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रक्षा क्षेत्र में 'बड़े' बदलावों का साल साबित होगा 2016

सुहास मुंशी | Updated on: 27 January 2016, 19:09 IST
QUICK PILL
  • रक्षा क्षेत्र में खरीदारी के लिहाज से 2016 अहम होगा. रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर के मुताबिक अगले महीने सरकार डीपीपी के मसौदे को जारी कर देगी. डीपीपी 2016 में रक्षा क्षेत्र में निवेश और स्थानीय स्तर पर होने वाले निर्माण को बढ़ावा देने के लिए कई अहम बदलाव किए गए हैं.
  • पुरानी नीति में सरकार ने ऑफसेट लिमिट 300 करोड़ रुपये रखी जिसे अब बढ़ाकर 2,000 करोड़ रुपये किया जा चुका है. ऑफसेट लिमिट के तहत टेक्नोलॉजी वेंडर से किसी क्षेत्र विशेष में एक रकम निवेश करने के लिए कहा जाता है.

भारतीय सैन्य बलों के आधुनिकीकरण की जोर-शोर से चल रही चर्चा के बीच पिछले साल रक्षा के क्षेत्र में एक ही डील हो पाई. पिछले साल सितंबर महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान चिनूक और अपाचे हेलीकॉप्टर की डिलीवरी को लेकर दोनों देशों के बीच समझौता हो पाया.  

2015 में भारतीय रक्षा क्षेत्र एक तीर से दो शिकार की कोशिश कर रहा था. पहला सैन्य जरूरतों को अपग्रेड करना और फिर उससे जुड़े हार्डवेयर को स्थानीय तौर पर बनाना. लेकिन यह कोशिश पूरी तरह से विफल रही. इसके अलावा रक्षा क्षेत्र में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजना मेक इन इंडिया का भी कोई लाभ नहीं मिला.

हालांकि रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर की मानें तो यह साल पिछले साल के मुकाबले अलग रहने की उम्मीद है. एक न्यूज रिपोर्ट के हवाले से यह खबर आई है कि अगले महीने रक्षा खरीद की प्रक्रिया (डीपीपी) से जुड़े मसौदा जारी किया जाएगा. डीपीपी कब और कैसे शुरू होगा यह अलग मामला है लेकिन यह भारतीय रक्षा क्षेत्र और उद्योग के लिए जबरदस्त साबित होगा. मोदी सरकार पहले से ही डिफेंस सेक्टर में विदेशी पूंजी की सीमा को बढ़ाकर 49 फीसदी कर चुकी है.

क्या है डीपीपी?

डीपीपी वह दस्तावेज है जिसकी मदद से भारत में बड़ी रक्षा खरीदारी को अंजाम दिया जाता है. इस फ्रेमवर्क की मदद से भारतीय रक्षा बाजार के लिए खरीदारी की जाती है. 2022 तक भारत का रक्षा बाजार 38 लाख करोड़ रुपये होने की उम्मीद है.

अगले कुछ सालों में भारत के स्थानीय रक्षा बाजार में 130 अरब डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट मिलने की उम्मीद है. टाटा, महिंद्रा, हीरो ग्रुप, अनिल अंंबानी की एडीएजी और मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज, भारत फोर्ज और हिंदुजा ग्रुप इस बाजार में बड़ी पूंजी लगाने की पहले से ही तैयार कर चुकी हैं. भारत दुनिया में सबसे बड़े पैमाने पर हथियार की खरीदारी करता है और यह देश के लिए कहीं से भी गर्व की बात नहीं है. नई खरीदारी नीति की वजह से सरकार को इस चुनौती से निपटने में मदद मिलेगी.

हालांकि 2016 के डीपीपी को अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है लेकिन इसके कुछ अंश पर बहस चल रही है. अभी तक सामने आए अंश को देखकर लगता है कि सरकार स्थानीय रक्षा बाजार को जबरदस्त तरीके से समर्थन दे रही है. नए डीपीपी से भारतीय रक्षा क्षेत्र में आने वाले बदलाव को ऐसे समझा जा सकता है.

मेड इन इंडिया को मिलेगी प्राथमिकता

डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (डीएसी) डीपीपी पर काम कर रही है. डीएसी ने खरीदारी के लिए नई कैटेगरी बनाई है जो इंडिजीनस डिजाइन डिवेलपमेंट एंड मैन्युफैक्चर्ड (आईडीएमएम) है. इससे पहले डीपीपी 2013 में भारत सरकार ने 'बाय इंडियन' कैटेगरी रखी थी जो सप्लायर्स और मैन्युफैक्चरर्स को तरजीह देती थी.

नई कैटेगरी के तहत उपकरणों की खरीदारी के लिए 40 फीसदी स्थानीयकरण अनिवार्य होगा. अगर उपकरण को स्थानीय तौर पर नहीं बनाया गया है तो उसका कम से कम 60 फीसदी स्थानीयकरण होना जरूरी होगा.

श्रेणियों का उप-विभाजन

यूपीए-2 सरकार ने 2006 के डीपीपी दस्तावेज में 'मेक' कैटेगरी रखी थी जो स्थानीय निर्माताओं के लिए थी. स्थानीय निर्माताओं को तरजीह देने के बावजूद इसके तहत एक भी परियोजना पर काम नहीं हो पाया.

 नए डीपीपी में इस श्रेणी को तीन उप-श्रेणी में बांट दिया गया है. मेक-1, मेक-2 और मेक-3 ताकि हर श्रेणी में स्थानीय निर्माण को बढ़ावा दिया जा सके.

मेक-1 के तहत सभी परियोजनाएं सरकारी फंड से पूरी की जाएंगी वहीं मेक-2 में सभी परियोजनाओं की फंडिंग इंडस्ट्री से आएंगी.

यह स्थानीय निर्माताओं के लिए अच्छी खबर है क्योंकि अगर कोई कंपनी भारतीय सैन्य बलों के लिए उपकरण बनाने में अपना पैसा और धन लगाती है तो उसे अपना पूरा निवेश निकालने का मौका मिलेगा. तीसरी श्रेणी मेक-3 है और इसे सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योग के लिए आरक्षित रखा गया है. जिन परियोजनाओं की लागत 3 करोड़ रुपये से कम होगी वह इस श्रेणी के तहत आगे बढ़ाई जाएंगी.

हालांकि अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि मेक कैटेगरी की तीनों श्रेणियों के लिए फंड रक्षा बजट से आएगा या डिफेंस टेक्नोलॉजी फंड से. वन रैंक वन पेंशन की वजह से रक्षा मंत्रालय पहले से ही बजटीय दबाव का सामना कर रहा है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 10 जुलाई 2014 को अपने पहले बजटीय भाषण में डिफेंस टेक्नोलॉजी फंड देने का वादा किया था.

अन्य बड़े बदलाव

इन बदलावों के अलावा डीपीपी में कई बड़े नीतिगत बदलाव किए गए हैं. इसमें एक सबसे अहम बदलाव ऑफसेट लिमिट को कम किया जाना है.

ऑफ सेट एग्रीमेंट एक तरह से र्शत होती है जो टेक्नोलॉजी बेचने वाले लगाया जाता है. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है. मसलन रफाले जेट की खरीदारी किए जाने के एवज में भारत फ्रांस से शिक्षा के क्षेत्र में एक निश्चित रकम का निवेश करने के लिए कह सकता है. फिलहाल ऑफसेट लिमिट 30 फीसदी है. ऑफसेट लिमिट से संभावित विक्रेता बिदक सकते हैं क्योंकि खरीदारी समझौते के पूरा होने के बाद भी किसी दूसरे क्षेत्र में निवेश के लिए फैसला लेने में लंबी बातचीत चलती है.

स्थानीय निर्माण को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने मेक-1, मेक-2 और मेक-3 की श्रेणी बनाई है

मौजूदा डीपीपी में किसी भी 'बाय' और 'बाय एंड मेक' कैटेगरी में 300 करोड़ रुपये से अधिक के प्रोजेक्ट में 30 फीसदी ऑफसेट अनिवार्य था. नई पॉलिसी में इस लिमिट को बढ़ाकर 2,000 करोड़ रुपये किया जा चुका है.

भ्रष्टाचार से निपटने की चुनौती

2016 के डीपीपी में विदेशी हथियार कंपनियों के एजेंटों के साथ होने वाली डीलिंग और लॉबीइंग को प्रक्रिया को पहले के मुकाबले ज्यादा पारदर्शी बनाया गया है ताकि भ्रष्टाचार की चुनौती से निपटा जा सके. इसके साथ कंपनियों को ब्लैकलिस्ट किए जाने की प्रक्रिया को भी दूर किए जाने की संभावना है जैसा कि इससे पहले की सरकारों ने किया था.

भ्रष्टाचार में शामिल कंपनियों को ब्लैकलिस्ट किए जाने की बजाए सरकार इन कंपनियों पर कुछ प्रतिबंध लगाएगी ताकि इन कंपनियों की तरफ से दी जाने वाली सेवाओं पर कोई असर नहीं पड़े. डीपीपी से जुड़े और तथ्य इसके मसौदा के सार्वजनिक किए जाने के बाद ही सामने आने की उम्मीद है.

पर्रिकर ने वादा किया था कि 2016 नए बदलावों का साल होगा. यह उनके लिए भी उतना ही अहम है क्योंकि अभी तक वह अपने एक साल के कार्यकाल में कुछ बड़ा नहीं कर पाए हैं. इसके साथ ही अगर वह स्थानीय उद्योग की मदद करने के साथ लॉबीइंग पर लगाम कस पाए तो वह बड़ी संख्या में रोजगार के मौके भी मुहैया करा सकेंगे. इससे देश की अर्थव्यवस्था में काफी पैसा आएगा और वह भी ऐसे समय में जब देश को उसकी सबसे ज्यादा जरूरत होगी.

First published: 27 January 2016, 19:09 IST
 
सुहास मुंशी @suhasmunshi

He hasn't been to journalism school, as evident by his refusal to end articles with 'ENDS' or 'EOM'. Principal correspondent at Catch, Suhas studied engineering and wrote code for a living before moving to writing mystery-shrouded-pall-of-gloom crime stories. On being accepted as an intern at Livemint in 2010, he etched PRESS onto his scooter. Some more bylines followed in Hindustan Times, Times of India and Mail Today.

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