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25 सालों बाद भी कश्मीर की बलात्कार पीड़ितों को नहीं मिला न्याय

भार्गब सर्मा | Updated on: 25 February 2016, 0:11 IST
QUICK PILL
  • फरवरी 1991 में जम्मू-कश्मीर के दो गांवों में हथियारों की तलाश में करीब 30 महिलाओं के साथ कथित तौर पर बलात्कार किया. हालांकि सही आंकड़ों के बारे में अभी तक कोई जानकारी नहीं है.
  • 24 फरवरी को सुबह 9 बजे दोनों गांवों की घेरेबंदी हटाई गई. जबकि बाहरी घेरेबंदी लंबे समय तक जारी रही. गांव वालों का कहना है कि बाहरी घेरेबंदी को इसलिए जारी रखा गया ताकि इस घटना की कवरेज होने से रोकी जा सके.

23 फरवरी 1991 की शाम चार राजपूताना राइफल्स के जवानों ने जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के कुनन और पॉस्फोरा गांव की घेरेबंदी करते हुए तलाशी अभियान चलाया. कश्मीर में 90 के दशक में आतंकवाद चरम पर था और पाकिस्तान की सीमा से लगा कुपवाड़ा जिला इस लिहाज से ज्यादा संवेदनशील था. 90 के दशक में घाटी में तलाशी अभियान उन दिनों आम हुआ करती थी.

हालांकि यह मामला पहले की अन्य घटनाओं से इसलिए अलग रहा क्योंकि यह आजाद भारत की सबसे बड़ी मानवाधिकार उल्लंघन की घटना है जिसे राज्य का पूरा समर्थन हासिल था.

दो गांवों में हथियारों की तलाश में सेना ने महिलाओं और पुरुषों को अलग-अलग कतार में खड़ा किया. हालांकि हथियारों की तलाश में अगले कुछ घंटों के दौरान सेना ने करीब 30 महिलाओं के साथ कथित तौर पर बलात्कार किया. बलात्कार पीड़ितों की सही संख्या के बारे में हालांकि अभी कुछ साफ नहीं है. 

मामला सामने आने के बाद इसे हर तरह से दबाने की कोशिश हुई. 25 साल बाद कुनन पॉस्फोरा आज भी आधुनिक भारत की स्मृति में सबसे दुखद और स्याह अध्याय बना हुआ है.

जुबान सीरिज की तरफ से हाल ही में रिलीज की गई 'डू यू रिमेंबर कुनन पॉस्फोरा' में एक पीड़ित के हवाल से लिखा गया है, 'जब सेना के लोग घुसे तो मैंने उनकी पैंट की जिप को खुला देखा. उनकी मंशा साफ तौर पर बलात्कार करने की थी.' इस किताब को पांच युवा कश्मीरी महिला कार्यकर्ताओं ने मिलकर लिखा है.

23 फरवरी 1991 को राजपूताना राइफल्स के जवानों ने कुपवाड़ा जिले के कुनन और पॉस्फोरा में सामूहिक बलात्कार कांड को अंजाम दिया

सेना के जवानों ने यहां तक बच्चियों और गर्भवती महिलाओं को भी नहीं छोड़ा. बच्चों के सामने उनकी दादियों और माताओं के साथ बलात्कार किया गया. कुछ महिलाओं का कहना है कि सेना के जवान अपने साथ शराब की बोतलें लेकर आए थे और वह नशे में थे.

एक अन्य पीड़िता के हवाल से किताब में लिखा गया है, 'मैंने उनसे कहा कि खुदा के लिए हमें छोड़ दो. हमने कुछ नहीं किया. मैंने उनके जूतों पर सिर रख गिड़गिड़ाई. वह मुझे उठाकर किचेन में ले गए. मेरी मां वहीं पर थीं. मैं अपनी पूरी ताकत से चिल्लाई..मां मुझे बचाओ.'

उन्होंन कहा, 'वह कैसे मुझे बचाती. मैंने जो कुछ देखा वह मैं उन्हें नहीं बताना चाहती थी. उनके साथ जो हुआ वह मैं याद करना नहीं चाहती. मेरी फेरन फटी हुई थी और इसके साथ ही मेरी पूरी जिंदगी बर्बाद हो गई.'

जांच

24 फरवरी को सुबह 9 बजे दोनों गांवों की घेरेबंदी हटाई गई. जबकि बाहरी घेरेबंदी लंबे समय तक जारी रही. गांव वालों का कहना है कि बाहरी घेरेबंदी को इसलिए जारी रखा गया ताकि इस घटना की कवरेज होने से रोकी जा सके.

25 फरवरी को गांव वालों ने स्थानीय तहसीलदार को चिट्ठी भेजी और कुपवाड़ा के डिप्टी कमिश्नर एस एस यासी ने 2 मार्च को इस चिट्ठी के मिलने की पुष्टि की. इसी चिट्ठी के आधार पर 8 मार्च को एफआईआर दर्ज की गई.

7 मार्च को डिप्टी कमिश्नर ने तत्काली डिविजनल कमिश्नर वजाहत हबीबुल्लाह को लिखा, 'मुझे जिस घटना के बारे में जानकारी दी गई है उसे जानकार मैं सदमे में हूं.' हालांकि यह घटना मार्च के महीने में सार्वजनिक दायरे में आई. 18 मार्च 1991 को वजाहत हबीबुल्लाह ने गांव का दौरा किया.

कुपवाड़ा में हुए सामूहिक बलात्कार की घटना की जानकारी मीडिया में 18 मार्च 1991 में आई

सरकार को सौंपी गोपनीय रिपोर्ट में हबीबुल्लाह ने आरोपों की सत्यता को लेकर सवाल उठाए लेकिन उन्होंने गांव वालों के गुस्से को स्वीकार किया. उन्होंने इस मामले में उच्चाधिकार समिति बिठाए जाने की मांग की. उन्होंने कहा कि जांच रिपोर्ट में देरी से यह लग सकता है घटना को दबाया जा रहा है. इसके साथ ही लंबी देरी की वजह से मेडिकल जांच को लेकर कई तरह की शंकाएं हैं.

हालांकि जब हबीबुल्लाह की रिपोर्ट सार्वजनिक की गई तो कुछ जानकारियों को गायब कर दिया गया. घटना के करीब 22 सालों बाद हबीबुल्लाह ने यह कहा कि सरकार ने इस घटना को निपटने में गलत तरीका अख्तियार किया. वहीं दूसरी तरफ सामूहिक बलात्कार कांड का आरोप झेल रही सेना ने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया से इस मामले की जांच किए जाने की मांग की.

बी जी वर्गीत की अध्यक्षता में गठित तीन सदस्यीय समिति ने कुनन-पॉस्फोरा गांव के लोगों के आरोप को 'बेकार' करार दिया. समिति ने कहा कि इस घटना की आड़ में सेना को बदनाम करने की कोशिश की गई. अक्टूबर 1991 में जम्मू-कश्मीर पुलिस ने इस मामले को बंद कर दिया.

सालों तक वर्गीज समिति की रिपोर्ट को लेकर सवाल उठाए जाते रहे. मसलन कमेटी की तरफ से तीन पीड़ितों के मेडिकल जांच में उनके हाइमन के डैमेज होने की बात सामने आई थी. जबकि वह शादीशुदा नहीं थीं. इसके अलावा कई पीड़ितों की छातियों और पेट पर जख्म के निशान थे.

समिति ने कहा, 'पेट पर जख्म के निशान कश्मीरी महिलाओं में आम हैं क्योंकि वह कांगरी पहनती हैं. जहां तक हाइमन के डैमेज होने की बात है तो वह कई जाहिर कारणों की वजह से हो सकता है. मसलन चोट लगना या फिर शादी से पहले सेक्स या बलात्कार.'

सामूहिक बलात्कार कांड का आरोप झेल रही सेना ने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया से इस मामले की जांच किए जाने की मांग की

समिति ने देरी का हवाला देते हुए मेडिकल जांच रिपोर्ट को मानने से इनकार कर दिया. ह्यूमन राइट्स वाच, एशिया वाच और यूएस स्टेट्स डिपार्टमेंट ने पीसीआई की जांच रिपोर्ट को खारिज कर दिया. इसके साथ ही इन्होंने इस स्थिति से निपटने के रवैये को लेकर सरकार के रुख की आलोचना भी की.

2011 में राज्य मानवाधिकार आयोग ने भी प्रेस परिषद की रिपोर्ट को खारिज कर दिया और कहा कि 'आरोपी सैनिक घटना की रात शैतान बन गए.' राज्य मानवाधिकार आयोग ने पीड़ितों को मुआवजा दिए जाने की मांग की और साथ ही आरोपियों के खिलाफ आपराधिक मामला चलाए जाने की सिफारिश की.

हालांकि राज्य मानवाधिकार आयोग की सिफारिशों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई. निर्भया बलात्कार कांड के बाद जनाक्रोश को देखते हुए पीड़ितों ने 2013 की शुरुआत में पीड़ितों ने हाई कोर्ट के समक्ष एक याचिका देकर राज्य मानवाधिकार आयोग की सिफारिशों को लागू करने की अपील की.

हालांकि कोर्ट ने पीआईएल को नहीं माना.

नहीं मिला न्याय

आज कुनन पॉस्फोरा की महिलाएं न्याय की आस में इंतजार कर रही है. 2013 में दायर की गई याचिका के हाई कोर्ट में खारिज होने के बाद उसे सुप्रीम कोर्ट में भेजा गया. सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2015 में सुनवाई पर रोक लगा दी. 

2013 में राज्य का दौरान के बाद तत्कालीन विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा, 'मैं क्या कह सकता हूं? मैं बस इतना कह सकता हूं कि मैं इस बात को लेकर शर्मिंदा हूं जो मेरे देश में हुआ. मैं देश में हुई इस घटना के लिए शर्मिंदा हूं.'

खुर्शीद पहले वैसे केंद्रीय मंत्री है जिन्होंने सामूहिक बलात्कार कांड के लिए माफी मांगी. हालांकि उनके बयान के बावजूद पीड़ितों न्याय दिलाने की दिशा में बहुत अधिक तरक्की नहीं हो पाई.

किताब की एक लेखिका समरीन मुश्ताक लिखती हैं, 'उन महिलाओं से बात करना बेहद मुश्किल था क्योंकि जैसे ही उस रात की बात याद आती थी वह डिप्रेशन में चली जाती थीं.'

हालांकि घटना के 25 साल बाद भी पीड़ितों को न्याय मिलने की मांग बेहद कम है. इस बात की संभावना बेहद कम है कि मुख्यधारा की मीडिया फरवरी 1991 की घटना को उठाएगी. जब यह बात कश्मीर को लेक र आती है तो भारत के लोग डिनायल की स्थिति में चले जाते हैं. इस बात की संभावना भी कम ही है कि राज्य की मनोदशा में कोई बड़ा बदलाव आएगा.

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First published: 25 February 2016, 0:11 IST
 
भार्गब सर्मा @bhargabsarmah

संवाददाता, कैच न्यूज़. फ़ुटबॉल और दूसरे खेलों पर लिखते हैं.

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