायिका में महिलाओं को अभी तक एक तिहाई आरक्षण नहीं मिल पाया है, लेकिन इसके बावजूद ममता बनर्जी, जे जयललिता और मायावती जैसी महिलाएं भारतीय राजनीति में मजबूत दखल और दबदबे के लिए जानी जाती हैं. 

हालांकि इस सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि विधायिका में महिला प्रतिनिधियों की संख्या उनकी आबादी के लिहाज से बेहद कम है. दो राज्यों में महिला मुख्यमंत्रियों की वापसी के बावजूद महिला विधायकों की संख्या में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हो पाई है लेकिन महिला उम्मीदवारों की संख्या में जरूर बढ़ोतरी हुई है.

जेंडर इन पॉलिटिक्स के आंकड़ों के मुताबिक 2011 को छोड़कर पिछले पांच चुनाव में जे जयललिता ने डीएमके के मुकाबले ज्यादा महिलाओं को टिकट दिए. 2016 में जयललिता की पार्टी अन्नाद्रमुक ने कुल 12 फीसदी महिलाओं को अपना उम्मीदवार बनाया जबकि डीएमके ने 11 फीसदी महिलाओं को टिकट दिए. 

महिलाओं की उम्मीदवारी में बढ़ोतरी होने के बावजूद तमिलनाडु विधानसभा की लैंगिक स्थिति में मामूली बदलाव हुआ है

2016 के विधानसभा चुनावों में महिला उम्मीदवारों की संख्या में बढ़ोतरी तो हुई लेकिन विधानसभा में उनका प्रतिनिधित्व पहले की तरह ही है

महिलाओं की उम्मीदवारी में बढ़ोतरी होने के बावजूद तमिलनाडु विधानसभा की लैंगिक स्थिति में मामूली बदलाव हुआ है. 2011 के तमिलनाडु विधानसभा में 16 विधायक महिलाएं थी जिनकी संख्या मौजूदा विधानसभा में बढ़कर 17 हो गई.

तमिलनाडु में करीब 3 फीसदी मत पाने वाली पार्टी बीजेपी ने 9 फीसदी महिलाओं को अपना उम्मीदवार बनाया.

उम्मीदवारी बढ़ी, प्रतिनिधित्व जस की तस

असम में 2011 के चुनाव में 81 महिलाएं मैदान में थी जिनकी संख्या इस बार बढ़कर 91 हो गई. लेकिन विधानसभा में पहुंचने वाली महिला विधायकों की संख्या पिछले बारे से भी कम हो गई. 

पिछली बार असम विधानसभा में 14 महिला विधायक थीं जिनकी संख्या नए विधानसभा में कम होकर 8 हो गई है.

चुनाव में महिला भागीदारी के लिहाज से केरल सभी राज्यों में आगे रहा. कह सकते हैं कि केरल विधानसभा चुनाव लैंगिक समानता के पायदान पर सबसे ऊपर रहा. 2011 विधानसभा चुनाव में केरल में 36 महिलाएं मैदान में थी जो 2016 में 192 फीसदी बढ़कर 105 हो गई. 

महिलाओं की बड़ी भागीदारी के बावजूद केरल विधानसभा की लैंगिक तस्वीर में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ. केरल में पिछली बार जहां 7 महिलाएं विधानसभा पहुंचने में सफल हुई थी वहीं 2016 में इस संख्या में मामूली बदलाव हुआ. केरल के मौजूदा विधानसभा में फिलहाल 8 महिला विधायक हैं.

महिलाओं पर बढ़ा ममता का भरोसा

दूसरी बार पश्चिम बंगाल की सत्ता में दमदार वापसी करने वाली ममता बनर्जी ने 2016 में 15 फीसदी टिकट महिला उम्मीदवारों को दिए. जबकि 2011 में पार्टी ने 14 फीसदी टिकट महिलाओं को दिया था. 2016 में तृणमूल कांग्रेस ने पहली बार इतनी अधिक संख्या में  महिलाओं को अपना उम्मीदवार बनाया.

2016 के बंगाल विधानसभा में 39 महिलाएं विधायक बनी हैं जबकि पिछली विधानसभा में इनकी संख्या 33 थी.

2011 के मुकाबले 2016 में पश्चिम बंगाल विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या बढ़कर 39 हो गई है

बंगाल में करीब 35 सालों तक शासन करने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआईएम) महिलाओं को टिकट देने के मामले में हमेशा से आगे रही है. 

1996 के बाद सीपीएम में महिला उम्मीदवारों की संया लगातार बढ़ी है. 1996 में पार्टी ने जहां 11 फीसदी  महिलाओं को अपना उम्मीदवार बनाया था वहीं 2001 में यह संख्या बढ़कर 12 फीसदी हो गई.

2006 में पार्टी ने 15 फीसदी महिलाओं को टिकट दिया जो 2011 में बढ़कर 19 फीसदी हो गई. हालांकि 2016 के चुनाव में पार्टी ने पिछले चुनाव के 19 फीसदी के मुकाबले 12 फीसदी महिलाओं को अपना उम्मीदवार बनाया.

वहीं बंगाल विधानसभा में  पहली बार तीन सीट जीतने वाली पार्टी बीजेपी ने 10 महिलाओं को अपना उम्मीदवार बनाया. महिला उम्मीदवारों को टिकट देने के मामले में कांग्रेस बीजेपी के समकक्ष दिखी. 

बंगाल विधानसभा में 44 सीट जीतने वाली कांग्रेस ने 10 फीसदी महिलाओं को अपना उम्मीदवार बनाया था.

First published: 23 May 2016, 23:49 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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