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एसिड अटैक की शिकार महिलाओं की जिंदगी बदलने में लगी एक जिंदगी

कैच ब्यूरो | Updated on: 20 April 2016, 8:43 IST

महज 23 साल की रिया शर्मा कोई 'क्रांतिकारी' नहीं है. इस छोटी सी उम्र में उन्होंने एसिड अटैक की शिकार हुईं महिलाओं के दर्द बांटने का अनोखा तरीका अपनाया है.

दिल्ली की रहने वाली और ब्रिटेन के लीड्स कॉलेज से फैशन ऑर्ट में ग्रैजुएट रिया ने 2014 में  'मेक लव नॉट स्कार्स' नामक एनजीओ का गठन किया था. एनजीओ का उद्देश्य एसिड अटैक की शिकार हुईं महिलाओं का रिहैबिलिटिशन करना है.

कुछ साल पहले रिया एसिड अटैक सर्वाइवर पर एक डॉक्यूमेंट्री बना रही थी. इस दौरान वह सर्वाइवर से मिलने सरकारी अस्पताल जा पहुंची. अस्पताल और सर्वाइवर के हालात को देखने के बाद उनकी जिंदगी बदल गई.

रिया कहती हैं कि इस घटना से उनकी जिंदगी बदल गई और उन्होंने एसिड सर्वाइवर्स के लिए कुछ करने की ठान ली. पिछले महीने की सात तारीख को उनके एनजीओ 'मेक लव नॉट स्कार्स' ने दिल्ली में पहला रिहैब सेंटर खोला. यह भारत में अपने तरह का इकलौता सेंटर है.

यह सेंटर एसिड अटैक की शिकार हुईं महिलाओं को मेडिकल और कानूनी सहातया उपलब्ध कराने के अलावा उन्हें मानसिक और आर्थिक रूप से मदद करता है.

इसके उद्धाटन के मौके पर रिया शर्मा ने कहा कि सरकार को इस तरह के सेंटर खुलवाने चाहिए ताकि और भी बेहतर सुविधाएं मुहैया कराई जा सकें. कई राज्यों में ऐसे सेंटर्स की जरूरत है. फिलहाल उन्हें सरकार की ओर से कोई सहायता नहीं मिली है.

पिछले महीने रिया को लंदन के मेयर द्वारा ब्रिटिश काउंसिल इंटरनेशनल एल्मुनाई अवॉर्ड से नवाजा गया है.

एसिड अटैक के मामले भारत में ज्यादा

महिलाओं पर एसिड फेंकने की घटनाएं पूरी दुनिया में होती है लेकिन भारत में यह ज्यादा है. प्रेमी को ठुकराए जाने या परिवार के ही किसी सदस्य से अनबन होने की स्थिति में ऐसी घटनाएं सामने आती हैं. एक अनुमान के अनुसार भारत में हर साल करीब 1000 एसिड अटैक की घटनाएं होती है. भारत में एसिड कम कीमत पर अधिकतर दुकानों पर आसानी से मिल जाता है.

दुनिया भर के कुल एसिड हमलों में से 80 फीसदी का निशाना महिलाएं होती है. लंदन स्थित समाजसेवी संस्था एसिड सर्वाइवर ट्रस्ट इंटरनेशनल के अनुसार हर साल दुनिया भर में करीब 1,500 लोगों पर तेजाब का हमला होता है.

एसिड हमलों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला देते हुए नाबालिगों के तेजाब खरीदने पर रोक लगा दी थी. कोर्ट ने आदेश दिया था कि 18 साल से अधिक आयु के उन्हीं लोगों को तेजाब बेचा जाए, जिनके पास वैध पहचान पत्र हो और उसे इस्तेमाल का मकसद भी बताना होगा.

2013 में लक्ष्मी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में सुप्रीम कोर्ट की सोशल जस्टिस बेंच ने साफ कहा है कि प्राइवेट अस्पतालों को एसिड पीड़ितों का मुफ्त इलाज करना पड़ेगा.

इसके साथ ही कोर्ट ने कहा था कि तेजाब हमले की शिकार लोगों को कम से कम तीन लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए और पीड़ित के पुनर्वास का खर्च सरकार उठाए. एसिड अटैक से पीड़ितों के इलाज और पुनर्वास की पूरी जिम्‍मेदारी राज्‍य सरकार की होगी.

भारत में क्रिमिनल लॉ में संशोधन के बाद 2013 से एसिड हमले के मामले में दोषी करार दिया गए व्यक्ति को 10 साल या आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है. ऐसे अपराधों की सुनवाई (आईपीसी की धारा 376ए के तहत) 60 दिनों में पूरी होने की बात कही गई है. भारत सरकार एसिड हमलों को जघन्य मामलों की सूची में रखने पर विचार कर रही है.

First published: 20 April 2016, 8:43 IST
 
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