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पश्चिम बंगालः '5 हजार' वन्यजीव मारे गए वन विभाग को भनक तक नहीं लगी

कैच ब्यूरो | Updated on: 6 July 2016, 8:13 IST
(पब्लिक एनजीओ)

कोलकाता स्थित संगठन और सैंक्चुरी एशिया मैगज़ीन के अनुसार तीर-धनुष और तलवार-भाले जैसे हथियारों से लैस परंपरागत शिकारियों ने पश्चिम बंगाल में चार दिन में करीब 5 हजार वन्यजीवों को मार दिया.

सूत्रों के अनुसार ये हत्याएं न्यू मिदनापुर जिले में तीन जून से छह जून के बीच 'ज्येष्ठ अमावस्या' (नया चांद) के मौके पर की गईं.

इन शिकारियों के कोलकाता स्थित 'पब्लिक' ने रोकने की कोशिश की और राज्य के वन विभाग को सूचित किया. शिकारी मारे गए वन्यजीवों को ट्रेन से लेकर जा रहे थे.

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वन विभाग के छापे में 28 मृत वन्यजीव बरामद हुए. इनमें से चार वन्यजीव (छिपकलियों की तीन प्रजातियां और बिल्ली की एक प्रजाति) कानूनन अति-संरक्षित श्रेणी में शामिल हैं.

मृतक वन्यजीवों में गोल्डेन जैकाल, जंगल कैट, कॉमन पाम सिविट, फ्लेम बैक्ड वूडपेकर, व्हाइट-थ्रोटेड किंगफिंशर इत्यादि भी शामिल थे. शिकारी स्टेशन पर कुछ वन्यजीवों का मांस पकाकर खाते हुए पकड़े गए.

रेलवे स्टेशन पर पकड़े गए

पब्लिक एनजीओ

शिकारियों को एनजीओवालों और वन विभाग ने मिलकर अलग अलग जगहों पर पकड़ा. कुछ ईस्ट मिदनापुर के पंसकुरा और खिराई में और हावड़ा जिले के देउलती और बगनान में पकड़े गए. वन विभाग ने छापे में पकड़े गए जीवित वन्यजीव को शिकारियों के कब्जे से छुड़ाकर वापस जंगल में छोड़ दिया. 

एनजीओ पब्लिक के अनुसार अप्रैल और मई में भी ऐसे ही त्योहारों पर वन्यजीवों को मारा गया था लेकिन तब रेलवे ने सहयोग नहीं किया और उन शिकारियों को पकड़ा नहीं जा सका.

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पुलिस और रेलवे पुलिस की अनदेखी

पब्लिक एनजीओ

इतने बड़े पैमाने पर पहली बार वन्यजीवों की बरामदगी हुई है. एनजीओ का आरोप है कि रेलवे के अधिकारी जानवरों की तस्करी से जानबूझकर आंख मूंद लेते हैं. कुछ वन्यजीवों को तो 5 जून को जीवित ही स्टेशन पर ले जाया गया और कुछ को वहीं पकाया जा रहा था.

पब्लिक से जुड़ी मेघना बनर्जी ने एक बयान में कहा, "जब पूर्वी रेलवे विश्व पर्यावरण दिवस का प्रेस विज्ञप्ति जारी कर रहा था तब रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (आरपीएफ) बंगाल में जैव विविधता को नष्ट होते देखते रहे...रेलवे पुलिस ने हमारी मदद करने की बजाय हमपर परेशानी खड़ा करना का आरोप लगाया."

पब्लिक एनजीओ

बनर्जी ने अपने बयान में कहा कि अगर पुलिस, रेलवे पुलिस और वन विभाग मिलकर काम करें तो इन शिकारियों के उनके शिकार से जैवविविधता को पहुंचने वाले नुकसान के बारे में समझाया जा सकता है.

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वन्यजीवों की अवैध तस्करी को रोकने के लिए काम करने वाली संस्था ट्रैफिक इंडिया के शेखर नीरज कहते हैं, "ऐसी विफलताएं कमजोर राष्ट्रीय नीति की परिचायक हैं. इससे पता चलता है कि भारत में वन्यजीवों के प्रति जरूरी संवेदनशीलता नहीं है."

सैंक्चुरी एशिया मैगजीन के संपादक बिट्टू सहगल मानते हैं कि शिकार भारत के कई आदिवासी समुदायों की जीवनशैली का अभिन्न अंग है. सहगल कहते हैं, "लेकिन भारतीय जंगल ईस्ट मिदनापुर जैसी वन्यजीवों की सामूहिक हत्याओं को और बरदाश्त नहीं कर सकते." 

मामले में अभी किसी भी शिकारी की गिरफ्तारी नहीं हुई है.

First published: 6 July 2016, 8:13 IST
 
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