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साल 2016: जनस्वास्थ्य के लिए एक बुरा साल जिसे नोटबंदी ने बदतर बना दिया

विशाख उन्नीकृष्णन | Updated on: 11 February 2017, 5:44 IST

जनस्वास्थ्य पर भारत का निवेश जीडीपी का मात्र 1.5 प्रतिशत है. कोई आश्चर्य नहीं कि वर्ष 2016 में भारत की जन स्वास्थ्य क्षेत्र में उपलब्धियां बहुत कम ही रहीं.

इस साल भारत को दो संक्रामक बीमारियों के पूर्ण उन्मूलन में सफलता मिली. ये बीमारियां हैं यॉज और नवजात शिशुओं में होने वाला टिटनस. नवजात शिशुओं में टिटनस प्रसव के दौरान साफ—सफाई में लापरवाही की वजह से होता है और यह घातक होता है.

डब्ल्यूएचओ ने भी इन दो बीमारियों के उन्मूलन की दिशा में भारत की उपलब्धियों की सराहना की है. यॉज एक ऐसी बीमारी है जो कि त्वचा और अस्थियों को प्रभावित करती है, जिसके कारण शरीर में विकृति और बदसूरती आती है. इस बीमारी के उन्मूलन के प्रयास 1950 के दशक में शुरू हुए थे.

नए सरोगेसी बिल के कारण उन परिवारों की जीविका पर संकट खड़ा हो गया है जो अपनी आय के लिए इस पर निर्भर थे

इन उपलब्धियों के बावजूद, इस साल का सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम तो सरोगेट माओं के स्वास्थ्य को लेकर लिया गया संसद का निर्णय ही रहा. हालांकि अभी यह बिल संसद में पारित होना शेष है, लेकिन इस बिल में आर्थिक लाभ के लिए सरोगेसी को प्रतिबंधित करना प्रस्तावित है. बिल में सरोगेसी अर्थात कोख को किराए पर लेने की अनुमति तभी दी गई है जबकि युगल को बच्चे होने की कोई संभावना न हो अर्थात वे बांझ हों. इसके कारण यद्यपि उन परिवारों की जीविका पर संकट खड़ा हो गया है जो अपनी आय के लिए सरोगेसी पर ही निर्भर थे.

साथ ही इस साल स्वास्थ्य मंत्रालय ने रोटा वायरस की नई वैक्सीन भी जारी की जो कि चार राज्यों ओडिशा, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश और हरियाणा के जन स्वास्थ्य केंद्रों में नि:शुल्क उपलब्ध कराई गई. रोटा वायरस को भारत में हर साल 78,000 मौतों के लिए जिम्मेदार माना जाता है.

सरकार ने प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान भी इस साल लॉन्च किया. इसके अंतर्गत प्रत्येक माह की नौ तारीख को गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान और प्रसव तक गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने का विचार है. इसके साथ ही योजना में प्रत्येक गर्भवती महिला को दूसरे अथवा तीसरे त्रैमासिक पर सभी सरकारी अस्पतालों में एक न्यूनतम स्वास्थ्य सुविधा और पैकेज उपलब्ध कराया जाता है.

अच्छी खबरें यहीं खत्म हुईं

सरकार का स्वास्थ्य खर्च चिंताजनक रूप से कम है. व्यावहारिक रूप से इसका अर्थ यह है कि भारत की बड़ी आबादी गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाने के बारे में सोच भी नहीं सकती.

आईसीई 360 के एक सर्वे से हाल में यह बात सामने आई थी कि भारत में 20% सबसे संपन्न वर्ग के तीन प्रतिशत घर आज इस समस्या से जूूझ रहे हैं कि उनकी आय का पांचवां हिस्सा स्वास्थ्य देखभाल पर खर्च हो जाता है. जबकि सबसे गरीब आबादी के 20 प्रतिशत हिस्से के लिए यह आंकड़ा सातवां हिस्सा था.

सर्वे में यह भी दिखाया गया था कि 47 प्रतिशत घरों में बीमारी की स्थिति में वे जनस्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टर को दिखाते हैं जबकि 38 प्रतिशत घर ऐसी स्थिति में निजी अस्पताल में डॉक्टर को दिखाना पसंद करते हैं. 14 फसदी लोग ऐसे भी हैं जो कि स्वतंत्र रूप से क्लीनिक चला रहे डॉक्टरों को दिखाते हैं. इस सर्वे में 61,000 घरों का सर्वेक्षण किया गया था, जो कि अब तक इस दशक में किया गया सबसे बड़ा सर्वे है.

इस सर्वेक्षण से यह भी उजागर हुआ कि आबादी के सिर्फ 23 प्रतिशत घरों में किसी प्रकार का स्वास्थ्य बीमा कराया गया था. जबकि सबसे गरीब 20 फीसदी आबादी का पांचवां हिस्सा किसी न किसी प्रकार के स्वास्थ्य बीमा का लाभ ले रहा था. अब जबकि हम वर्ष 2017 में प्रवेश कर रहे हैं तब भारत में स्वास्थ्य पर होने वाला निजी खर्च दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों में सर्वाधिक बना हुआ है.

त्रासदी और नोटों पर प्रतिबंध

स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस तथ्य को भी लगता है नजरअंदाज कर दिया है कि ओडिशा में जापानी इन्सेफलाइटिस के कारण इस साल अब तक 300 से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है. कई महीनों के विरोध प्रदर्शन के बाद राज्य सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालय ने इन मौतों की जांच के लिए एक टीम का गठन किया था.

लेकिन इन सब अच्छे प्रयासों के बावजूद नोटबंदी की नीति ने भारत की जनस्वास्थ्य प्रणाली पर आघात किया है.

पूरे देश में सैकड़ों मरीज स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ नहीं उठा सके, जिसमें कई ऐसे उदाहरण भी हैं जिसमें गरीब लोग भारी भागदौड़ के बावजूद भी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित रहे.

नोटबंदी के बाद कथित रूप से केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा के कैलाश अस्पताल ने एक नवजात बच्चे को इसलिए लौटा दिया कि उनके पास एडवांस के रूप में मांगे गए 10,000 रुपए नई करेंसी में नहीं थे. अस्तपाल ने पुराने नोट लेने से मना कर दिया था. इस कारण बच्चे को बचाया नहीं जा सका.

विशाखापटनम में भी ऐसा ही मामला सामने आया जब एक 18 महीने के बच्चे को दवा खरीदने के लिए पैसे नहीं होने के कारण नहीं बचाया जा सका. ठीक ऐसा ही एक मामला उत्तरप्रदेश के मैनपुरी में सामने आया जब एक साल के एक बच्चे की मौत हो गई क्योंकि डॉक्टर ने पैसे नहीं होने के कारण उसको देखने से मना कर दिया.

महाराष्ट्र सरकार ने बताया है कि इस दौर में उनकी चौबीस घंटे चलने वाली एंबुलेंस सेवा को निजी अस्पतालों की एंबुलेंस सेवा के बारे में शिकायत मिल रही थी कि वे चेक लेने से मना कर रहे थे.

इस तरह नोटबंदी के साथ ही स्वास्थ्य पर जारी होने वाला नाममात्र का सरकारी बजट ऐसे कारण हैं जिसके चलते हम वर्ष 2016 को स्वास्थ्य के लिहाज एक बेहतर वर्ष के रूप में नहीं गिनेंगे.

First published: 27 December 2016, 8:20 IST
 
विशाख उन्नीकृष्णन @catchnews

एशियन कॉलेज ऑफ़ जर्नलिज्म से पढ़ाई. पब्लिक पॉलिसी से जुड़ी कहानियां करते हैं.

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