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2016: भारतीय सुरक्षा बलों के लिए एक ख़राब साल

कैच ब्यूरो | Updated on: 28 October 2016, 3:08 IST
QUICK PILL
  • रक्षा मंत्रालय में अगर कोई बहुत खुश है तो वह रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर हैं. वह आगामी उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में सर्जिकल स्ट्राइक को कैश कराने का एक भी मौका छोड़ते नजर नहीं आए. 
  • मगर आम चुनाव के दौरान सेना की समस्याएं को लेकर किए गए वादे जस के तस हैं. सुरक्षा बलों की रैंकिंग को लेकर जारी किए गए सर्कुलर ने उनकी चिंताएं और बढ़ा दी हैं. 

सेना में 'वन रैंक, वन पेंशन' को लेकर गतिरोध अभी तक बरक़रार है. इसे दूसरा झटका तब लगा, जब उन्हें सातवें वेतन आयोग का फायदा दिया गया. इसके बाद सैनिकों की विकलांगता पेंशन में कटौती की खबरें आईं और अब रक्षा मंत्रालय ने सशस्त्र बलों की रैंकिंग कम करने का फैसला किया है.

वायुसेना के एक अधिकारी ने कहा, आप एक कैप्टन स्तर के अधिकारी की तुलना किसी बी ग्रेड कर्मचारी से कैसे कर सकते हैं और किसी सैन्य अधिकारी के पद और स्तर पर हमला कैसे कर सकते हैं, जिसके कारण उन्हें इतना सम्मान मिलता है?

रक्षा मंत्रालय के सर्कुलर के मुताबिक, सशस्त्र बल अधिकारियों की श्रेणी एक स्तर कम कर दी गई है

रक्षा मंत्रालय ने 18 अक्टूबर को एक सर्कुलर जारी करके सशस्त्र बल सिविल सेवा के प्रधान निदेशक का दर्जा मेजर जनरल के बराबर कर दिया. यानी निदेशक स्तर का अधिकारी जिसे पहले कर्नल माना जाता था, उसे अब ब्रिगेडियर की पंक्ति में खड़ा  दिया गया है.

इसी तरह संयुक्त निदेशक को अब ले. कर्नल के बजाय कर्नल स्तर का माना जाएगा. पर्रिकर ने 25 अक्टूबर को एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि अपने सिविलियन समकक्षों की तुलना में सैन्य रैंकों की ग्रेडिंग में जो खामियां हैं, उन्हें सात दिन में दुरुस्त कर दिया जाएगा.

मनोबल गिरा

कई रक्षा अधिकारियों ने ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत में कहा, रैंकिंग में कटौती से एक बार फिर सरकार ने सशस्त्र बलों का मनोबल गिराया है, जैसा वह पहले भी करती आई है. सशस्त्र बलों के कुछ अधिकारी तो यह मानने लगे हैं कि अफसरशाही उन पर हावी है. एक अधिकारी के मुताबिक, ऐसा लग रहा है कि अफसरशाही ने हमें फिर मात दे दी है.

पिछले कई वेतन आयोगों के लागू होने के संदर्भ में वे हमारे साथ ऐसा ही करते रहे हैं. आईएएस और अन्य सिविल सेवाओं में भारी लाभ व वेतन भत्ते दिए गए मगर सेना की मांगों को नज़रंदाज कर दिया गया. रैंकिंग में कटौती कर एक बार फिर उन्होंने हमारे हितों पर हमला  किया है.  कैच ने जिन अधिकारियों से बात की उनमें से कुछ ने तो इस हद तक नाराजगी जताई कि सरकार के ऐसे कदमों की वजह से  ही सेना के प्रति युवाओं का उत्साह कम होने लगा है.

एक अधिकारी कहते हैं, 'ऐसा लगने लगा है कि अफसरशाही ने हमें फिर मात दे दी है'

एक अन्य अधिकारी का कहना था कि बात सिर्फ मौजूदा सरकार की नहीं है. पिछली सरकारें भी सशस्त्र बलों की भावनाओं के साथ बार-बार खिलवाड़ करती रही हैं. ऐसा कब तक चलता रहेगा? हालांकि सशस्त्र बलों की ओर से कोई अधिकारी या प्रतिनिधि इस शिकायत को लेकर अभी तक पर्रिकर से मिलने उनके ऑफिस नहीं गए हैं. वहीं रक्षा मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि दोनों पक्षों में बातचीत चल रही है.

सूत्र ने कहा, 'सेना के मनोबल को निश्चित रूप से चोट पहुंची है मगर सर्कुलर इस मामले में कोई अंतिम शब्द नहीं है. मुझे नहीं लगता कि शीर्ष स्तर पर कोई प्रतिनिधि मिले हैं लेकिन एक लेवल पर बातचीत जारी है. रक्षा मंत्री ने सात दिन की समय-सीमा दी है. देखें, इसके बाद वे क्या कहते हैं.

First published: 28 October 2016, 3:08 IST
 
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